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शनिवार, 5 अप्रैल 2014

शक़ की बुनियाद पर

कभी हर मुलाक़ात को
नया साल समझते थे
अब साल गुजर जाता है
मगर याद तक नहीं करते
याद आते भी होंगे तो
जाहिर नहीं करते
मगर फिर भी
ना गिला ना शिकवा
उनसे हमको
हम जानते हैं
शक़ की बुनियाद पर
जीने वाले
ईमान से जीने वालों को
कभी नहीं समझते
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
171-13--05--04-2014
शक़,ज़िंदगी,


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