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बुधवार, 29 जनवरी 2014

लड़खड़ाता हूँ मगर गिरता नहीं हूँ

लड़खड़ाता हूँ
मगर गिरता नहीं हूँ
मन मचलता है
मगर पथ से
भटकता नहीं हूँ
इच्छाओं पर
खोता नहीं हूँ
ह्रदय के सामने
सर झुकाता नहीं हूँ
मर्यादा की सीमा को
लांघता नहीं हूँ
सर उठा कर चला हूँ
सर झुका कर
चलता नहीं हूँ

© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
मन,ह्रदय,जीवन,जीवन मन्त्र ,मर्यादा ,इच्छाएं

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

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