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गुरुवार, 18 दिसंबर 2014

इंसानियत तो तब ही मर चुकी थी


इंसानियत तो
तब ही मर चुकी थी
जब इंसान इंसान से
नफरत करने लगा था
स्वार्थ में इंसान ने
हल के स्थान पर
हथियार उठाया था
धरती को
पेड़ पौधों के
स्थान पर खून से
रंगने लगा था
जाति धर्म भाषा 
रंग के नाम पर
ज़मीं को सरहदों में 
बाँधने लगा था 
इंसानियत तो
तब ही मर चुकी थी
जब इंसान खुद को
ख़ुदा से भी बड़ा
समझने लगा था
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
545-02-18-12-2014
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

इंसानियत ,जीवन,मानवता,इंसान,मनुष्य 

शनिवार, 6 दिसंबर 2014

कभी कभी मन को खुश कर लेता हूँ


कभी कभी मन को
खुश कर लेता हूँ
समय के कागज़ पर
भावनाओं की
कलम चला देता हूँ
कभी आड़ा तिरछा
कभी सीधा सच्चा
लिख देता हूँ
शब्दों से
चित्र बनाता हूँ
किसी को खुश
किसी को नाराज़ 
कर देता हूँ कुंठाओं की
अभिव्यक्ति को
तनाव मुक्त रहने का
साधन  समझता हूँ

© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
544-01-06-12-2014

तनाव,जीवन,कुंठा,कलम

बुधवार, 26 नवंबर 2014

कागज़ का टुकडा नहीं हूँ



कागज़
का टुकडा नहीं हूँ
लिखा और फाड़ दिया
जज़्बातों से भरे
धडकते
दिल का मालिक हूँ
निरंतर
मोहब्बत को तरसता हूँ
मोहब्बत में जीता हूँ
जिसका हो गया
एक बार
उसी का रहता हूँ
पुचकारे ये दुत्कारे
शौक से सहता हूँ
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
543-06-26-11-2014

मोहब्बत,ज़ज़्बात,शायरी,कागज़,book,selected

शनिवार, 15 नवंबर 2014

पानी पर कविता -चाहो तो जल कह दो


चाहो तो जल कह दो
चाहो तो पानी कह दो
चाहो तो आँख के आसूं
शरीर का पसीना कह दो
नाम कोई भी दे दो
नदी नाले में बहता हूँ
लहर बन कर समुद्र में
उछलता मचलता हूँ
कुए तालाब बांधों में
सीमाओं में बंध जाता हूँ
रात में ओस बन कर
पत्तों पर छा जाता हूँ
बादलों में बस कर
धरती को भिगोता हूँ
प्यासे की प्यास 
बुझाता हूँ
जीवों को जीवित 
रखता हूँ
ईश्वर की देन हूँ
प्रकृति का
अत्युत्तम रूप हूँ

542-05-15-11-2014

© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
जल.पानी,नीर,आसूं,प्रकृति,जीवन,

दिल करे तो क्या करे


दिल करे तो
क्या करे
मन कहे तो
किस से कहे
कोई जिए तो
कैसे जिए
जब ख्वाहिशें
अधूरी हो
चाहतों से दूरी हो
हसरतों की
नाकामी हो
ज़िंदगी
दायरों में बंधी हो
आँखों में नमी हो
लबों पर
झूठी हँसी हो
दिल करे तो
क्या करे
मन कहे तो
किस से कहे
541-04-15-11-2014
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

ज़िंदगी,मोहब्बत,दायरे,दिल 

सोमवार, 10 नवंबर 2014

संस्कारों का अर्थ बदलना होगा


ना तो अब
दशरथ से पिता होते हैं
ना ही राम से पुत्र होते हैं
किसी को
वनवास जाना पड़ेगा
तो पिता को
जाना पड़ेगा
समय के
साथ चलना पड़ेगा 
पुत्र की हर बात को
हँस कर मानना पड़ेगा
बुढ़ापे का
सहारा बनाना होगा
संस्कारों का
अर्थ बदलना होगा
रामायण का
नया रूप लिखना पड़ेगा
अयोध्या को
चित्रकूट बताना पड़ेगा  
540-03-10-11-2014

© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
राम,दशरथ,अयोध्या,चित्रकूट,बुढ़ापा,

रविवार, 9 नवंबर 2014

कहने को तो बहुत कुछ कह सकता हूँ

कहने को तो बहुत कुछ कह सकता हूँ

कहने को तो
बहुत कुछ
कह सकता हूँ
लम्बी लम्बी बातें
कर सकता हूँ
आवश्यक हो तो
चुप भी रहता हूँ
पर उतना ही
कहता हूँ
सुनने वाला
ना झुंझलाए
ना समय गँवाए
आसानी से
समझ जाए
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
539-02-09-11-2014

संवाद,कहना,सुनना.जीवन,selected 

शनिवार, 8 नवंबर 2014

शाश्वत सत्य

शाश्वत सत्य

पूर्णिमा को जन्मे
नन्हे पक्षी ने
जब हर दिन चन्द्रमा के
आकार को घटते देखा
घबरा कर
माँ से कहने लगा
मेरा आकार भी
इस तरह घटता रहा तो
एक दिन लुप्त हो जाऊंगा
माँ ने उसे स्नेह से
गले लगाया
सहलाते हुए समझाया
चन्द्रमा का आकर
जीवन का
शाश्वत सत्य बताता है
अमावस को पूर्णतया 
लुप्त हो जाता है
पूर्णिमा को
दुबारा जन्म लेता है
जीवन का यही नियम है
जो संसार में आता है
एक दिन चला जाता है
घबराओ मत
तुम्हारे साथ भी वही होगा
जो सबके साथ होता है
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
जीवन,चन्द्रमा,अमावस ,पूर्णिमा ,शाश्वत,सत्य, पक्षी
538-01-08 --11-2014

© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

सोमवार, 27 अक्तूबर 2014

चाटुकारिता का धर्म

चाटुकारिता का धर्म

आस्था निष्ठा से
चाटुकारिता का
धर्म निभाना
मनुष्य का स्वभाव
बन गया है
अपने से सक्षम के
क़दमों में लौटना 
सम्मान का
पैमाना हो गया है
गुण अवगुण को
ताक में रख कर 
जिससे भी
लाभ की आशा  हो
स्वार्थ में अब वही
भगवान हो गया है

© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
537-28-27--10-2014

चाटुकारिता,आस्था,जीवन,धर्म

रविवार, 26 अक्तूबर 2014

स्वप्न और यथार्थ

स्वप्न और यथार्थ

स्वप्न और यथार्थ
तर्क वितर्क में उलझे थे
स्वप्न का तर्क था
मनुष्य
स्वप्न नहीं देखेगा
तो आगे कैसे बढेगा
अपने आप में
सिमट कर रह जाएगा ?
यथार्थ ने उत्तर दिया
जब स्वप्न
पूरा नहीं होता
मनुष्य निराशा में
व्यथित होता
निरंतर असफलता से
हताश हो जाता है
स्वप्न मनुष्य को
भ्रम में रखते हैं  
इच्छाओं के
चक्रव्यूह में फंसाते हैं 
तर्क वितर्क सुन कर
कर्म चुप ना रह सका
तुरंत बोला
स्वप्न भी देखो
यथार्थ में भी जीओ
मुझे कभी ना भूलो
स्वयं पर विश्वास रखो
एक दिन ऐसा आयेगा
स्वप्न पूरा हो जाएगा
वही यथार्थ बन जाएगा
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
536-27-26--10-2014
स्वप्न,यथार्थ,कर्म,जीवन,सपने,

