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सोमवार, 31 मार्च 2014

क्यों भावनाओं को दोष देते हो


क्यों जीवन भर
केवल दुखों की बात

करते हो
निरंतर भावनाओं को

दोष देते हो
कभी उस मिट्टी की
भावनाओं को भी देख लो
पैरों तले रौंदी जाती
अंत में वही तुम्हें
अपने में समाती है
उस लकड़ी की भावनाओं
को भी याद कर लो
धरती में तुम्ही रोप
सींच कर पालते पोसते हो
स्वार्थवश
तुम्ही उसे काट देते हो
अंत तक
वही साथ निभाती है
नश्वर शरीर को
राख में बदलती है
कल कल करते जल की
भावनाओं का भी
स्मरण कर लो
वही तुम्हें जीवित

रखता है
तुम्हारी गंदगी भी
वही बहाता है
निरंतर बहती पवन को
मत भूलो 

वह तुम्हें श्वांस देती है
तुम उसे दूषित करते हो
खुद की भावनाओं का
रोना रोने से पहले
संवेदनशीलता बढ़ाओ
दूसरों की भावनाओं का
भी सम्मान करो

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
152-45-31--3-2014
भायनाएं,संवेदनशीलता,संवेदनशील,जीवन ,जीवन मन्त्र ,



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