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शनिवार, 31 अगस्त 2013

छोटा सा कटाक्ष


जुबान का फिसलना
क़यामत ढाह गया
छोटा सा कटाक्ष
ह्रदय में शूल बन कर
चुभ गया
संवाद के अभाव में
ज़ख्म बन गया
मन पर अहम् का
भूत सवार हो गया
कौन पहल करे
सम्मान का प्रश्न
बन गया
दोस्ती का रिश्ता
ध्वस्त हो गया
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
109-243-31-08-2013

रिश्ते,अहम्,दोस्ती,कटाक्ष,जुबान ,जीवन,जीवन मन्त्र 

करना भी होता है


रात भर सोचता रहा
अनभूतियों से भरी
यादगार रचना लिखूं
पाठकों के मन को
झंझोड़ कर रख दूं
सोचने पर मजबूर कर दूं
रात गुजर गयी
कलम हाथ में रह गयी
रचना का
सृजन तो हो नहीं पाया
पर मन अशांत हो गया
अनिद्रा से आँखें
लाल हो गयीं
ऊँगलियाँ दर्द करने लगी
सुबह होते होते
समझ में आ गया
केवल सोचने से
काम नहीं चलता
करना भी होता है
108-242-31-08-2013

जीवन, जीवन अमृत,कर्म,सोच,सोचना, सृजन
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

गंगा पर कविता - गंगा भी मचलती है


गंगा भी मचलती है
उपेक्षा से उफनती है 
प्रदूषण से क्रोधित हो
पूरे वेग से छलकती है
गाँव शहर बस्ती 
जल मग्न करती हैं
संसार को दर्शाती है
निश्छल स्वरुप से
छेड़खानी नहीं सहेगी
पवित्रता को कलंकित
नहीं होने देगी
हर कुत्सित प्रयास को
निष्फल करके रहेगी
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
107-241-31-08-2013




प्रदूषण,प्रक्रति,गंगा,पर्यायवरण,नदी

शुक्रवार, 30 अगस्त 2013

पत्ते पर कविता - कितना कुछ कह जाते हैं पत्ते


पत्ते पर कविता - कितना कुछ कह जाते हैं पत्ते 
कोंपल से
पत्ता बनने तक
पत्ता बनने से
झड़ने तक
मूक रहते हैं
आंधी तूफ़ान
सहते हैं,
गर्मी सर्दी से
लड़ते हैं
बसंत में झूमते हैं
सावन में लहकते हैं
कितना कुछ
कह जाते हैं
पत्ते  


© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
 
106-240-30-08-2013
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

वृक्ष,पत्ते,प्रक्रति,सावन,गर्मी,सर्दी,बसंत ,जीवन अमृत     

अब तक तो


अब तक तो
इर्ष्या द्वेष के गाँव में
जात पांत के कसबे
धर्म के नगर में
मन के राक्षसी राष्ट्र में
जी लिए
अब मन की खिड़की
ह्रदय के पट खोल दो
प्रेम भाईचारे के पथ को
लक्ष्य मान लो
सोहाद्र से जीना सीख लो
समय निकलने से पहले
मनुष्य बन कर जी लो
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
105-2-239-30-08-2013
इर्ष्या,द्वेष ,जात,पांत,जीवन,जीवन अमृत, प्रेम,भाईचारे

दूसरों की बात करना


दूसरों की बात करना
लोगों का मज़ाक उड़ाना 
उन पर ऊंगली उठाना 
बहुत अच्छा लगता है 
जिस दिन खुद 
लोगों की जुबां से 
ज़ख्म खाओगे 
अगर इंसान हो तो 
नफरत करने लगोगे 
खुद से उस दिन
जुबां को काट कर 
फैकने का मन करेगा 
नहीं काट पाओगे 
तो शर्म से गढ़ जाओगे 
मगर फिर किसी की 
बात नहीं करोगे
मज़ाक नहीं उड़ाओगे
ऊंगली नहीं उठाओगे
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
104-238-30-08-2013
जीवन अमृत ,जीवन,मज़ाक,बातें,कटाक्ष,मनुष्य 

गुरुवार, 29 अगस्त 2013

देश के लोगों ने तुम्हें बापू कहा


बहुतों ने चाहा
तुम्हारे जैसे बन जाएँ
ज़माने को 
मुट्ठी में कर लें
पर ना ही
उनमें वो कुव्वत थी
ना ही वो ज़ज्बा था
जिसके दम पर तुम
दुनिया के चहेते बने
लोगों की 
आँखों के तारे बने
देश के लोगों ने
तुम्हें बापू कहा
तुम्हें महात्मा माना
मगर मुल्क की 
बदकिस्मती थी
चंद सिरफिरों को
तुम्हारी 
शोहरत ना भायी
गोली से तुम्हें 
गहरी नींद सुलायी
हर दिल में गम की
दुनिया बसायी 
98-232-30-08-2013
बापू,महात्मा,गाँधी,देश

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

जब अपना ही बन कर नहीं रह सका


जब अपना ही
बन कर नहीं रह सका
किसी और का बन कर कैसे रहूँ
पथ से भटक गया हूँ
भ्रम जाल में फंस चुका हूँ
मरीचिका के पीछे
दौड़ रहा हूँ
इच्छाओं का दास
हो गया हूँ
धन दौलत को
भगवान् समझ बैठा हूँ
स्वार्थ में
इतना डूब चुका हूँ
जब अपना ही
बन कर नहीं रह सका
किसी और का
बन कर कैसे रहूँ

97-232-30-08-2013
भ्रम,इच्छाएं,मरीचिका,जीवन ,जीवन अमृत,स्वार्थ

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

बुधवार, 28 अगस्त 2013

क्यों पूछते हो हमसे हाल हमारा


क्यों पूछते हो
हमसे हाल हमारा
ना बदले हालात 
ना बदलेंगे कभी 
जिंदगी का सफ़र तो
ऐसा ही रहा है
ऐसा ही रहेगा
ज़िंदा हूँ जब तक
सवालों का
जवाब देना पडेगा
पहले भी अकेला था
अब भी अकेला हूँ
हर बार कहना पडेगा
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
96-231-29-08-2013
जीवन,जिंदगी,हाल,अकेलापन


तरक्की की दीमक


ना वो मचलती गली
ना मोहब्बत से लबरेज़
वो घर वहां पर
ना खेलते कूदते
बच्चों का नज़ारा
दिखता वहां पर
ना वो नीम का पेड़
बैठते थे बड़े बूढ़े
जिसके नीचे खाट
लगा कर
तरक्की की दीमक
खा गयी हर खुशनुमा
मंज़र वहां का 
अब बन गयीं हैं
बड़ी बड़ी बेदिल
इमारतें वहां पर
95-230-28-08-2013
प्रक्रति,पर्यावरण ,जीवन,प्रदूषण,विकास,

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर  

बुद्धि के विकास ने


बुद्धि के विकास ने 
===========
गेंदे का फूल
गुलाब के फूल से
इर्ष्या नहीं करता
कोयल की कूंक से
गोरिय्या
द्वेष नहीं रखती
कुए का पानी
तालाब के पानी में
मिला दो तो
एक हो जाता है
मन उद्वेलित होता है
जब मनुष्य को
इर्ष्या द्वेष में डूबे
देखता हूँ
प्रश्न का उत्तर तो
अब तक नहीं मिला
सोचता हूँ संभवत:
बुद्धि के विकास ने
मनुष्य को जीवों में
सबसे अधिक बुद्धिमान
बना दिया
मन में इच्छाओं का
संसार बसा दिया
मनुष्य स्वयं को
परमात्मा से भी
बड़ा नहीं समझने लगे
मन को इर्ष्या द्वेष से
भर दिया
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
 
92-229-28-08-2013
इर्ष्या द्वेष, परमात्मा,बुद्धि,जीवन,जीवन मन्त्र   
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

मंगलवार, 27 अगस्त 2013

बरसों की प्रतीक्षा पूरी हो गयी


बरसों की
प्रतीक्षा पूरी हो गयी
आज वकील की
चिट्ठी आ गयी
न्याय की 
आस पूरी हो गयी 
मुक़दमे में जीत हो गयी
करोड़ों की जायदाद
मेरे नाम हो गयी
बारिश भी आयी तो
जिंदगी की
शाम को आयी
ना बारिश का
आनंद लेने छत पर
चढ़ कर जा सकता हूँ
ना खुद को जी भर कर
भिगो सकता हूँ
ना बाज़ार जा कर
अपने लिए
कुछ खरीद सकता हूँ
इच्छाएं तो पहले ही
मर चुकी थी
ज़िन्दगी की रात के
इंतज़ार में
छोटे से कमरे में
पलंग पर लाचार पडा हूँ
चिट्ठी पढ़ कर आँखों में
कुछ पल के लिए
चमक ज़रूर आ गयी
मगर बारिश का
आनंद लेने की
मन में इच्छा नहीं रही
91-228-27-08-2013
बुढापा,जीवन ,न्याय,जीवन,उम्र,इच्छा,व्यथा

