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गुरुवार, 17 अप्रैल 2014

कलम जब आग उगलती है


कलम जब
आग उगलती है
सत्य का
आह्वान करती है
मस्तिष्क पर
प्रहार करती है
आत्मा को
झकझोरती है
हृदय में बदलाव की
ज्वाला धधकती है
प्रजा 
सोते से जगती है 
सड़क पर निकलती है
क्रान्ति जन्म लेती है
सिंहासन की चूलें
हिलती हैं
सरकार बदलती है
नयी सुबह आती है
हर चेहरे पर संतुष्टी
मन में खुशी
आँखों में चमक होती है

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
कलम,सरकार,प्रजा,जनता,देश,क्रान्ति 

202-45--17--04-2014

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