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गुरुवार, 1 मई 2014

नभ में बादल ठहरे हुए हैं


नभ में 
बादल ठहरे हुए हैं
जल के बोझ तले
दबे हुए हैं
खुल कर बरसना
भी चाहते हैं
नदी नालों में उफान
धरती पर हरयाली
लाना चाहते हैं
पर इंसान की
फितरत से डरते हैं
बरसने के बाद
कौन उन्हें याद करेगा
चिंता में डूबे हैं
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
इंसान,फितरत,ज़िंदगी, चिंता

234-01--01--05-2014

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