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शनिवार, 17 अगस्त 2013

आओ तुम्हारा जी बहलाऊँ

आओ तुम्हारा जी बहलाऊँ
तुम्हें एक मधुर गीत सुनाऊँ
मन की बगिया में फूल खिलाऊँ 
दिल के आँगन को महकाऊँ
तुम्हारे सुर से सुर मिलाऊँ
तुम्हें मधुर संगीत सुनाऊँ
मन से दुखो की छाया हटाऊँ
जीवन में हरयाली लाऊँ
जी भर के हँसू और हंसाऊँ
आओ तुम्हारा जी बहलाऊँ
तुम्हें एक मधुर गीत सुनाऊँ
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
66-203-18-08-2013
गीत,संगीत,प्यार ,मोहब्बत,मन ,दिल

  

बने कई दोस्त जिंदगी के सफ़र में


बने कई  दोस्त
जिंदगी के सफ़र में
साथ चले
कई दोस्त सफ़र में
बिछड़ गए
कुछ दोस्त सफ़र में
साथ रह गए
कुछ दोस्त सफ़र में
वक़्त रुका नहीं
सफ़र चलता रहा
किसी ना किसी  के
दिल का धड़कना रुका
सफ़र में
वही रुक गया
चलते चलते सफ़र में
छोड़ गया बहुतों को
अकेला सफ़र में
बिछुड़ गया बहुतों से
सफ़र में
दिल से चाहा
जिसको भी उसने
या चाहा उसे भी जिसने
रुलाने को बस रह गया
उसकी यादों का साथ
सफ़र में

डा.राजेंद्र तेला ,निरंतर
65-202-17-08-2013

सफ़र,जिंदगी,याद,यादें,दोस्त,बिछड़ना, जीवन 
डा.राजेंद्र तेला ,निरंतर

उपलब्धि


मित्र ने रत्न जडित
कीमती घड़ी 
क्या खरीद ली
सुबह से शाम तक
घड़ी का गुणगान
उसकी 
दिनचर्या बन गयी
जीवन की बड़ी 
उपलब्धि हो गयी
कोई पूछे ना पूछे
घड़ी की कीमत बताना
मजबूरी बन गयी
अनायास ही एक दिन
दूसरे मित्र की
कलाई पर दृष्टि पडी
उसने भी वैसी ही
घडी पहन रखी थी
मन की जिज्ञासा 
रोक नहीं पाया
तुरंत उससे पूछ लिया
क्या घडी उसने
होड़ में खरीदी 
भावहीन चेहरा लिए
मित्र बोला
मैं कोई कार्य
होड़ में नहीं करता
भौतिक उपलब्धि को
सर पर नहीं चढ़ाता
भौतिक उपलब्धि 
भाग्य से भी मिल जाती 
व्यक्तित्व की उपलब्धि ही 
सर्वोपरि होती  
निष्फल कर्म में
विश्वास रखता हूँ
मित्र के उत्तर ने
मुझे निरुत्तर कर दिया
उसके प्रति मन में 
सम्मान बढ़ा दिया
डा.राजेंद्र तेला ,निरंतर
63-200-17-08-2013
जीवन दर्शन व्यक्तित्व,जीवन,उपलब्धि,भौतिक,होड़ ,कर्म,

शुक्रवार, 16 अगस्त 2013

आशा


आधी रात का
समय है
सारा संसार
सो रहा है
वो जाग रहा है 
जो प्रेम में मग्न है
चिंताओं से ग्रस्त है
दर्द से पीड़ित है
कर्म में व्यस्त है
खुशियों में मस्त है
यादों में खोया है
सुबह की
प्रतीक्षा में डूबा है
आशा से भरा है
कल का दिन
आज से सुखद हो
प्रार्थना में लीन है
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
62-199-17-08-2013
चिंता,जीवन,नींद,प्रार्थना,आशा,


ईमान का कटघरा

(जीवन दर्शन) )
पडोसी के घर पर लगे
अमरुद के पेड़ से
सड़क की ओर लटकते 
अमरुद को देखा तो 
मन लालच से भर गया 
स्वयं पर 
काबू ना रख पाया 
इधर उधर देखा 
कोई देख तो नहीं रहा 
झट से अमरुद तोड़ कर 
जेब में रख लिया
विजयी मुस्कान लिए 
आगे बढ़ गया 
कुछ समय बाद 
जब एक बालक को 
अमरुद तोड़ते देखा 
उसे चोरी करने से 
मना किया 
बालक मुस्काराया 
धीरे से बोला 
मुझे मना क्यों करते हो 
अपने भी तोड़ा था
मैंने चुपके से देखा था 
बालक की बात ने 
मुझे ईमान के कटघरे में 
खडा कर दिया
छोटे से लालच ने
मेरे सच को 
उजागर कर दिया 
खुद को अपनी ही 
नज़रों से गिरा दिया
आज समझ आ गया 
छुपा कर किया अपराध भी 
एक दिन बाहर आ ही जाता 
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर  
61-198-16-08-2013

