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बुधवार, 12 मार्च 2014

कर्तव्य निभाती आशाएँ


आशाएं
ले कर आता है
नया दिन
यथार्थ की तेज धूप में
पिघल जाता है दिन
आशाएं ना थकती
ना हार मानती
धैर्य से नए दिन की
प्रतीक्षा करतीं
थकता है तो मनुष्य
हार मानता है
तो मनुष्य
उसे ही सहना होता है
घुट घुट कर जीना होता है
आशाओं की जेब से तो
कुछ नहीं जाता
उन्हें तो केवल कर्तव्य
निभाना होता है
उसमें वो कभी
निर्बल नहीं पड़ती
जीने का
बहाना देती रहती
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
121-14-12-3-2014
जीवन,जीवन मन्त्र, धैर्य,आशाएं    

2 टिप्‍पणियां:


  1. आपकी लिखी रचना शनिवार 15 मार्च 2014 को लिंक की जाएगी...............
    http://nayi-purani-halchal.blogspot.in
    आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत बढ़िया ..होली की शुभकामनायें

    उत्तर देंहटाएं