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सोमवार, 14 अप्रैल 2014

हृदय में गहन अंधियारा है

हृदय में
गहन अंधियारा है
मन में अहम का
कोहरा भी कम नहीं
स्वार्थे के पर्दे ने
सोच को ढक दिया है
अब मनुष्य को
मनुष्य दिखता नहीं
लाभ की बात हो अगर
तो सम्बन्ध निभता है
नहीं तो कागज़ के
रद्दी टुकड़े की तरह
फाड़ कर कूड़े दान में
फैंक दिया जाता है
उस पर भी
ना लाज शर्म
ना पीड़ा मन में
हँसते हँसते
गर्व से खुद को
सबसे उत्तम मनुष्य
बताया जाता है 
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
197-40--14--04-2014

स्वार्थ,अहम,जीवन,सम्बन्ध,जीवन मन्त्र

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