जीवन ,जीवन दर्शन,लालच,चोरी.बेईमानी ,ईमान



स्थिति परिस्थिति कैसी भी हो

(जीवन अमृत)
असफलताओं से
घबराकर डरने लगा
कर्म से जी चुराने लगा
आत्मविश्वास खो बैठा
अपने आप में
सिमट कर रह गया
निराशा में जीने लगा 
उजाला अँधेरे में 

बदलने लगा
जीना दूभर हो 
गया 
तभी गीता पाठ सुना 
कृष्ण का अर्जुन को 

कर्म पर उवाच सुना 
अर्जुन का अभिमन्यु को
चक्रव्यूह तोड़ने का ज्ञान
प्रण कर लिया
निराशा के चक्रव्यूह को
कर्म से तोडूंगा
अँधेरे को
उजाले में बदलूंगा
स्थिति परिस्थिति
कैसी भी हो
प्रण से पीछे नहीं हटूंगा
खोया आत्मविश्वास
पाकर रहूँगा

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
59-196-16-08-2013
जीवन अमृत,जीवन,आत्मविश्वास ,कर्म,निराशा,जीवन,चक्रव्यूह 

गुरुवार, 15 अगस्त 2013

समझदारी

(जीवन अमृत)
तुम्हारी बात
समझ नहीं पाया तो
कोई अपराध नहीं किया
मेरी समझदारी पर
प्रश्न मत खडा करो
मेरी हँसी मत उडाओ
अपने संकुचित सोच
कुंठित भावना का
परिचय मत दो
यह भी तो हो सकता हैं
मुझे सुनायी नहीं दिया हो
या फिर तुम ठीक से
समझा नहीं पाए
कुछ कहने से पहले
इतना तो ध्यान रख लो
कभी तुम्हारे साथ भी
ऐसा हो सकता है
तब अगर कोई
तुम्हारी समझदारी पर
प्रश्न खडा करे
तुम्हारी हँसी उडाये तो
तुम्हें कैसा लगेगा ?
58-195-15-08-2013

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
जीवन अमृत ,जीवन,भावना,सोच,समझना ,समझाना 

सम्मान की दृष्टि

(जीवन अमृत )
साधारण
कुडता पयजामा
पहन कर
समारोह में चला गया
देखते ही
मित्र ने टोक दिया
निरंतर कुछ तो अपनी
प्रतिष्ठा का ख्याल करो
इतनी साधारण वेश भूषा
पहन कर क्यों आ गए
लोग तुम्हें सम्मान की
दृष्टि से देखते हैं
व्यवहार और कामों का
गुणगान करते हैं
समारोह में तो
बढ़िया वेश भूषा में
आना चाहिए
मित्र की बात सुन कर
मन व्यथित हो गया
नहीं चाहते हुए भी
कहना पडा
मित्र मन में इतनी
हीन भावना नहीं
रखनी चाहिए
वेशभूषा केवल साफ़
सुथरी होनी चाहिए
वेशभूषा से
किसी को कोई फर्क
नहीं पड़ना चाहिए
गुण,व्यवहार और
कर्मों को भूल कर
अगर वेशभूषा के
कारण ही कोई
सम्मान देता है
तो ऐसे सम्मान को
महत्वहीन
समझना चाहिए
कोई कुछ
कह भी दे तो
एक कान से सुन कर
दूसरे कान से
निकाल देना चाहिए 
57-194-15-08-2013
जीवन अमृत ,जीवन,कर्म,व्यवहार,वेश भूषा,सम्मान,गुण,
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

आज का सत्य


एक गरीब मजदूर को
खिलखिलाकर हँसते देखा
मस्ती में झूमते देखा
तो आश्चर्य से मुंह
खुला का खुला रह गया
खुशी के तांडव का
कारण पूछा तो
चिल्ला कर बोला
बाबूजी हम कितने
खुशकिस्मत हैं
देश के लिए सबसे
आवश्यक हैं
अगर हम नहीं होते तो
कई सरकारें
बनते बनते रह जाती
कई नेताओं की
ज़मानत ज़ब्त हो जाती
कई नेताओं की
कोठियां नहीं
झोंपड़ियाँ होती
हमारे वोट पर ही
सरकारें बनती हैं
हमें लुभाना
नेताओं की मजबूरी है
अब आप ही बताओ
देश में हमसे अधिक
कौन इतना भाग्यशाली है
यह अलग बात है
हम छोटी सी झोंपड़ी में
भूखे पैदा होते हैं
उसी झोंपड़ी में भूखे ही
मर जाते हैं
56-193-15-08-2013
गरीब,मजदूर,नेता,सरकार,आज़ादी,देश,राष्ट्र,वोट,

