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शनिवार, 9 नवंबर 2013

मुझे कौन जानता है


कौन जानता है
कौन पहचानता है
मुझे खुद को नहीं पता
बस इतना सा पता
जब भी सच लिखता हूँ
पत्थर बहुत पड़ते हैं
मैं ठहरा ढीठ इतना
ज़ख्म खा कर भी
रुकता नहीं हूँ
क्योंकि जानता हूँ
अब भी बहुत लोग
मन से सच्चे हैं
एक दोस्त खोता हूँ
दूसरा बना लेता हूँ
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
11-348-09-11-2013
मित्र,दोस्त,जीवन ,सच

तुम कुछ कहना चाहते हो मैं भी कुछ कहना चाहता हूँ


तुम कुछ कहना चाहते हो
मैं भी कुछ कहना चाहता हूँ
सोचो मत तुम भी कह दो
मेरी भी सुन लो
ठिठकते रहोगे नहीं कहोगे तो
संवादहीनता को जन्म दोगे
सम्बन्धों में भ्रम पैदा करोगे
तुम मेरे लिए अनुचित सोचोगे
मैं तुम्हारे लिएअनुचित सोचूंगा
इसकी परिणिति
कुंठा के पथ से होते हुए
द्वेष में बदलेगी
सम्बन्धों की बलि चढ़ेगी
अब देर मत करो
जो भी कहना चाहते हो
तुम भी कह दो
मेरी भी सुन लो
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
10-347-09-11-2013
ईर्ष्या,द्वेष,सम्बन्ध,रिश्ते,कुंठा,जीवन,

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

शुक्रवार, 8 नवंबर 2013

वो जब भी खुद के अफ़साने लिखेंगे


वो जब भी खुद के
अफ़साने लिखेंगे
कुछ तो सच भी लिखेंगे
मेरा नाम भी लिखेंगे
मुझ पर 
 तोहमतें भी लगाएंगे
खुद की
बेसुकूनी के लिए
मुझे कसूरवार भी
ठहराएंगे
मगर खुद के दिल से
सच कैसे  छुपाएंगे
मज़बूर हो कर
कुछ लम्हों के लिए
दिल की सुन लेंगे
गरूर भूल कर
कुछ अश्क़ वो भी
गिराएंगे
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
 09-346-08-11-2013

प्यार,मोहब्बत,गम,अफ़साने,सुकून,शायरी

गुरुवार, 7 नवंबर 2013

ना जाने फूलों को क्या हो गया है


ना जाने फूलों को
क्या हो गया है
शाख से जुड़ा रहना भी
उन्हें बुरा लगने लगा है
जिनके इंतज़ार में
बिताए थे दिन बेचैनी में
अब वो अंदाज़ फूलों को
खारा लगने लगा है
कली से फूल बनने तक
समझा था
दिल का टुकड़ा जन्हें
सींचा था
जिनके ज़िस्म को
अपने खून से
वो प्यार फूलों को अब
खुदगर्जी लगने लगा है
ना जाने फूलों को
क्या हो गया है  
  डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
08-345-07-11-2013

औलाद,संतान ,जीवन,शायरी  

ना चाहते हुए भी मुंह से निकल ही गया


दम तो बरसों से
घुट रहा था
पर जब शहीदों की
चिता पर राजनीती
होते देखी
तो आज रहा नहीं गया
अब देश को नेताओं से
मुक्त कर दो
ना चाहते हुए भी
मुंह से निकल ही गया
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
07-344-07-11-2013
शहीद,देश,राजनीति ,जीवन, नेता  

बुधवार, 6 नवंबर 2013

चारों ओर मोती बिखरे हुए हैं


चारों ओर
मोती बिखरे हुए हैं
कोई समेटने वाला
चाहिए
एक से एक हुनरमंद
लोग संसार में
पहचानने
वाली दृष्टि चाहिए
प्यार भरे ह्रदय
बसते आस पास
जानने के लिए
प्यार भरा ह्रदय
निश्छल मन चाहिए
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
06-343-06-11-2013
जीवन,प्यार,निश्छल मन,हूनर,
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर