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शनिवार, 21 सितंबर 2013

काश टुकडो टुकड़ों में गम भी देख लेता


जिंदगी भर
खुशियों की तलाश में
भटकता रहा
जिंदगी में
गम भी होते हैं
याद ना रहा
अब जब ग़मों से
पाला पडा है
सामना करना
मुश्किल लग रहा है
अब सोचता हूँ
काश टुकडो टुकड़ों में
गम भी देख लेता
तो आज इतना
सहना ना पड़ता

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
 46-290-21-09-2013
गिन्दगी,गम,ख़ुशी
  

अवसाद के क्षणों में


अवसाद के क्षणों में
मनुष्य निशब्द हो जाता
स्वयं को असहाय पाता
चेहरे से
विषाद झाँकने लगता 
अश्रुधारा अवसाद को
उजागर करती
विचारों से त्रस्त मन
पिंजरे में बंद पंछी सा
फडफडाने लगता
भविष्य की
अंधेरी गलियों का
कोना कोना छानने में
व्यस्त हो जाता
नकारात्मकता के
हर पहलु को समीप से
देखने लगता
पीड़ा ग्रस्त ह्रदय
असमंजित अवस्था में
केवल शान्ति चाहता
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर   
45-289-21-09-2013
अवसाद,दुःख,विषाद,जीवन,पीड़ा ,कष्ट

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर   

शुक्रवार, 20 सितंबर 2013

लचीलापन


तूफ़ान से लडती 
तेज़ी से हिलती
 नीम की पतली सी
टहनी पर दृष्टि पडी
बची रहेगी या टूट कर
धरती पर गिर जायेगी
मन की जिज्ञासा बढ़ी
मोटी डालियाँ
तूफ़ान की मार
सह न सकी
मगर नन्ही टहनी
नीम पर झूमती रही
बात समझ में आ गयी
जीवन के लिए
ताकत ही
आवश्यक नहीं होती
लचीला होना भी
मनुष्य की ताकत
बन सकती है
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
44-288-20-09-2013
नम्रता,लचीलापन,जीवन,ताकत,जीवन मन्त्र 


























अनकही रह जाती हैं कुछ बातें


अनकही 
रह जाती हैं कुछ बातें
जिंदगी भर मन में
तांडव मचाती  हैं
कहूँ ना कहूँ के
भंवर में फंसी रहती हैं
कई बार जुबां तक
आकर अटक जाती हैं
उचित अनुचित में
उलझ जाती हैं
नतीजे से डरती हैं
निरंतर पशोपश में
रखती हैं
अनिश्चय के जाल से
निकल नहीं पाती हैं
अनकही 
रह जाती हैं कुछ बातें
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
43-287-20-09-2013
जीवन,बातें,पसोपश,उचित अनुचित

सद्गुण-अवगुण


 गगन में
असंख्य तारों के
बीच भी चंद्रमा 
विशिष्ट स्थान
रखता है 
सफ़ेद चादर पर
छोटा सा काला धब्बा
आँखों से छुप नहीं पाता
एक सद्गुण मनष्य के
व्यक्तित्व को निखारता है
अनेकानेक सद्गुण
मनुष्य को मनुष्यों में
श्रेष्ठ बनाते हैं
व्यक्तित्व में एक अवगुण
कई सद्गुणों को
ढक देता है
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
42-286-20-09-2013
जीवन,जीवन मन्त्र,चरित्र,व्यक्तित्व,सद्गुण ,अवगुण

गुरुवार, 19 सितंबर 2013

बात तो सोची थी बरसों पहले जुबां से मगर आज ही निकली

बात तो सोची थी
बरसों पहले
जुबां से मगर
आज ही निकली
कैसा होता अगर ये
दुनिया ना होती
ये लोग ना होते
धरती पर केवल 
हरे भरे फल फूलों से 
लदे वृक्ष होते
गगन में
उड़ते मस्त परिंदे होते
मीठे जल के सोते होते
लहराती 
बहती नदियाँ होती
इठलाता
मचलता सागर होता
बादल पहाड़ों से
अठखेलियाँ करते
हर गले को वर्षा
तर करती
झूमती हवाएं संगीत
सुनाती
कोई किसी से इर्ष्या
ना करता
द्वेष का तो 
नाम तक ना होता
तेरा मेरा 
कोई ना जानता
सब जीते 
औरों को जीने देते 
बात तो
सोची थी बरसों पहले
जुबां से
मगर आज ही निकली
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
41-285-19-09-2013
प्रक्रति ,वृक्ष,पर्यायवरण,समय,जीवन, इर्ष्या,दुनिया,जीवन मन्त्र 
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

बुधवार, 18 सितंबर 2013

क्या क्या समेटूं कहाँ कहाँ समेटूं


क्या क्या समेटूं
कहाँ कहाँ समेटूं
कितना समेटूं
जितना समेटूं
उतना ही कम है
सब कुछ इतना
बिखर चुका है
हाथों से 
निकल चुका है
अब खुद को
समेट कर रख लूं
इतना ही बहुत है


© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
 
40-284-18-09-2013
दुःख,सुख,जीवन,जीवन मन्त्र,

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

दुःख तो केवल दुःख होता है


दुःख को जिसने भी
जितना बड़ा समझा
दुःख ने भी उसका
उतना ही 
साथ निभाया
उसे उतना ही
बड़ा दिखाया
विछोह के दुःख को
मोह ने बढाया
माया के दुःख को
इच्छाओं ने बढाया
असफलता के दुःख को
सपनों ने बढाया
प्रेम के दुःख को
आसक्ति ने बढाया
जितना भी मानों
उतना ही कम है
दुःख तो
केवल दुःख होता है
सहजता से लो तो
दर्द कम होता है
पहाड़ समझो तो
दुर्गम लगता है
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
39-283-18-09-2013
दुःख,सुख,जीवन,जीवन मन्त्र,आशाएं,इच्छाएं 


इंसान से नहीं उसकी आँखों से डरने लगा हूँ


अब इंसान से नहीं
उसकी आँखों से 
डरने लगा हूँ
हर वक़्त शक से 
देखती हैं
हर लम्हा मुझे 
तोलती हैं
अपना दुश्मन समझती हैं
घबरा कर हाथों में
चेहरा भी छुपा लूं
तो सरे आम पूछती हैं
जब मन में चोर नहीं है
फिर चेहरा क्यों छुपाया
ना खुद सुकून से 
रहती हैं
ना मुझे सुकून से 
रहने देती हैं
हर वक़्त मुझे 
घूरती रहती हैं 
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
38-282-18-09-2013
शक,आँखें,अविश्वास,जीवन,जीवन मन्त्र    

मंगलवार, 17 सितंबर 2013

खुद झूठ में लिप्त हूँ


जब खुद ने ही छला
खुद को कई बार
तब पछतावा नहीं
कोई और छले तो
बैर रखूँ 
मैं करूँ तो उचित
कोई और करे
तो अनुचित
खुद झूठ में लिप्त हूँ
आवरण में जीता हूँ
फिर दूसरों के लिए
नियम अलग कयों? 


© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
 
37-281-17-09-2013
सच,झूठ,आवरण,जीवन,जीवन मन्त्र   

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर