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शनिवार, 14 सितंबर 2013

हिंदी दिवस पर कविता-हिंदी की पीड़ा


हिंदी दिवस पर
छात्र ने कविता में
मन की भावनाएं
प्रकट करी
जी भर के
हिंदी की प्रशंसा करी
उसे मात्र भाषा
राष्ट्र भाषा कहा
सब भाषाओं में
श्रेष्ठ बताया
कविता पढ़ कर
छात्र ने गुरूजी से
पूछ लिया
सर आपको हिंदी पर
मेरी पोयम कैसी लगी
गुरूजी बोले
पोयम तो अच्छी है
पर थोड़ी सी शोर्ट है
कुछ लाइन्स और लिखते
तो एक्सीलेंट पोयम
कहलाती
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
33-277-14-09-2013
भाषा ,हिंदी ,व्यंग्य 

हर महिला से अधिक सुन्दर थी

कद छोटा
वर्ण श्यामल
ऐसा कुछ भी नहीं
जिससे मनुष्य
सुन्दर कहलाता
आचरण शुद्ध
व्यवहार मन लुभावन
हिम्मत पहाड़ों सी
लगन हवाओं सी
हँसी जैसे मंदिर की
घंटियाँ बजती
कानों में पड़ते ही
प्रभु स्मरण कराती
सतरंगी प्रतिभा
हर क्षेत्र में आगे रखती
अहंकार से दूर
शारीरिक सुन्दरता से
वंचित थी
हर महिला से
अधिक सुन्दर थी
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
32-276-14-09-2013
सुन्दरता,प्रतिभा,व्यवहार आचरण,,जीवन,जीवन मन्त्र 
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

शुक्रवार, 13 सितंबर 2013

वक़्त कट जाए जितना उतना ही अच्छा है


वक़्त
कट जाए जितना
उतना ही अच्छा है
बात में कितना दम है
जिनका नहीं कटता 
उनसे पूछ लो
हर पल पहाड़ सा लगता
आँखें घडी के काँटों
अटकती
कांटे मगर जिद पर
अड़े लगते
एक मिनिट भी
दो मिनिट में पूरा होता
मन में चिंता चेहरे पर
तनाव झलकने लगता
क्या करूँ
मेरा मन नहीं लगता
वक़्त काटे नहीं कटता
हर मिलने वाले को
सुनना पड़ता
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
31-275-13-09-2013
वक़्त,समय,मन लगना ,जीवन,अनमना


मन की खिड़कियाँ


मन की खिड़कियाँ
कितनी भी खुली हो
मन के आँगन में अगर
नकारात्मकता की
धूल ज़मी हो 
सकारात्मकता की
ताज़ी हवा भी
मन की धूल
साफ़ नहीं कर सकती
मन को
नकारात्मकता की
धूल से बचाने के लिए
स्वयं पर विश्वास का
होना आवश्यक होता है

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
30-274-13-09-2013
  

सोच,जीवन,जीवन मन्त्र ,विश्वास , नकारात्मकता ,सकारात्मकता

गुरुवार, 12 सितंबर 2013

प्रेम की प्यास


नदी जब तक 
समुद्र से 
मिलती नहीं 
प्रेम की प्यास
बुझती नहीं
व्याकुलता में
अनमने भाव से
बहती रहती
क्रोध में कहीं
कोई नाव उलटती
डूबा कर
कोई जान लेती
बस्तियां
जलमग्न करती
जब तक
मिलन नहीं होता
समुद्र से
शांत नहीं होती
लक्ष्य से
मिलन होते ही
प्रेम में डूब जाती
सदा के लिए
उसमें समा जाती 

© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
29-273-12-09-2013
प्रेम ,प्यार ,व्याकुलता ,मिलन ,जीवन,मोहब्बत

 डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 

बुधवार, 11 सितंबर 2013

फूल खिला नहीं महकेगा कैसे


फूल खिला नहीं
महकेगा कैसे
हसरतें परवान
चढी नहीं
सुकून मिलेगा कैसे
मांझी के बिना
किश्ती को
साहिल मिलेगा कैसे
मोहब्बत के बिना
तन्हाइयों को शोर
मिलेगा कैसे
महबूब के बिना चेहरा
मुस्कारायेगा कैसे    
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
27-271-11-09-2013
शायरी,मोहब्बत,प्यार,सुकून

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

गले मिलो ना मिलो देख कर मुस्काराया तो करो


गले मिलो ना मिलो
देख कर 
मुस्काराया तो करो
हर छोटी बड़ी बात का
फसाना मत बनाया करो
नौक झोंक तो ज़िन्दगी में
होती ही रहती है
मगर उसे दुश्मनी का
पैमाना मत बनाया करो
माना दिल में दर्द होता है
मगर दर्द का इलाज़
नफरत में मत ढूंढा करो
गले मिलो ना मिलो
देख कर 
मुस्काराया तो करो
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
26-270-11-09-2013
नौक झोंक,दोस्ती,दुश्मनी,नफरत,जिंदगी,जीवन मन्त्र ,रिश्ते

