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सोमवार, 6 जनवरी 2014

बंद खिड़कियों से झांकता हूँ


धूल से सने शीशे की
बंद खिड़कियों से
झांकता हूँ
घर के बाहर लगे पेड़ों के
साये भर दिखते हैं
शीशों को साफ़ कर के
बाहर देखता हूँ
पेड़ पहले से अधिक
स्पष्ट दिखने लगते हैं
खिड़कियाँ खोल कर
देखता हूँ
हरे भरे पेड़ तो स्पष्ट
दिखते ही हैं
ताज़ी हवा भी चेहरे को
छूने लगती है
ठीक मेरे मन की तरह
जब खुले मन से 
सोचता हूँ
हर बात स्पष्ट 
समझ मेंआने लगती है
जब आशंकाओं के
परदे के
 पीछे से देखता हूँ
बात पूरी 
समझ नहीं आती है
जब मन में शंका 
रखता हूँ
सब कुछ अस्पष्ट 
दिखता है 

© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
08-08-06-01-2014
मन,सोच,जीवन,जीवन मन्त्र, सत्संग,

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

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