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

बुधवार, 14 अगस्त 2013

अब केवल चलती है जुबान

(फौज और फौजियों की जांबाजी पर )
फडकती थी बाहें
चलती थी तलवार
उगलती थी आग
जान नहीं ले तब तक
करती नहीं विश्राम
राजा हो या प्रजा
मात्र भूमि की रक्षा में
बैठता नहीं चैन से कोई
चाहे निकल जाए प्राण
समय बदल गया
खून पानी हो गया
राजा हो या प्रजा
अब केवल
चलती है जुबान
मात्र भूमि की रक्षा का
रह गया अब केवल
फौज और जांबाज़
फौजियों पर भार

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
54-191-14-08-2013

फौज फौजी,मात्र भूमि,देश ,रक्षा,

मन मस्तिष्क में सामंजस्य नहीं हो तो


(जीवन अमृत )
कल रात
आँखें भारी होने लगी
नींद बुलाने लगी
बिस्तर पर लेट कर
नींद की प्रतीक्षा करने लगा
अचानक मन कहने लगा
नींद बहुत सताती है
कितने नखरे करती है
लेटते ही
क्यों नहीं आती है
मस्तिष्क ने सुना तो
बोल उठा
नींद जादू नहीं है
जो पलक झपकते ही
आ जायेगी
मन को मस्तिष्क का
कहना अच्छा नहीं लगा
दोनों में द्वंद्व
प्रारम्भ हो गया
रात बिना नींद के
गुजर गयी
सुबह हुई तो एक बात
अवश्य समझ आ गयी
मन मस्तिष्क में
सामंजस्य नहीं हो तो
ना मन को चैन मिलता
ना ही मस्तिष्क शांत रहता
गहरी नींद में सोना हो तो
मन बेचैन
मस्तिष्क अशांत नहीं
होना चाहिए
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
53-190-14-08-2013
जीवन अमृत, ,जीवन,मन मस्तिष्क,सामंजस्य,नींद

मंगलवार, 13 अगस्त 2013

मैं नहीं चाहता


मैं नहीं चाहता 
बिमारी में
व्यथा में
व्याकुलता में
निराशा में
कोई मेरा हाल पूछे
मेरी परेशानियों का
कारण पूछे
मैं जानता हूँ
हर व्यक्ति
किसी ना किसी
पीड़ा से ग्रसित है
कोई ना कोई दुःख
उसका साथी है
अपना दुःख बता कर
उसे उसके दुःख
याद दिला कर
उसके दुःख

बढ़ाना नहीं चाहता
52-189-13-08-2013
दुःख,पीड़ा,परेशानियां,व्यथा ,जीवन 

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 

ज़िन्दगी अब तक तुम प्रश्न करती रही

ज़िन्दगी अब तक
तुम प्रश्न करती रही
अब कुछ प्रश्न मैं भी कर लूं
जब उम्र भर चैन नहीं मिलता
चैन का भ्रम क्यों देती हो
जब सपने कभी पूरे नहीं होते
सपने क्यों दिखाती हो
जब इच्छाएं आकान्शाएं
पूरी नहीं होती
क्यों मन में इच्छा जगाती हो
जिंदगी हँस कर बोली
अधिक पाने की इच्छा में
जब तुम होड़ में जीते हो
असंतुष्ट रहते हो
चैन कैसे मिलेगा
सपने नहीं देखोगे तो
कर्म भूल जाओगे
इच्छाएं
आकान्शाएं नहीं रखोगे तो
ज़िन्दगी नीरस हो जायेगी
जीवित होते भी
मृत समान हो जाओगे
ज़िन्दगी उतनी कठिन नहीं
जितना तुम सोचते हो
आवश्यकताएं कम कर लो
संतुष्ट रहना सीख लो
ज़िन्दगी दुरूह नहीं
आसान हो जायेगी
जो आज बुरी लगती है
कल अच्छी लगने लगेगी
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
49-186-13-08-2013
जीवन जिंदगी,चैन,संतुष्टि,इच्छाएं,आकान्शाएं,आशा,

