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शनिवार, 26 अक्तूबर 2013

सन्नाटों से बहुत घबराता हूँ


सन्नाटों से बहुत
घबराता हूँ
सन्नाटा मन का हो
या कमरे का
ह्रदय में
सिहरन पैदा करता है
साथ ढूँढने के लिए
बाध्य करता है
साथ चाहे कलम का हो
किसी मनुष्य का हो
सन्नाटे से
बचा कर रखता है
अकेलेपन के राक्षस को
 मन में
प्रवेश नहीं करने देता
मन जानता है
अकेलापन मनुष्य को
जीने नहीं देता 
समय से पहले ही
संसार से विदा कर देता
23-330-26-10-2013
सन्नाटा ,अकेलापन,जीवन,जीवन मन्त्र,साथी,   

 डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

जो सब्र रखता है वो हँस कर जीता है


जो मिलता नहीं
शोर मचाने से
मिल जाता है 
चुप रहने से
जो हो नहीं पाता
क्रोध करने से
हो जाता है
शांत रहने से
जो विपत्ति में
घबराता है
पल पल रोता है
जीवन भर
कुढ़ता है
जो सब्र रखता है
हँस कर जीता है
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
22-329-26-10-2013

जीवन,जीवन मन्त्र,सब्र.सहनशीलता,हँसना 

शुक्रवार, 25 अक्तूबर 2013

सुबह पूरे जोश से उगा था सूरज


सुबह पूरे जोश से
उगा था सूरज
शाम
होते होते थक गया
क्षितिज के
पीछे अस्त हो गया
जाते जाते
मनुष्य  को बता गया
जोश सदा
एकसार नहीं रहता
उम्र के साथ
जोश भी ढल जाता
एक दिन मनुष्य भी
लाचार हो कर
अस्त हो जाता है
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
21-328-25-10-2013
जीवन,जीवन मन्त्र,बुढापा,जन्म,उम्र,म्रत्यु  

ना कहीं जा रहे हैं ना कहीं से आ रहे हैं


ना कहीं जा रहे हैं
ना कहीं से आ रहे हैं
ह्रदय में बोझ अवश्य
लादे चले जा रहे हैं
इर्ष्या द्वेष स्वार्थ होड़
अहम् को निरंतर
कुंठा की पिटारी में
भरे चले जा रहे हैं
शान्ति की खोज में
मन को रोगी
अवश्य बना रहे हैं
खुद की लगाई आग से
खुद को
जलाए जा रहे हैं
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
20-327-25-10-2013
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
इर्ष्या,द्वेष,स्वार्थ,होड़,अहम्,कुंठा,शान्ति , जीवन,जीवन मन्त्र,

गुरुवार, 24 अक्तूबर 2013

आज मित्रता से कलंक धो दिया


मन कुंठा से भरा हुआ था
विवशता में जी रहा था
सत्य पर पर्दा पडा हुआ था
आज मित्रता से कलंक
धो दिया
मित्र को प्रमाण दे दिया
दुश्मन को दुश्मन कह दिया
खोखले संबंधों को तोड़ दिया
मन को कुंठा मुक्त कर दिया
ह्रदय को दुःख अवश्य हुआ
पर महापाप से बच गया
आज नहीं करता तो
कल टूट कर बिखर जाता
मन सदा रोता रहता
मित्र शब्द से ही
घ्रणा करने लगता

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
19--326-24-10-2013


मित्र,मित्रता,जीवन,जीवन मन्त्र, कुंठा

मंगलवार, 22 अक्तूबर 2013

मित्र के दगा देने पर


मित्र के दगा देने पर
व्यथित मित्र ने पूछा
जब लोग मित्रता
निभा नहीं सकते
मित्र बनाते क्यों हैं
मैंने कहा मित्र
बनाए नहीं जाते
अपने आप बन जाते हैं
निभाना ना निभाना
अपने अपने सोच पर
निर्भर है
मित्रता में जो भी 
लेने की सोचता
शीघ्र ही मित्र खो देता
जो देने का सोच रखता
उसके मित्र बढ़ते जाते
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
17--324-22-10-2013
मित्र,मित्रता,जीवन,जीवन मन्त्र,


हर सपना पूरा नहीं होता


ना मंजिल मिली
ना तमन्नाएं पूरी हुयी
ज़िन्दगी की 
हकीकत से रूबरू 
ज़रूर हो गया
ज़िन्दगी का हर राज़ 
पता चल गया
उम्मीदों का सफ़र
कितना लंबा होता
हर सपना पूरा नहीं होता
न चाहने से कुछ हुआ
ना रोने से कुछ हुआ
अब जान गया हूँ
जो भी होता है
सब्र और 
ज़ज्बे से होता है
जब खुदा चाहता है
तब होता है
डा.राजेंद्र तेला निरंतर
16--323-22-10-2013


सब्र,ज़ज्बा,जिंदगी,जीवन जीवन मन्त्र 

सोमवार, 21 अक्तूबर 2013

मन का अन्धेरा


कमरे की
 खिड़की दरवाज़ा 
एक दिन बोले मुझसे
व्यथा में तुम हमें
बंद कर अँधेरे कोने में
बैठ जाते हो
 जब तक
हमें खुला नहीं रखोगे
ताज़ी हवा और उजाला
कैसे अन्दर आयेगा
मन का
अन्धेरा कैसे कम होगा
एक बार हमारे जीवन के
बारे में भी सोच कर देखो
हम भी मौसम की
मार सहते हैं
कभी प्रचंड गर्मी तो कभी
बर्फीली हवाओं से झूझते हैं
पर कभी व्यथित नहीं होते
ताज़ी हवा और उजाला ही
हमें व्यथा से बचाता है
मुझे दरवाज़े खिड़की की
बात समझ आ गयी
अब मैं कमरे के साथ साथ
ह्रदय का दरवाजा और
मन की खिड़की
खोल कर जीता हूँ
सब्र रख कर व्यथा
समाप्त होने की
प्रतीक्षा करता हूँ
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
15--322-21-10-2013
जीवन,जीवन मन्त्र ,व्यथा,व्यथित,सब्र

जब भी आइना देखो मेरी निगाहों से देखा करो


जब भी 
आइना देखो
मेरी निगाहों से 
देखा करो
मेरे दिल की चाहत को
इज्ज़त बख्शा करो
मेरी बात सुन कर
हैरान मत होना
मैंने तुम में खुदा देखा है
इतना सा चाहता हूँ
मेरे खुदा की इबादत
तुम भी किया करो
जब भी आइना देखो
मेरी निगाहों से 
देखा करो 
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
15--322-21-10-2013
मोहब्बत.शायरी,प्यार,खुदा,इबादत,love   

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

रविवार, 20 अक्तूबर 2013

मेरा अंत सुखद बना देना


मेरा अंत सुखद बना देना
==============
हे प्रभु
कुछ दो न दो
एक इच्छा अवश्य
पूरी कर देना
रात आँख मूंदूं
सुबह खोलू ही नहीं
ऐसी विदाई दे देना
गहरी नींद में ही
अपने पास बुला लेना
दुष्कर्मों का दंड तो
जीवन भर पाता रहा
सद्कर्मों का
पुरूस्कार दे देना
जीवन में तो शान्ति
मरीचिका ही रही
म्रत्यु में 
शान्ति दे देना
मेरा अंत 
सुखद बना देना
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
14--321-20-10-2013
जीवन.म्रत्यु,प्रार्थना,प्रभु,इश्वर ,परमात्मा