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

भ्रम जाल में फंसा दानव बन रहा इंसान

रोता है मन
तड़पता है मन
जब देखता है
रोता हुआ बचपन
घबराई हुई जवानी
सहमा हुआ बुढापा
दरकती निष्ठाएं
खोखले रिश्ते
स्वार्थ का विस्तार
चरित्र का हनन
नारी का उत्पीडन
निर्बल पर प्रहार
शक का प्रभाव
बढ़ती हुए हवस
होड़ का वर्चस्व
माया मोह से प्यार
बुजुर्गों का अपमान,
पथ भ्रष्ट संतान
माताओं का बिलखना
ईमान का बिकना
धर्म का व्यापार
झूठ का साम्राज्य 
रोता है मन
तड़पता है मन
जब देखता है
भ्रम जाल में फंसा
दानव बन रहा इंसान
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
92-227-27-08-2013
कर्म,भ्रम, जीवन अमृत ,जीवन, बचपन,जवानी,बुढापा

सोमवार, 26 अगस्त 2013

हार कर भी जीतना चाहता हूँ


येन केन प्रकारेण
जीतना नहीं चाहता हूँ
होड़ के चक्रव्यूह में
फंसना नहीं चाहता हूँ
कर्म पथ पर नदी सा
अविरल 
बहना चाहता हूँ
सच्चाई के बल पर
धैर्य के कन्धों पर
आगे बढना चाहता हूँ
हार कर भी जीतना
चाहता हूँ
भ्रम के संसार से
दूर रह कर
लक्ष्य तक पहुंचना
चाहता हूँ
91-226-26-08-2013
कर्म,भ्रम,हार,जीत,जीवन अमृत ,जीवन,लक्ष्य 
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

कलम हाथ में लेते ही


कलम हाथ में लेते ही
मेरा चंचल मन
ना जाने कहाँ से
आश्वासन पाता है
शरीर की सारी थकान
मिट जाती है,
ऊंगलियों में ऊर्जा का
संचार होने लगता है
निर्बाध गति से विचारों का
प्रवाह होने लगता है
आस पास का शोर भी
मेरा ध्यान भंग नहीं करता
व्यथाएं दुबकने लगती हैं
प्रतीत होने लगता है
लिखना ही मेरा ध्यान है
लिखना ही परमात्मा है
लिखना ही जीवन यात्रा है
अब मुझे मंदिर जाने की
आवश्यकता नहीं
मेरी कलम भी
बार बार वही लिखती है
जो परमात्मा चाहता है
मुझे विश्वास होने लगता है
जीवन भर जिस लक्ष्य को
पाने के लिए भटकता रहा
वह अब दूर नहीं है   
90-225-26-08-2013
लक्ष्य, परमात्मा,मन,कलम,जीवन, ध्यान
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 

वो आँगन

पुराने घर के
आँगन में पहुँचते ही
यादों के समुद्र में
गोते लगाने लगता हूँ
वो आँगन ,
साधारण आँगन नहीं
मेरे बचपन का संसार था
कई परिवारों का
मिल जुल कर रहना
दोस्तों के साथ खेलना
नाहना दौड़ना मचलना
रूठना मनाना
उसी आँगन में होता था
उसकी चारदीवारियों में ही
बचपन का हर पल गुजरा था
जीवन का हर रूप दिखा था
इच्छाओं आकान्शाओं का
जन्म हुआ था
प्रेम से पहला
परिचय हुआ हुआ था
उस आँगन में ही
पहली बार जाना था
जीवन सांस लेना ही नहीं
उससे अधिक होता है
यादों के समुद्र से
बाहर निकला तो
मन में ख्याल आया
काश ऐसा आँगन हर
इंसान के भाग्य में होता
बचपन में ही जीवन का
आइना दिख जाता

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
89-224-26-08-2013
जीवन,आँगन,बचपन , यादें ,जीवन अमृत
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर