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बुधवार, 9 अप्रैल 2014

कुंठाओं का घडा


डरता हूँ कहीं
मन का कुंठाओं भरा
घडा छलक ना जाए
कुंठाएं जग
ज़ाहिर ना हो जाएँ
कई चेहरों पर चढी
नकाब उतर जायेगी
मीठी मुस्कान से
भरी सूरतें
रुआंसी हो जायेगी
कई दोस्तों से दोस्ती
दुश्मनी में बदल जायेगी
नतीजे से घबरा कर
घड़े में पडी दरारों को
सहनशीलता का
मलहम लगाता रहता हूँ
भरसक प्रयास करता हूँ
घडा ना फूटे
ना छलके कभी
जानता हूँ एक दिन
घडा फूटेगा अवश्य
बस किसी तरह
एक एक दिन
आगे बढाता जाता हूँ
कुंठाओं को मन में
समाये रखता हूँ
घुट घुट कर जीता
रहता हूँ 
डा .राजेंद्र तेला ,निरंतर
कुंठा,कुंठाएं,दोस्ती,संयम,सहनशीलता,जीवन जीवन मन्त्र
186-28--09--04-2014


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