मंगलवार, 10 सितंबर 2013

दुखों का घडा विचित्र बहुत है


दुखों का घडा
विचित्र बहुत है 
बड़ा इतना
कभी भरता नहीं है
जिद्दी इतना
कभी गिरता नहीं है
मज़बूत इतना
कभी टूटता नहीं
आशा को निराशा में
बदलने में माहिर
कभी हँसाता नहीं
रुलाता बहुत है
कभी थकता नहीं
मगर थकाता बहुत है
दुखों का घडा
जिसने भी घडा
उसका न्याय
विचित्र बहुत है
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
25-269-11-09-2013
दुःख,जीवन,ज़िद,विचित्र

विरह की उदासी


ये सीना
अब झूमते ह्रदय का
बसेरा नहीं 
इच्छाओं की
समाधी है
जहां सपनों की 
नदी बहती थी कभी
वहां अब
मरघट की शान्ति है
इन आँखों में
अब आशाओं की
चमक नहीं
विरह की उदासी है
अब चेहरे पर
बसंत का रंग नहीं
पतझड़ की रुदाली है
अब चलता फिरता
इंसान नहीं
घिसटती हुयी
लाचारी हूँ
उसके बिना जीवन
अब जीवन नहीं
मजबूरी है
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर  
24-268-11-09-2013
दुःख.विरह,उदासी,प्रेम,लाचारी.जीवन

  

सोमवार, 9 सितंबर 2013

धूप बोली चांदनी से


धूप बोली चांदनी से
सदियों पुराने रिवाज़ से
अब मुक्त हो जाओ
तुम समझाओ चाँद को
मैं समझाऊंगी सूरज को
कभी मैं रात को छाऊँ
कभी तुम दिन में छाओ
शाम सवेरे ने बात सुनी
उनके मन व्यथा जन्मी
दोनों एक साथ बोल उठे
कौन पूछेगा
फिर शाम सवेरे को
क्यों परमात्मा का
नियम तोड़ना चाहते हो
केवल 
अपना हित सोचते हो
हमारा भी ध्यान करो
भावनाओं का सम्मान करो
मिल जुल कर साथ रहो
सहभागिता से जीओ
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
23-267-10-09-2013
जीवन,जीवन मन्त्र, सहभागिता, चाँद,सूरज,व्यथा, धूप, रिवाज़

अहम् के उन्माद में


देवताओं ने भी
नहीं सोचा होगा
अहम् के उन्माद में
मनुष्य धरती पर
तांडव मचाएगा
प्रक्रति के हर रंग को
बदरंग कर देगा
इर्ष्या द्वेष में
मनुष्य मनुष्य का
दुश्मन हो जाएगा
अपनों को भी पराया
समझेगा
होड़ में मनुष्य से
दानव बन जाएगा
पता होता अगर
देवताओं को
मनुष्य के मंतव्य का
मनुष्य के स्थान पर
धरती को केवल
प्रक्रति के रंगों से भर देते
स्वर्ग से निहार कर
मन को प्रसन्न करते
ह्रदय को कभी
व्यथित ना होने देते

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
21-265-09-09-2013

अहम् ,मनुष्य,होड़ ,इर्ष्य,द्वेष,देवता,तांडव,जीवन,

रविवार, 8 सितंबर 2013

म्रत्यु भय


अंतिम 
समय निकट था
पलंग पर 

लाचार पड़ा था 
इतना सह चुका था
इतना थक चुका था
ना भावनाएं मचल 
रही थीं
ना जीने की इच्छा 
बची थी
आँखें धंस चुकी थी,
सांस अटक रही थी
जीवन से द्वंद्व की
अंतिम कोशिश थी
कभी पाँव हिलाता
कभी कुछ कहने का
निष्फल प्रयास करता
बुलावा आ चुका था
वो जानता था या नहीं
पर आस पास खडा
हर व्यक्ति जानता था
अपना भविष्य देख कर
मन ही मन घबरा रहा था
पास खड़े व्यक्ति को
हिम्मत बंधा कर
हिम्मत बटोर रहा था

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
20-264-08-09-2013

जीवन,अंतिम समय,भविष्य म्रत्यु,भय मौत,म्रत्यु,

दुखों को चौराहे पर मत टांगो

दुखों को
चौराहे पर मत टांगो
स्वयं को
निर्बल मत दर्शाओ
हर आता जाता व्यक्ति
अपने सोच से
गुण दोष निकालेगा
कारण पूछेगा
कोई सहानूभूति दिखाएगा
कोई छींटाकशी करेगा
तुम्हें ही कारण बताएगा
दुःख कम होने के स्थान पर
उलटे बढ़ जायेंगे
दुखों को धैर्य की
कोठरी में डाल दो
इश्वर से प्रार्थना करो
स्वयं पर विश्वास रखो
समय के साथ थक कर
दुःख साथ छोड़ देंगे
जीवन में
सुख का प्रवेश होने देंगे
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
19-263-08-09-2013


जीवन,जीवन मन्त्र,सुख दुःख,धैर्य