शनिवार, 25 अक्तूबर 2014

पैमाने

पैमाने 
=====

क्यों
हम किसी को
संदेह का
लाभ नहीं देते
एक वाक्य
एक घटना को
एक हरकत को
किसी के
व्यक्तित्व का
पैमाना बना लेते हैं
अपने सोच से
उसे अच्छा बुरा
समझने लगते हैं
त्रुटि हर
मनुष्य से होती है
गलत बात
हर मुंह से निकलती है
जानते हुए भी
खुद संदेह का
लाभ चाहते हैं
खुद के लिए
अलग पैमाने
दूसरों के लिए
अलग पैमाने रखते हैं

© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
535-26-25--10-2014

संदेह,जीवन,व्यवहार,सोच,पैमाना

दुखों से दोस्ती

दुखों से दोस्ती

दुखों से
दोस्ती नहीं करता
तो ज़ुबान को चुप
कैसे रख पाता
दुनिया के सामने
खुद का
तमाशा बनाता
किस ना किसी को
दोषी बताता 
दुःख तो कम नहीं होते
एक दुश्मन बढ़ा लेता
दुखों की सूची में
नया दुःख जोड़ देता
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
534-25-25--10-2014

दुःख,मित्र,दोस्ती,जीवन

जो जितना करीब होता है

जो जितना  करीब होता है

जो जितना
करीब होता है
उतना ही बारीकी से
हर बात को
परखता है
बड़ी अच्छाइयाँ 
भूल कर
छोटी बुराइयों में
रम जाता है
मनुष्य के
व्यक्तित्व का
सत्य मान लेता है
खुद को साहूकार
दुसरे को चोर
समझता है
संबंधों को
ध्वस्त कर देता है
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
533-24-25--10-2014

जीवन,परखना,अच्छाइयाँ,बुराइयां,सम्बन्ध

यूँ तुम्हारा बेवज़ह खौफ खाना


यूँ तुम्हारा
बेवज़ह खौफ खाना
मुझे समझ नहीं आता
गुनाह किया नहीं
गुनाहगार कहना
भी समझ नहीं आता
फैसला करने से पहले
मेरी इल्तजा पर
गौर कर लेना
मेरी निगाहों से खुद को
इक बार देख लेना
दिल तुम्हारा भी नहीं मचले
तो गुनाहगार करार दे देना
मुझे जो चाहे सजा दे देना
मचल जाए तो
पैगाम-ऐ-मोहब्बत
समझ कर
कबूल कर लेना
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
532-23-25--10-2014

चाहत,मोहब्बत,शायरी,

बुधवार, 22 अक्तूबर 2014

चेहरा सुन्दर ह्रदय कठोर था

चेहरा सुन्दर  ह्रदय कठोर था

चेहरा सुन्दर
ह्रदय कठोर था
रंग गोरा
ह्रदय काला था
बुद्धि से कुशाग्र
मगर संवेदनहीन था
खूबसूरत गुलदान में
गुल तो बहुत थे
मगर महकता
एक भी ना था
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
531-22-22--10-2014

संवेदना,संवेदनहीन ,बुद्धि,जीवन,गुण

किसी की मानूं ना मानूं

किसी की मानूं ना मानूं

किसी की मानूं
ना मानूं
आईने की हर बात
मान लेता हूँ
चेहरे की
झुर्रियों से ले कर
चेहरे के दाग तक
दिखा देता है
डरता हूँ
कहीं नाराज हो कर
दिल में छुपे राज
दुनिया को नहीं बता दे
इसलिए आईने को
सदा खुश रखता हूँ
उसकी हर बात को
सर झुका कर
मान लेता हूँ
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
530-21-22--10-2014

आइना,ज़िंदगी,

तुम अगर हम से ना मिलते

तुम अगर हम से ना मिलते

तुम अगर
हम से ना मिलते
ख्वाब ना दिखाते
ना मंज़िल के
रास्ते बदलते
ना उम्मीदों के
सिलसिले बनते 
सुकून से जी रहे होते
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
529-20-22--10-2014
अफ़साने,मोहब्बत,इल्जाम,तन्हाई,शायरी

मंगलवार, 21 अक्तूबर 2014

मेरा ईश्वर मेरे मन में बसा है


कभी गया नहीं काशी मथुरा
देखा नहीं तिरुपति उज्जैन
ना डुबकी लगाई संगम में
ना करी चार धाम की यात्रा
जीता रहा स्नेह भाईचारे से
कर्म करता रहा सच्चाई से
सत्य के पथ पर चलता रहा
मेरे घर के छोटे से मंदिर में
नित्य प्रभु दर्शन करता रहा
त्रुटियों की क्षमा माँगता रहा
मन की इच्छा कभी हुई नहीं
पुण्य कमाने तीर्थ यात्रा जाऊं
प्रभु को कही ओर शीश नवाऊँ
मेरा ईश्वर मेरे मन में बसा है
कभी उससे अलग ना हो पाऊँ
केवल इसी इच्छा से जीता हूँ
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
528-19-21--10-2014

पूजा,अर्चना,ईश्वर,मंदिर,तीर्थ,जीवन,प्रभु

सोमवार, 20 अक्तूबर 2014

मैं पहल करता हूँ


ना जाने क्यों तुमने
क्रोध को विवेक पर
हावी होने दिया
आसानी से कह दिया
मुझ से कोई रिश्ता
नहीं रखना चाहते
पर कहने से पहले
सोचा नहीं
रिश्ता मेरा ही नहीं
तुम्हारा भी टूटेगा
हृदय मेरा ही नहीं
तुम्हारा भी दुखी होगा
कहने से पहले
दो बार सोच लेते
क्रोध ठंडा होने के बाद
बैठ कर बात कर लेते
महायुद्ध भी संवाद से ही
समाप्त हुए हैं
मेरा तुम्हारा तो
वर्षों का साथ था
बार बार मिलने से
रिश्ता बना था
कैसे एक क्षण में उसे
क्रोध की भेंट चढ़ा दिया
अब भी समय है
तुम नहीं करना चाहो तो
अहंकार छोड़ कर
मैं पहल करता हूँ
संवाद से
मन को भ्रांतियों से
मुक्त कर दें
टूटे रिश्ते को
फिर से जोड़ दें
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

527-18-20--10-2014
क्रोध,विवेक,सम्बन्ध,जीवन,संवाद ,रिश्ता,रिश्ते

रिश्तों का रक्तचाप


मौसम के मानिंद
रिश्तों का रक्तचाप भी
निरंतर झूले सा
झूलता रहता है
कभी घटता
कभी बढ़ता
तो कभी सामान्य
हो जाता है
झुंझलाहट में
क्रोध में तनाव में
बढ़ जाता है
ख़ुशी में,सोहाद्र में 
मिल जुल कर हँसने से 
सामान्य हो जाता है
अपनों की पीड़ा
दुविधा को देख कर
दर्द की अनुभूति से 
कम हो जाता है
मौसम के मानिंद
रिश्तों का रक्तचाप
भी बार बार
बदलता रहता है
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
526-17-20--10-2014

रिश्ते,मौसम,रक्तचाप,जीवन 

शनिवार, 18 अक्तूबर 2014

क्या हुआ अगर आज मन उदास है


क्या हुआ अगर
आज मन उदास है
मन को मनाऊंगा
हृदय को समझाऊंगा
कल स्थितियों से
समझौता कर लूंगा
अगर बार बार
ऐसा ही होता रहेगा
तो कब तक
मन को मनाऊंगा
हृदय को समझाऊंगा
एक दिन थक जाऊंगा
निराशा के भंवर में
डूब जाऊंगा
भाग्य को दोष दूंगा
उदासी तो फिर भी
दूर नहीं कर पाऊंगा
क्यों ना फिर
जो हो रहा है उसे
खुशी से स्वीकार करूँ
सकारात्मक
सोच रख कर
सार्थक करने का
प्रयास करता रहूँ
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
525-16-18--10-2014

सकारात्मक सोच, जीवन,जीवन मन्त्र, भाग्य,

व्यक्तित्व के दाग


कपड़ों पर
दाग लग जाए
तुरंत बदल लेते हो
पाँव पर
कीचड लग जाए
तुरंत धो लेते हो
कुर्सी धूल से भरी ही
झाड़ पौछ कर बैढते हो
मन में ईर्ष्या द्वेष का
गंद भरा हो
ज़ुबान से कड़वे बोल
निकलते हो
हृदय में नफरत के
गोदाम भरे हो
सहेज कर रखते हो
जिनसे जीवन
सुधर सकता है
उनसे दूर रहते हो
वयक्तित्व पर लगे
दाग़ों को
कीमती गहनों सा
सम्हाल कर रखते हो
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
524-15-18--10-2014
जीवन,जीवन मन्त्र, वयक्तित्व


इच्छा


इच्छा है
जीवन वृक्ष के पत्ते
भले ही कम हो जाए
देखने में
तरो ताज़ा ना लगे
पंछी घोंसले नहीं 
बनाएं
राहगीरों को
छाया भी नहीं दे सके
पर कभी सूख कर
बेबस ठूठ नहीं बने
कुल्हाड़ी से कटे भी तो
कुछ हरे पत्ते लिए
मरने के बाद भी
लोग उसकी
जिंदादिली को 
याद रखें
उसके जैसे ही
जीने की 
इच्छा रखें
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
523-14-14--10-2014

जीवन,बेबस,इच्छा

सोमवार, 13 अक्तूबर 2014

पाकीजगी


मेरी हवस नहीं
दिल की सदा है
मेरे ज़ज्बात हैं
मेरा मन है
जो तुम को बुलाता है
मोहब्बत के खातिर नहीं
तुम्हारी पाकीजगी की 
वज़ह से
तुम्हारी नजदीकियां
चाहता हूँ 
बहुत खुद गर्ज़ हूँ
तुम्हारे जैसे ही
पाक बनना चाहता हूँ

© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

522-13-13--10-2014
पाक,पवित्रता,पाकीज़गी,हवस,शायरी

मेरा भी हश्र ऐसा ही होगा


खुशी होती है
जब एक कली फूल
बन कर महकती है
किसी को दुःख हो ना हो
मुझे दुःख होता है
जब फूल की पंखुड़ियां
मुरझा कर धरती पर
गिरती हैं
मेरी खुशी और दुःख से
किसी को कोई
फर्क नहीं पड़ता है
प्रकृति के 
नियम का पालन 
सैदेव होता रहा है
सैदेव होता रहेगा
जानता हूँ एक दिन
मेरा भी 
हश्र ऐसा ही होगा
कोई दुखी होगा
कोई चुपचाप 
देखता रहेगा
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
521-12-13--10-2014

दुःख,सुख,ख़ुशी,प्रकृति,जीवन

आज मिलते हैं कल बिछड़ जाते हैं


लोग
आज मिलते हैं
कल बिछड़ जाते हैं
ना जाने कौन सा
दस्तूर निभाते हैं
रुलाने के तरीके तो
और भी बहुत हैं
समझ नहीं पाता
अपना बन कर
क्यों रुलाते हैं
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
520-11-13--10-2014

मिलना,बिछड़ना,जीवन

रविवार, 12 अक्तूबर 2014

अपना पराया


मुझे रंज है
उससे जिस ने दिया
नाम अपने पराये का
वो अपने भी
अपने कैसे हुए
जो कभी दे ना सके
प्यार अपनों को
वो पराये भी
पराये कैसे हुए
जो देते हैं अपनों से
ज्यादा प्यार हम को
अब तोड़ दो जंजीरें
अपने पराये की
उसे ही अपना मान लो
जो अपना समझ कर
प्यार देता है हम को
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
519-10-12--10-2014

अपना,पराया,प्यार,अपनत्व,जीवन