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शनिवार, 29 मार्च 2014

प्रशंसा तो करना पर इतनी भी नहीं


प्रशंसा तो करना
पर इतनी भी नहीं
अहम् से भर जाऊं
घमंड में तन जाऊं
सर झुकाना ही भूल जाऊं
जिन क़दमों से चल कर
इस ऊंचाई तक पहुंचा हूँ
उन क़दमों को
देखना ही भूल जाऊं
चाहता हूँ निरंतर
याद करता रहूँ
हर उस इंसान को
ऊंचाई तक
पहुँचने के सफ़र में
साथ निभाया जिसने
नमन करता रहूँ
हर दुआ करने वाले को
जिनके बिना आज जहां हूँ
वहाँ होना
सम्भव ना होता  
प्रशंसा तो करना
पर इतनी भी नहीं
अहम् से भर जाऊं
घमंड में तन जाऊं
148-41-29--3-2014  
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
प्रशंसा,घमंड,अहम्,जीवन जीवन मन्त्र


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