दुखी मन बोला सुखी मन से


(जीवन अमृत )
दुखी मन बोला सुखी मन से
जब तुम भी मन मैं भी मन
फिर मैं दुखी तुम खुश कैसे
सुखी मन बोला
अधिक पाने की इच्छा में
तुम होड़ में जीते हो
आवश्यकता से अधिक
अपेक्षाएं इच्छाएं रखते हो
मनोकामना पूरी नहीं हो
तो असंतुष्ट हो जाते हो
क्रोध करते हो
तनाव ग्रस्त रहते हो
अगर मेरे जैसे
खुश रहना हो तो
ना अधिक इच्छाएं रखो
ना होड़ में जीओ
स्वयं पर विश्वास रखो
इच्छाएं पूरी नहीं हो तो
इश्वर का आदेश समझ कर
स्वीकार लो
संतुष्टि को लक्ष्य मान कर
कर्म पथ पर चलते रहो
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
46-185-12-08-2013
जीवन अमृत ,तनाव ग्रस्त ,संतुष्टि, इच्छाएं, दुखी,सुखी, मन,इश्वर, अपेक्षाएं, होड़, जीवन

सोमवार, 12 अगस्त 2013

किस,किस को किस,किस बात का दोष दूं


किस,किस को
किस,किस बात का दोष दूं
सपने तो मैंने देखे थे
अपेक्षाएं भी मैंने रखी थीं
आशाएं भी मेरी थी
इच्छाएं मैंने संजोई थी
करने वाला भी मैं 
ही था 
कुछ मेरी ही कमी रही होगी
जो जीवन की कसौटी पर
खरा नहीं उतर सका
इच्छाओं आशाओं को
शिखर पर नहीं चढ़ा सका
किस,किस को
किस,किस बात का दोष दूं
जो भी नहीं हो पाया
उसमें मेरा ही
सहयोग रहा होगा

डा.राजेंद्र तेला ,निरंतर
46-185-12-08-2013

जीवन,दोष,ज़िन्दगी,आशाएं,इच्छाएं ,अपेक्षाएं,कसौटी

क्या वही करता रहूँ?


क्या वही करता रहूँ?
===========
क्या वही करता रहूँ
जो करता रहा हूँ
वैसे ही सोचता रहूँ
जैसे सोचता रहा हूँ
वैसे ही जीता रहूँ
जैसे जीता रहा हूँ
प्रश्न मन को बार बार
झकझोरता है
कई बार मन में आता है
अब अपने को बदल लूं
दुनिया की भीड़ में
मिल जाऊं
वही करूँ,वही कहूँ,
वैसे ही जीयूँ
जो संसार चाहता है
पर जब आत्मा से
पूछता हूँ तो
जो उत्तर मिलता है
सुन कर घबरा जाता हूँ
इश्वर के बताये पथ से
हट कर चलना चाहते हो
तो चल सकते हो
पर याद रख लेना
सत्य को भूलना होगा
किसी को कुछ भी
कहने का अधिकार
छोड़ना होगा
जैसे सब जी रहे हैं
वैसे ही जीना होगा
डा.राजेंद्र तेला ,निरंतर
43-182-12-08-2013
जीवन,पथ,सोच,कर्म, इश्वर,सत्य,आत्मा


रविवार, 11 अगस्त 2013

किसका मन कहना मानता है

किसका मन 
कहना मानता है
जो मेरा मन मानेगा 
कितना भी समझाओ
समझता नहीं है
लाख सर फुटव्वल करो
मान मनुहार करो
जिद पर अड़ जाए तो
बच्चा बन जाता है 
जच जाए तो
पल में मान जाता है
नहीं जचे तो
सालों रुलाता है
किसका मन 
कहना मानता है
जो मेरा मन मानेगा 
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर  
42-181-11-08-2013
मन, जीवन

दूसरा श्रेष्ठ कैसे मुझसे


दूसरा श्रेष्ठ कैसे
सोच सोच कर दुखी
होता रहा
कैसे श्रेष्ठता जताऊँ
उधेड़बुन में लगा रहा
कर्म पथ से भटक  कर
इर्ष्या के आँगन में
खेलता रहा
समय का पहिया 
चलता रहा
जितना कर सकता था
उतना भी कर ना पाया
चेतन हुआ तब तक
वो बहुत आगे
मैं बहुत 
पीछे रह गया था
अंततः जीवन मन्त्र
समझ गया
फिर पथ पर लौट गया

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
41-180-11-08-2013

इर्ष्य,श्रेष्ठता,श्रेष्ठ,इर्ष्या,द्वेष,जीवन मन्त्र
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

कभी सोचा है ?


कभी सोचा है
कैसे बचाती है 
नन्ही सी चिड़िया
आंधी तूफ़ान से जान
कभी ख्याल आया
सर्दी की रात में
गली का कुत्ता
कहाँ सोता है
कभी पूछा 
किसी गरीब से
कुछ खाया या
कल रात भी भूखा
सोया था
क्यों केवल अपनी ही
चिंता करते हो
स्वार्थ में जीते हो
कभी अपने से ऊपर
उठ कर भी देख लो
दूसरों के बारे में भी
सोच लो
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
40-179-11-08-2013
स्वार्थ,सोच,जीवन