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मंगलवार, 25 मार्च 2014

ना जाने कब तक


ना जाने
कब तक चलेगा सिलसिला
दिल के मिलने बिछड़ने का
हीर रांझा
लैला मजनूँ के फसानों का
रातों की नींद उड़ती रहेंगी 
दिन गुजरते रहेंगे बेचैनी में
दिल की
गर हसरत पूरी हो भी जाए
आखिर तो
एक दिन जुदा होना ही पडेगा 
मोहब्बत का
सिला तो दर्द भरा ही मिलेगा
किसी ना
किसी को तो रोना ही पडेगा
ज़िंदगी के आखरी लम्हों में
अकेले रहना ही पडेगा
ना जाने
कब तक चलेगा सिलसिला
दिल के मिलने बिछड़ने का

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
140-33-25--3-2014
हीर रांझा ,लैला मजनूँ ,मोहब्बत,प्यार ,मिलना बिछड़ना 

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