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शनिवार, 28 सितंबर 2013

जब भी आइने में सूरत देखता हूँ


जब भी आइने में
सूरत देखता हूँ
खुद को ज़माने से
एक कदम पीछे पाता हूँ
लाख कोशिशों के बाद भी
ज़माने के क़दमों से
कदम नहीं मिला पाता हूँ
इसे मेरी फितरत कहूं
या कमज़ोरी
कम में जीना मंज़ूर मुझे
होड़ में नहीं जी पाता हूँ

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
59-303-28-09-2013
जीवन,जीवन मन्त्र,होड़,

मैं भीड़ में भी अकेला हूँ


भीड़ में भी
अकेला हूँ
यह पीड़ा नहीं 
उपलब्धि है
इर्ष्या द्वेष स्वार्थ के
कोलाहल से दूरी है
होड़ की मरीचिका से
मुक्ति है
इच्छाओं की बलि है
आवश्यकताओं में 
कंजूसी है
बंद कमरे में ध्यान से
बचने की मेरी युक्ति है
आत्म संतुष्टि की पूर्ती है
क्योंकि शान्ति के
लक्ष्य पर मेरी दृष्टि है 
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
59-303-28-09-2013

जीवन ,जीवन मन्त्र,होड़,इर्ष्या,स्वार्थ,भीड़,संसार 
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 

शुक्रवार, 27 सितंबर 2013

जीवन के सत्य से परिचय


जंगल के 
एकांत में स्थित 
कुए में
पास लगे वृक्ष का
एक पत्ता गिर जाए
एकाग्रचित्त शांत पानी
बिलबिला उठता है
आकाश को छूती
पर्वत की चोटियों के
निश्चल वातावरण में
एक परिंदा फडफडा जाए
नीरव वातावरण में
कोलाहल जन्म लेता है
शांत सुचारू जीवन में
एक दुर्घटना जीवन की
दिशा दशा बदल देती है
जीवन के सत्य से
परिचय करा देती है
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर    
58-302-27-09-2013
जीवन,दुर्घटना,जीवन मन्त्र,जीवन सत्य

आज वो नज़र आ गए


आज वो
 नज़र आ गए
यादों के बाँध के
दरवाज़े खुल गए
कल कल करता
टूटे रिश्तों का पानी
धड धडा कर बहने लगा
कैसे रिश्तों की
ज़मीन में दरार पडी
अहम् ने खाई में बदल दी
किनारे इतने दूर हो गए
चाह कर भी फिर 
मिल नहीं सके
साथ बिताए समय का
एक एक द्रश्य आँखों के
सामने से गुजरने लगा
ह्रदय पीड़ा से भरने लगा
आँखों से अश्रु 
निकलने ही वाले थे
मैंने मन को कठोर किया
फिर ह्रदय से प्रश्न किया
क्यों फिर से
चक्रव्यूह में 
फंसना चाहती हो
पहले जो भुगता
क्या वो कम नहीं था
भूल जाओ
जो छूट  गया 

उसे छूट जाने दो
आगे बढ़ो कुछ नया करो
कोई नया साथ ढूंढों
दिल से दिल
मन से मन मिलाओ
अहम् को ताक में रखो
जो पहले करा अब ना करना
हँसते हुए 
सफ़र पर चल पड़ो
57-301-27-09-2013
यादें,रिश्ते,सम्बन्ध,अहम्,जीवन,जीवन मन्त्र

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

गुरुवार, 26 सितंबर 2013

प्रेम की कसौटी


क्षितिज पर धरा का
गगन से मिलन 

दोनों का प्रेम 
दिखता तो है
सत्य है या भ्रम
पता 
नहीं चलता 
पति पत्नी में
प्रेम है या नहीं
  पता 
नहीं चलता 
मन में झाँक कर
देखना संभव नहीं
एक दूजे में आस्था
विश्वास ही
प्रेम की कसौटी है
किसी के मन में
झाँक कर देखने की
आवश्यकता नहीं 

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
54-298-26-09-2013

प्रेम,आस्था,विश्वास,जीवन,जीवन मन्त्र,पति पत्नी 
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

अपनी प्रशंसा को सत्य मानूं


अपनी प्रशंसा को
सत्य मानूं
उसे सर पर चढ़ाऊँ
या शिष्टाचार समझूं
यह तो
तय नहीं कर पाया
अब तक
पर इतना अवश्य
तय कर लिया
प्रशंसा के पीछे का
कारण ढूंढें बिना
पहले से अच्छा
करने का प्रयत्न
करता रहूँ
अपने चाहनेवालों को
निराश नहीं करूँ
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
53-297-26-09-2013
प्रशंसा,जीवन,जीवन मन्त्र

