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बुधवार, 29 जनवरी 2014

लड़खड़ाता हूँ मगर गिरता नहीं हूँ


लड़खड़ाता हूँ
मगर गिरता नहीं हूँ
मन मचलता है
मगर पथ से
भटकता नहीं हूँ
इच्छाओं पर
नियंत्रण 
खोता नहीं हूँ
ह्रदय के सामने
सर झुकाता नहीं हूँ
मर्यादा की सीमा को
लांघता नहीं हूँ
निरंतर
सर उठा कर चला हूँ
सर झुका कर
चलता नहीं हूँ


© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
 
53-53-29-01-2014
मन,ह्रदय,जीवन,जीवन मन्त्र ,मर्यादा ,इच्छाएं

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

3 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी लिखी रचना शनिवार 01/02/2014 को लिंक की जाएगी............... http://nayi-purani-halchal.blogspot.in
    कृपया पधारें ....धन्यवाद!

    उत्तर देंहटाएं
  2. ऐसा ही होना चाहिए. सुन्दर

    उत्तर देंहटाएं