ADVERTISEMENT

Bookmark and Share

Register To Recieve Latest Poems On Your Email or Mobile

Enter your email address:

Click Here To Subscribe On Mobile Bookmark and Share

शनिवार, 12 अप्रैल 2014

मन मस्तिष्क ह्रदय का द्वंद्व


मन मस्तिष्क,
ह्रदय का द्वंद्व
जीवन भर निरंतर
चलता रहता,
मन कुछ कहता
मष्तिष्क कुछ,
ह्रदय कुछ और,
क्या होगा? कैसे होगा?
कब होगा?करूँ ?
ना करूँ का प्रश्न
आसानी से
हल नहीं होता
तीनों की अपार इच्छाएं,
आकांक्षाएं आक्षांकाएं
ज्वार भाटे सी 
उठती रहती
क्या उचित?
क्या अनुचित ?
का चक्रव्यूह,मनुष्य को
ना संतुष्ट रहने देता
ना ही जीवन में कभी
चैन लेने देता
जो मन कहता मष्तिष्क
नहीं करने देता,
मष्तिष्क कुछ कहता तो
ह्रदय विरोध करता,
जो ह्रदय चाहता
वो हो नहीं पाता
तीनों के आपसी द्वंद्व में
आत्मा को दिन में कई बार
याद तो किया जाता पर
आत्मा की इच्छानुसार
कोई करता कुछ नहीं
स्वयं क्रंदन करता रहता
कितनी विचित्र स्थिति है
आत्मा की संतुष्टी की
बात करते सब हैं
पर ह्रदय,मन मस्तिष्क में
सामंजस्य नहीं होने से
मनुष्य जीता तो है
पर हर पल खुशी,नाखुशी के
भंवर में फंसा रहता
आत्मा की सुनता नहीं
शान्ति और संतुष्टि की
खोज में भटकता रहता
भूल जाता
आत्मा का संतुष्ट रहना ही
जीवन का सार
सच्चा जीवन आधार है
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
मन मस्तिष्क ह्रदय, सामंजस्य
जीवन,जीवन मन्त्र
191-33--12--04-2014


कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें