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शनिवार, 24 अगस्त 2013

तुम उदास भी होती हो तो


तुम उदास भी 
होती हो तो
सुन्दर लगती हो
तुम्हारी आँखों की
चमक तो
 कम हो जाती है
पर उनकी नीली
गहराइयाँ
कम नहीं होती
तुम दुपट्टे से
मुंह छुपाती हो तो भी
तुम्हारे चेहरे की
आभा छुप नहीं पाती
तुम्हारे चुप रहने से भी
तुम्हारी सुन्दरता
कम नहीं होती 
सौंदर्य प्रसाधनों के 
बिना भी
तुम्हारा चेहरा ,
सौन्दर्य की पराकाष्ठा
प्रतीत होता है 
वैसे भी
तुम्हारा हर रूप
मुझे भाता है
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
84-221-24-08-2013

उदासी,उदास,सुन्दरता,सौन्दर्य ,मोहब्बत,प्यार 

चांदनी चाहती तो बहुत है


चांदनी
चाहती तो बहुत है
चाँद को छोड़
संसार में बस जाए
हर रात आकाश से
उतरना न पड़े
वृक्षों,नदियों,पहाड़ों ,
सागर,धरती धोरों को
मिलन के लिए प्रतीक्षा
न करनी पड़े 
चाँद से अप्रतिम प्रेम
उसे ऐसा करने से 
रोक देता
हर बार उसके कदम
पीछे खींच लेता
सोच सोच ही रह जाता
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
83-220-24-08-2013
प्रेम,चाँद,चांदनी,इच्छाएं,मिलन

उससे ताल्लुक था,अब भी है मगर नहीं भी



 उससे ताल्लुक था
अब भी है मगर नहीं भी
कभी मिला तो नहीं
मगर देखा कई बार
जब भी करीब से 
देखने की ख्वाहिश करता
मिलने की कोशिश करता
कदम आगे बढाता
वो भीड़ में गुम हो जाती
भीड़ का ज़र्रा ज़र्रा छानता
मगर वो नज़र नहीं आती
फिर आने के लिए
मुंह लटका कर लौट जाता
अगले दिन फिर उसका
चेहरा नज़र आ जाता
सांप सीढी का खेल
महीनों चलता रहा
मगर कभी मिलना नहीं हुआ
उस तक पहुँचने से पहले ही 
किस्मत का सांप
ख्वाहिशों को डस लेता
जब भी यादों की
गलियों में घूमता हूँ
मन कुलबुलाने लगता है
दिल मिलने को तड़पता है
उससे ताल्लुक था
अब भी है मगर नहीं भी
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
82-219-24-08-2013
ताल्लुक,मोहब्बत,रिश्ता,प्यार
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

शुक्रवार, 23 अगस्त 2013

मन मेरा बावरा मचल मचल जाए


मन मेरा बावरा
बड़ा ही आवारा
मचल मचल जाए
कितना भी काबू करूँ
काबू में ना आए
मान मनुहार करूँ
बार बार समझाऊँ
ठेल ठेल पटरी पर लाऊँ
थोड़े दिन तो याद रखे
फिर आवारा हो जाए
मन मेरा बावरा
बड़ा ही आवारा
मचल मचल जाए


© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
 
81-218-23-08-2013
मन,आवारा,बावरा,मचलना,मान,मनुहार

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

तनहा भी खुश रहता


ये भीड़ नहीं होती 
तो तनहा भी खुश रहता
ना कोई सवाल पूछता
ना किसी को
जवाब देना पड़ता
ना गम की बातें होती
ना कोई ज़ख्म कुरेदता
अश्कों को आँखों में
सज़ा कर रखता
दो बातें
खुद से ही कर लेता
मन को तसल्ली
दिल को सुकून दे देता
ये भीड़ नहीं होती 
तो तनहा भी खुश रहता
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
80-217-23-08-2013
तनहा,तन्हाई,ज़िन्दगी,सुकून,गम,शायरी  

वही सूरज वही धूप वही उजाला


वही सूरज वही धूप
वही उजाला
दिन तो सब के
एक जैसे ही होते हैं
कुछ दिन भर
मुस्काराते रहते हैं
शाम को हँसते हैं
जश्न मनाते हैं
रात को बेफिक्र हो कर
गहरी नींद में सोते हैं
कुछ बदनसीब भी होते हैं
जो दिन भर झूझते हैं
थक कर चूर हो जाते हैं
शाम को उदास
रात को चिंता में डूबे
सुबह के चमकते
उजाले की प्रतीक्षा में
पलक झपकाते रहते हैं
बिना हँसे मुस्काराए
जीवन भर लड़ते रहते हैं
दिन तो सब के
एक जैसे ही होते हैं
डा.राजेंद्र,तेला,निरंतर
79-216-22-08-2013
बदनसीब, जीवन,खुशी,दुःख,सूरज,धूप,उजाला ,

गुरुवार, 22 अगस्त 2013

कभी लहकता था


कभी लहकता था
फलता था फूलता था
हवाओं में झूमता था
राहगीरों को छाया
पक्षियों का बसेरा था
उम्र के अंतिम दौर में 
ना चेहरे पर हँसी थी 
ना मन में खुशी थी 
यादों की छाया में 
निराशा की परछाई में 
बुढापे का मुकुट पहने 
कुल्हाड़ी की प्रतीक्षा में 
ठूठ बन कर 
लाचार खडा था
जलने को तैयार था

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
78-215-22-08-2013

बुढापा,उम्र,जीवन,जिंदगी,लाचार
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

इस गुस्ताख नज़र का क्या कीजे


इस गुस्ताख नज़र का क्या कीजे
हर हसीं सूरत पर अटक जाती है
ख्वाहिशें अंगडाई लेने लगती हैं
दिल की धडकनें बढ़ने लगती हैं
बामुश्किल मन को समझाता हूँ
सूरत दिखती वैसी होती नहीं है
इस गुस्ताख नज़र का क्या कीजे
हर हसीं सूरत पर अटक जाती है
77-214-22-08-2013
शायरी,गुस्ताख,सूरत,नज़र,चेहरा
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

लोग हद पार करने की बात तो करते हैं


लोग
हद पार करने की
बात तो करते हैं
मगर हद तो
जब पार होती है
जब खुद के
स्वार्थ के लिए
लोग
 हद पार करते हैं
पर जब बात
दूसरों की हो
कुंडली मार कर
बैठ जाते हैं
चेहरे पर चेहरा
लगाते हैं
अपना किया करा
भूल जाते हैं

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
76-213-22-08-2013

स्वार्थ,हद,जीवन,जीवन मन्त्र

बुधवार, 21 अगस्त 2013

मैंने सोचा था बड़े घर की लड़की है

मैंने सोचा था
बड़े घर की लड़की है
हथेलियों में पली है
गाडी में चली है
सुरक्षा की 
चारदीवारियों में बड़ी हुई है
इसने क्या सहा होगा
इसे किसने घूरा होगा
बुरी नज़रों से देखा होगा
जब एक दिन 
अकेले में रोते देखा
लडकी होने पर 
खुद को कोसते देखा
तो रहा नहीं गया
उससे पूछ लिया
तुम्हें क्या दुःख हो सकता है
रोते रोते वह कहने लगी
मेरे देश में 
अब लड़की होना ही
सबसे बड़ा दुःख हो गया है
जन्म से पहले ही उसे
अभिशाप समझा जाना लगा है
जन्म ले भी ले तो भी
इज्ज़त बचाने के खातिर
जिंदगी भर डर कर
जीना पड़ता है
आज से पहले तक तो
खुद को बचा पायी थी
मगर आज खुद को
बचा नहीं पायी
हवस की बलि चढ़ाई गयी
उसकी बात सुन कर
मुझे भी रुलाई आ गयी
अपने पुरुष होने पर मन में
पहली बार ग्लानि हुई
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
75-212-21-08-2013
नारी,स्त्री,लड़की,जीवन,बलात्कार,महिला,मार्मिक
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

















हर ओर मेला ही मेला


हर ओर
मेला ही मेला
ह्रदय में,मन में,
मस्तिष्क में
रंग बिरंगा मदमाता
लुभाता मेला
इच्छाओं के नित नए
सपने दिखाता मेला
सागर जैसा लहराता
लहरों सा मचलता
हवाओं सा बहता मेला
ज़िन्दगी भर भरमाता
आशाओं का मेला
हर ओर मेला ही मेला
74-211-21-08-2013
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

जीवन अमृत ,इच्छाएं,सपने,मेला,लुभाना,भ्रम,भरमाना

केवल समय को पता है


केवल 
समय को पता है
कब तक ?
सम्बन्ध निभेगा
कब अविश्वास की
बलि चढ़ेगा
कब समापन होगा ?
कौन पहल करेगा ?
किसका 
सब्र ख़त्म होगा?
किसका 
स्वार्थ जागेगा?
मन में
अविश्वास जन्मेगा
शक तांडव मचाएगा
मतभेद पैर पसारेगा
मनभेद उदय होगा 
समय के साथ
अधूरे विश्वास की
कच्ची नीव पर बना
रिश्तों का सेतु
ध्वस्त हो जाएगा
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
73-210-21-08-2013
सम्बन्ध,रिश्ता,मित्रता,दोस्ती,अविश्वास विश्वास,शक,स्वार्थ,जीवन

मंगलवार, 20 अगस्त 2013

शब्द भी वही वाक्य भी वही


शब्द भी वही वाक्य भी वही
==========
तुमने कहा गुलाब के
 फूल ने मुझे लुभाया
मैंने भी यही कहा
गुलाब के फूल ने 
मुझे लुभाया
तुम्हें उसकी सुन्दरता ने 
मुझे सुगंध ने लुभाया
शब्द भी वही वाक्य भी वही
पर अर्थ भिन्न भिन्न
जब एक बात के दो अर्थ
दो कारण हो सकते हैं
जो भी तुम कहते हो
मेरे सोच से उसका अर्थ
भिन्न हो सकता है
तुम क्यों सोचते हो
जो भी तुम कहते हो
मैं उसे वैसे ही समझूं
जैसा तुम चाहते हो
अगर तुम्हारी बात से
मेरा मत नहीं मिलता
तुम नाराज़ होते हो
 नाराज़ होने से पहले
मुझसे भी तो पूछ लो
मेरा सोच क्या कहता है
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर   
72-209-20-08-2013
मत,विचार,सोच,अर्थ  ,गुलाब,जीवन अमृत,

