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शनिवार, 26 अप्रैल 2014

वर्किंग वुमन पर कविता -वर्किंग वुमन हूँ



वर्किंग वुमन हूँ
अपनी व्यथा को
सिर्फ मैं ही समझती हूँ
माँ पत्नी बहु भाभी का
धर्म कैसे निभाती हूँ
केवल मैं ही जानती हूँ
ऑफिस में
सब उम्मीद करते हैं
मुस्तैदी से काम करती रहूँ
घर में सब चाहते हैं
हर काम मैं ही करूँ
किसी की मदद
या तो मिलती नहीं
मिलती तो भी
आधी अधूरी मिलती
कैसी भी हारी बीमारी हो
रात में देर से सोऊँ
ज़ल्दी सोऊँ
सुबह ज़ल्दी ही उठती हूँ
आँख खुले नहीं चाहे
तो भी सवेरे से
मशीन सी
काम में जुटती हूँ
रिश्तेदारी भी
मुझे ही निभानी होती है
अफसर की डांट भी
मुझे ही खानी पड़ती है
घर से ऑफिस तक
ऑफिस से 
घर तक की यात्रा
हर मौसम में करनी 
पड़ती है
पति के साथ कंधे से 
कंधा मिला कर
ज़िन्दगी से
ज़द्दोज़हद करती हूँ
फिर भी आज
सब्जी अच्छी नहीं बनी
कल रोटी कड़क थी
आज फिर देर से आयी
आज ज़ल्दी क्यों जाना है
कभी पति कभी अफसर के
ताने भी मैं ही सुनती हूँ
काम अच्छा करूँ तो
पुरुष साथियों की इर्ष्या
अच्छा नहीं करूँ तो
मज़ाक भी मैं ही सहती हूँ
मैं एक वर्किंग वुमन हूँ
अपनी व्यथा को
सिर्फ मैं समझती हूँ
कई धर्म एक साथ
कैसे निभाती हूँ
केवल मैं ही जानती हूँ
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
वर्किंग वुमन, नारी,औरत,कामकाजी,स्त्री

230-73--26--04-2014

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