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शुक्रवार, 3 जनवरी 2014

बुढ़ापे पर कविता-उम्र का एक दिन गुजरता है


उम्र का
एक दिन गुजरता है
एक नया किस्सा
याद आने लगता है
यादों में खोने का समय
पलों से बढ़ कर घंटों में
बदल जाता है   
सोच कर दुखी नहीं
खुश होता हूँ
यादों का सफ़र अगर
ऐसा चलता रहेगा तो
एक दिन ऐसा आयेगा
जब यादों में ही जीना होगा 
वैसे भी ढलते शरीर से
बदलती स्थितियों में
गिरती मानसिकता में
भूले संस्कारों के साथ
उस समय वर्तमान में
कौन जीना चाहेगा
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
04-04-03-01-2014
उम्र,बुढ़ापा ,यादें,जीवन  

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