बुधवार, 25 सितंबर 2013

कभी कभी मजबूरियां भी वो काम करती हैं


कभी कभी
मजबूरियां भी
वो काम करती हैं
जो मोहब्बत भी
कभी नहीं कर सकती
मन मिले ना मिले
दिल मिले ना मिले
साथ रहने लिए
मजबूर करती हैं
दिलों की दूरियों को
कम करने का
काम करती हैं  

52-296-25-09-2013
मजबूरियां,मोहब्बत,शायरी,दूरियां,नजदीकियां 
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर


मंगलवार, 24 सितंबर 2013

अच्छा मनुष्य


चंद्रमा दूज का हो
पूर्णिमा का हो
मन को भाता है
फूल कीचड में 
खिला हो
काँटों में खिला हो
मन को लुभाता है
अच्छा मनुष्य
गाँव 
कस्बे शहर का हो
किसी भी देश का हो
सब को सुहाता है
51-295-24-09-2013
अच्छा मनुष्य,जीवन,

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर    

गंगा में नहाया पुष्कर में नहाया


गंगा में नहाया
पुष्कर में नहाया
संगम में डुबकी
लगा कर आया
हर पवित्र
नदी सरोवर में 
जल अस्वच्छ पाया
सोच में पड़ गया
मनुष्य आस्था के
पवित्र स्थान को भी
स्वच्छ नहीं रखता
मन को स्वच्छ
कैसे रखता होगा
इनमें
डुबकी लगाने मात्र से
मन में मोक्ष पाने की
इच्छा रखता
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर   
धर्म.आस्था,नदी,सरोवर,मोक्ष,जीवन,जीवन मन्त्र
50-294-24-09-2013

सोमवार, 23 सितंबर 2013

इतना बेबस भी नहीं हूँ


इतना
बेबस भी नहीं हूँ
बेबसी के
गीत गाता रहूँ
इतना खुश भी नहीं हूँ
ख़ुशी से नाचता रहूँ
आधा उजाला
आधा अन्धेरा हूँ
हँसने के समय हँसना
रोने के समय रोता हूँ 

जैसा समय आये
वैसे ही जीता हूँ 

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
49-293-23-09-2013
बेबसी,खुशी,गम ,दुःख,जिंदगी,जीवन जीवन मन्त्र,

असमंजस से बचने के लिए


किसे ह्रदय में
किसे मन में
किसे मस्तिष्क में
बसा कर रखूँ
ह्रदय मन मष्तिष्क
तीनों ही किसी ना
किसी कारण से
किसी ना किसी को
अपने अन्दर
बसाना चाहते हैं
असमंजस से
बचने के लिए
तय कर लिया है
क्यों ना ह्रदय 
मन मस्तिष्क के
कपाट खुले रखूँ
जो जहां भी रहना चाहे
जब तक रहना चाहे
खुशी से रहता रहे
जाने का मन हो तो
बता कर ना जाये
जाते जाते दुःख का
कारण तो ना बने
 डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
48-292-23-09-2013
मन,मस्तिष्क,ह्रदय,जीवन,जीवन मन्त्र,प्रेम,स्नेह

रविवार, 22 सितंबर 2013

छोटे कदमों से


जब
छोटे कदमों से
सहज भाव से
लक्ष्य तक
पहुँच सकता हूँ
बड़े क़दमों से
तेज़ गति से
क्यों चलूँ
असंतुलन
को निमंत्रण दूं
थक कर
ह्रदयगति बढाऊँ
खुद को
असहज करूँ

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
47-291-22-09-2013
सहजता,जीवन,जीवन मन्त्र,लक्ष्य ,धैर्य

मानवता का संसार


मानवता का संसार 
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लोग कहते हैं
सूना हो गया
मानवता का संसार
बचा नहीं शिष्टाचार
विस्तृत हो गया
स्वार्थ का बाज़ार
लोगों की बातों पर
मैं भी गर्दन हिलाता हूँ
हाँ में हाँ मिलाता हूँ
अकेले में जब सोचता हूँ
शर्म से गढ़ जाता हूँ
खुद में भी
मानवता के बाज़ार का
एक दुकानदार पाता हूँ
जो केवल बातें बेचता है
मानवता की संपत्ति
खरीदने की 
इच्छा नहीं रखता
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
46-290-22-09-2013
मानवता,संसार,जीवन, स्वार्थ,आचार व्यवहार