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बुधवार, 22 जनवरी 2014

वृद्धावस्था पर कविता -ज्यों ज्यों उम्र बढ़ती जाती


ज्यों ज्यों
उम्र बढ़ती जाती
जीवन पर्वत की चढ़ाई
दुरूह होती जाती
अम्बर से 

दूरी कम हो जाती
मगर खाइयों की गहराई
बढ़ती जाती जाती
पैर फिसल ना जाएँ
मन में 

आशंका जन्म लेती
सांस चढ़ने लगती
थकान बढ़ने लगती
मन में पीछे लौटने की
आस जगती
लौटने की

 हिम्मत कर भी ले
ताकत साथ नहीं देती
आगे बढ़ते जाने के अलावा
कोई सूरत नहीं बचती
ज्यों ज्यों उम्र बढ़ती जाती
व्याकुलता से मित्रता
गहरी होती जाती...

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
34-34-22-01-2014
उम्र,बुढ़ापा,जीवन ,ज़िंदगी

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