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर   

मैं नहीं मेरा मन लिखता है


कैसे समझाऊँ ?
मैं नहीं
मेरा मन लिखता है
मन में भी लिखा तो
पहले से रहता है
जो देखा सुना सहा
मन के नेपथ्य में
छुपा रहता है
कलम हाथ में लेते ही
मन हिलोरें लेने लगता
पानी से लबालब भरे
बाँध सा उफनने लगता
विचारों का प्रवाह
कलम की नालियों से
उन्मुक्त बहने लगता
कैसे समझाऊँ?
मैं नहीं
मेरा मन लिखता है

डा.राजेंद्र तेला ,निरंतर
71-208-20-08-2013

कविता,मन,लेखन,विचार,जीवन,कलम

महकते फूल


चांदी सा चमकते
चमेली के फूल को देखा
काँटों की बीच सुर्ख लाल
गुलाब को झांकते देखा
हर सिंगार के
नन्हे फूल को सुगंध
फैलाते देखा
अंगूठी में जड़े नगीने सा
मोगरे के फूल को देखा
महुआ के फूल को
मदमस्त महक से
बहकते देखा
सब की कद काठी
रंग रूप
पौधे अलग अलग
सबके सब महक के
गुण से भरे हुए
सारे महकते फूल
एक ही सन्देश दे रहे थे
कद काठी रंग रूप
जात बिरादरी  देश
अलग अलग भी हों
तो अंतर नहीं पड़ता
अच्छे गुण इंसान में हो
हर इंसान महकता
संसार में पूजा जाता
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
70-207-20-08-2013
महक,सुगंध,जीवन,गुण,फूल ,गुलाब,चमेली

सोमवार, 19 अगस्त 2013

मिलन की ललक

सूरज की लालिमा ने
सुबह की मुनादी कर दी
रात भर से क़ैद
मन में 

असीम प्रेम लिए
 धरती से 

मिलन को आतुर
नयी नवेली दुल्हन का
श्रंगार कर
सूरज की किरणें
क्षितिज से
अवतरित होने लगी
धरती को अपने
प्रेम में समेटने लगी
संसार को 
सन्देश देने लगी
कितने ही पर्दों के पीछे
छुपना पड़े
कितना भी समय 
बीत जाए
प्रेम सच्चा हो
मिलन की ललक हो
मन में धैर्य हो
प्रेमी का
प्रेमिका से मिलन
हो ही जाता है

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 

68-205-18-08-2013
प्रेम,मोहब्बत,मिलन,प्यार,धरती,सूरज,किरणें ,धैर्य

आशाएं कहने लगी मुझसे


एक दिन आशाएं 
कहने लगी मुझसे
बहुत थक चुकी हैं  
हर दिन नयी आशाएं
संजोते हो
एक पूरी नहीं होती
दूसरी मन में लाते हो
कुछ दिन तो
विश्राम लेने दो
जो पूरी हो गयी
उनका आनंद तो लेलो
नए जोश के साथ
नयी आशाएं
मन में संजो लेना
हमारी थकान भी
मिट चुकी होगी
पूरा साथ निभा देंगी
तुम्हें भी निराशा से
मुक्ति मिल जायेगी
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर  
69-206-19-08-2013
आशा,निराशा,इच्छाएं,आकान्शायें,जीवन ,उम्मीद 

रविवार, 18 अगस्त 2013

माँ आज मुझे अपने सीने से लगा लो


माँ आज मुझे
अपने सीने से लगा लो
मेरा बचपन
मुझे वापस लौटा दो
मैंने समझा था
बहुत बड़ा हो गया हूँ
पढ़ लिख कर
बड़ा इंसान बन गया हूँ
दौलत कमाकर
सबसे आगे हो गया हूँ
पता नहीं था
कितनी भूल कर रहा हूँ
असलियत में बड़ा नहीं
बहुत छोटा हो गया था
अहम अहंकार में जी रहा था
आज बंद आँखें खुल गयी
तुम्हारी पीड़ा यथार्थ में
समझ आ गयी
मेरी संतान भी
वैसा ही व्यवहार करती है
जैसा जीवन भर मुझे
तुम्हारे साथ करते देखा
आँखों से रुलाई फूट रही है
ग्लानि से जान निकल रही है
आँख से आँख मिलाने की
हिम्मत नहीं हो रही है
माँ आज मुझे
अपनी गोद में लिटा लो
अपने सीने से लगा लो
गलतियों के लिए
मुझे माफ़ कर दो
मुझे मेरा बचपन
वापस लौटा दो 
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर  
67-204-18-08-2013
माँ पर कविता,माँ,जीवन,बचपन,संतान,व्यवहार, गोद