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शनिवार, 5 अक्तूबर 2013

यह कैसा ध्यान है


यह कैसा ध्यान है
============
दिन रात सुनता हूँ
जीवन में शांति चाहिए तो
मन को शांत करो
मन को शांत करने के लिए
ध्यान करो
ध्यान के लिए
बंद कमरे के एकांत में
जहां कोई ध्वनी
कानों में नहीं पड़े
आँखें बंद कर के
एकाग्रचित्त हो जाओ
मस्तिष्क में विचारों को
प्रवेश मत करने दो
समझ नहीं आता
यह कैसा ध्यान है
कोलाहल से भरे जीवन की
स्थितियों के विपरीत है
ध्यान करना ही है तो
संतुष्टि को लक्ष्य बनाओ
इच्छाओं को त्यागो
आवश्यकताएं कम करो
पकवानों से सजी
भॊजन की मेज़ पर
केवल दाल रोटी खाओ
होड़ के संसार में
होड़ से बचो
दिल्ली जाना है तो
मुंह तो दिल्ली की ओर करो
सोचना तो प्रारम्भ करो  
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
04--312-05-10-2013
जीवन,जीवन मन्त्र ,ध्यान ,संतुष्टि,इच्छाएं, लक्ष्य , त्यागो

शुक्रवार, 4 अक्तूबर 2013

एक बार सफलता मिल जाए


अहम् के उन्माद में लोग
क्या क्या नहीं करते हैं
एक बार सफलता मिल जाए
ऊंचाई पर  चढ़ जाएँ
दायरों में सिमट जाते हैं
खुद को दूसरों से
बेहतर समझने लगते हैं
खुद के
नियम कायदे बनाते हैं
दूसरों को भी
वैसे ही चलाना चाहते हैं
दूसरे क्या चाहते हैं
उससे अधिक
खुद क्या चाहते हैं
सिर्फ उसे ध्यान रखते हैं
संवेदनशीलता
भूल जाते हैं
03--311-04-10-2013
जीवन,सफलता,जीवन मन्त्र,अहम्,उन्माद,दायरे,कायदे

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

पेड़ों में छाँव नहीं है पक्षियों की चचाहट नहीं है


पेड़ों में
छाँव नहीं है
पक्षियों की
चचाहट नहीं है
नदियों में वेग नहीं है
पहाड़ों में ठंडक नहीं है
मनों में आस नहीं है
दिलों में साहस नहीं है
इंसानियत
का नाम नहीं है
मनुष्य प्रक्रति के
पीछे पडा है
स्वार्थ मनुष्य के
पीछे पडा है
दोनों ही तेज़ी से
पतन की ओर 
अग्रसर हैं
होड़ में लगे हैं
कौन जीतेगा
किसी का 
नाम-ओ-निशाँ
बाद में मिटेगा
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
02--310-04-10-2013
प्रक्रति,स्वार्थ,जीवन,विनाश,पर्यायवरण


मंगलवार, 1 अक्तूबर 2013

पक्षी भी संवेदनशील होते हैं


महकते फूलों
बहती पुरवाई के बीच
एक तोते को 
आँखों से 
नीर बहाते देखा
कई तोतों से घिरे देखा
मन विचलित हुआ
रहा ना गया
तोते  से उदासी का
कारण पूछा
तोता बोला प्रियतमा के
विरह में डूबा हूँ
यादों में खोया हूँ
इश्वर से
उसकी आत्मा की
शांति के लिए
प्रार्थना कर रहा हूँ
मित्र दुःख
प्रकट करने आये हैं
उसकी बात पर मुझे
विश्वास नहीं हुआ
मैंने हँसते हुए 
प्रश्न किया
क्या पक्षी भी
संवेदनशील होते हैं
तोता बोला
मनुष्यों से अधिक होते हैं
भले ही सहारा ना दे पाएं
पर दूसरे के दुःख में
कभी खुश नहीं होते हैं
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
01--309-01-10-2013
तोता,पक्षी,संवेदनशीलता,जीवन,जीवन मन्त्र


सोमवार, 30 सितंबर 2013

मेरी कविताओं में


मेरी कविताओं में
सौन्दर्य नहीं होता
कोई शीर्षक उन पर
खरा नहीं उतरता
उन पर किसी प्रसाधन का
उपयोग भी नहीं होता
पर उन्हें समझना
कठिन नहीं होता
जीवन के
हर पहलु को छूती हैं
पढने वाले को
अपनी बात लगती हैं
जो समझ गया
वो उसकी कहानी
जो नहीं समझा
वह भाग्य शाली
उसे अवसर नहीं मिला
सहने भुगतने का
विकृत सोच विचारों को
देखने पढने का
इर्ष्या द्वेष में जीने का
होड़ के जाल में फंसने का
इश्वर उसे ऐसा ही
जीवन देता रहे
मनुष्य के रूप में
मनुष्य बनाया रखे
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
64-308-30-09-2013

सोच,विचार,जीवन,जीवन मन्त्र ,कविता,इर्ष्या, द्वेष 
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 

छोटी बात में बड़ी बात


बड़े मकान की
बड़ी खिड़की से झांका 
हरे भरे लहलहाते
वृक्षों से भरा द्रश्य दिखा
नदी में बहता निर्मल जल
पक्षियों का कलरव
प्रेम में डूबा फाख्ता का
जोड़ा दिखाई दिखा
मकान के छोटे से कमरे की
छोटी सी खिड़की से देखा
वही द्रश्य दिखाई दिया
मकान की छत पर
जाकर देखा
वहाँ से भी वही दिखा
जो पहले देख चुका था
अब तक समझ चुका था
मन की आँखें खुली हो
दृष्टि विहंगम हो
सोच सार्थक
सकारात्मक हो
छोटी बात में भी
बड़ी बात दिख सकती है
63-307-30-09-2013
सोच,विचार,जीवन,जीवन मन्त्र ,

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 

हर बात के पीछे एक बात छुपी होती है


गहराई से सोचो तो
हर बात के पीछे
एक बात छुपी होती है
सोच के पीछे समझ
विचारों के पीछे
मनन छुपा होता है
राम को याद करो तो
पीछे पीछे
रावण चला आता है 
ईमान के  पीछे
बेइमान छुपा होता है
हैवान सदा इंसान के
साथ चलता है
प्यार नफरत का साथ
जन्म 
जन्मान्तर होता है 
कविता के पीछे 
कवि होता है
मौत के
पीछे 
 यमराज का हाथ होता है
गहराई से सोचो तो
हर बात के पीछे
एक बात छुपी होती है 

© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
62-306-29-09-2013
सोच.विचार,जीवन
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 

रविवार, 29 सितंबर 2013

यादें बड़ी बदतमीज़ होती हैं


यादें बड़ी
बदतमीज़ होती हैं
वक़्त की 
नजाकत समझे बिना
मन मर्जी से
आ जाती हैं
प्यार से समझाओ
या डांट लगाओ तो
मानती नहीं हैं
भगाना भी चाहो तो
बदतमीजी की
हद पार करती हैं
जिद पर अड़ जाती हैं
जैसे नेता कुर्सी से
चिपक जाते हैं
वैसे ही मन से
चिपक जाती हैं
61-305-29-09-2013
यादें ,जीवन जीवन मन्त्र

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 

अकेला नहीं हूँ


अकेला नहीं हूँ
तुम्हारी तरह
भीड़ में रहता हूँ
भीड़ के साथ चलता भी हूँ
पर वह नहीं कर पाता
जो भीड़ करती है
भीड़ में रहते हुए भी
अलग थलग चलता हूँ
भीड़ के विकृत चेहरे को
कार्यकलापों को
समीप से देखता हूँ
क्या क्या नहीं करना है
मन में बिठाता हूँ
लोग कटाक्ष करते हैं
जब भीड़ की बातें
पसंद नहीं हैं
भीड़ से अलग
क्यों नहीं हो जाता हूँ
भ्रम में डूबे लोगों को तो
कुछ नहीं कहता हूँ
सोचता अवश्य हूँ
भीड़ में नहीं रहूँगा तो
उसकी विकृतियों
और मानसिकता को
कैसे समझ पाऊंगा
सुलझा हुआ जीवन
जीने की चाह
मन में रखने वालों को
क्या समझा पाऊंगा ?

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
60-304-29-09-2013
समाज,मानसिकता,विकृतियाँ ,जीवन जीवन मन्त्र