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शनिवार, 10 अगस्त 2013

तमन्नाओं के बाज़ार में


तमन्नाओं के
बाज़ार में
दुकान तो मैंने भी
सजाई
मगर खरीददार नहीं
आया कोई
जो भी आया
बेचैनी बेच कर
बदले में
सुकून ले गया
दिल में पहले ही
सुकून कम था
अब पूरी तरह
मुफलिस हो गया
शायरी मुफलिस,तमन्ना,मुफलिस-ऐ-सुकून,सुकून
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
39-178-10-08-2013


चाहो खुद को उत्तम मानो चाहो तो अति उत्तम मानो

चाहो खुद को 
उत्तम मानो 
चाहो तो 
अति उत्तम मानो 
कोई रोक नहीं है
कोई टोक नहीं
चाहो तो खुद को 
सर्वोत्तम मानो
अहम् से इतना भरे हो 
भ्रम में इतना फंसे हो
पथ से भटक गए हो 
सोच से 
अवरुद्ध हो गए हो 
कोई उत्तम 
सर्वोत्तम नहीं होता
जब तक संसार 
 नहीं माने 
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
38-177-10-08-2013
सोच,अहम्,जीवन,भ्रम,उत्तम ,सर्वोत्तम 


  


क्या खोया क्या पाया

क्या खोया 
क्या पाया जिंदगी में 
अब तो जान लो 
अब तक हिसाब नहीं 
लगाया हो 
तो अब लगा लो 
कितनो का दिल दुखाया 
कितनों को दुश्मन बनाया 
अब तो दिल टटोल लो
कितनों को दोस्त बनाया 
कितनों को रोते से हंसाया
अब तो मालूम कर लो
प्यार मोहब्बत को 
जीने का सबब बनाया
या मन में 
नफरत को बसाया 
अब तो मन से पूछ लो 
अहम् में जीते रहे
हैवान को चाहते रहे
या इश्वर में 
विश्वास रखते रहे
उसके बताये पथ पर 
चलते रहे
ह्रदय से पूछ लो 
कोई नहीं जानता 
कब तक जीओगे 
संसार से जाने से पहले 
सच्चाई जान लो 
देर होने से पहले  
भूल सुधार कर लो
क्या खोया क्या पाया 
जिंदगी में 
अब तो जान लो
अब तक हिसाब नहीं 
लगाया हो 
तो अब लगा लो
 डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
37-176-10-08-2013

नफरत,प्यार,जिंदगी,जीवन,मन,ह्रदय ,ईश्वर

चाँद अब परेशान होने लगा है


कभी तीज कभी ईद
कभी पूर्णिमा
कभी करवा चौथ पर
पूजे जाने से
चाँद अब परेशान
होने लगा है
मैंने कारण पूछा तो
मुंह बिचका कर
कहने लगा
मैं जब इतना सुन्दर हूँ
सब का चेहेता हूँ
प्रेमियों के लिए प्रेरणा हूँ
चकोर का जीवन हूँ
अंधेरी रात का उजाला हूँ
तो फिर हर दिन याद
क्यों नहीं आता हूँ
वैसे तो क्रोध में 
मैं भी
कभी अमावस में
कभी बादलों के पीछे
छुप जाता हूँ
कितना अच्छा हो
अगर मेरी इच्छा
पूरी हो जाए
हर दिन लोग
मुझे याद करें
मिल जुल कर ईद
करवा चौथ,तीज मनाएं
भाईचारे से जियें
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
35-174-10-08-2013
चाँद,तीज,पूर्णिमा,ईद,करवा चौथ,जीवन,भाईचारा

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

निर्धन नारी का हर दिन इकसार होता है


निर्धन नारी का
हर दिन इकसार होता है
सुबह चूल्हे से प्रारम्भ होती है
दोपहर दो जून रोटी के लिए
कड़ी मेहनत में गुजरती है
रात को वैवाहिक रिश्ते की
आग शरीर को जलाती है
यही उसका
आमोद प्रमोद होता है
किस दिन को
अच्छा किस दिन को बुरा कहे
उसका हर दिन ऐसे ही गुजरता है
कभी बीमारी से शरीर टूटता है
कभी बच्चों के लिए रोना पड़ता है
कभी ज़माने के
तानों से दिल जलता है
निर्धन नारी का
हर वार त्योंहार ऐसा ही होता है
हर दिन
कुछ ना कुछ सहना होता है
ज़िन्दगी भर
मर मर कर जीना होता है
निर्धन नारी का
हर दिन इकसार होता है
जीवन उसका अभिशाप होता है
34-173-10-08-2013

जीवन,जिंदगी,निर्धन,निर्धन,निर्धनता ,नारी
 डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

शुक्रवार, 9 अगस्त 2013

उन पर कोई रोक नहीं


वो मुझे चाहे ना चाहे
उन पर कोई रोक नहीं
मैं उनको चाहता रहूँगा
वो ह्रदय को काबू  में
कर सकते हैं
खुद की भावनाओं से
खुद ही खेल सकते हैं
मेरे बस में
ऐसा करना संभव नहीं
वो कुंठा में जी सकते हैं
मेरे लिए कुंठित रहना
मुमकिन नहीं
वो चेहरे पर चेहरा
चढ़ा सकते हैं
मन ही मन रो सकते हैं
ऐसा मेरा स्वभाव नहीं
33-172-9-08-2013
स्वभाव,फितरत,चाहत,कुंठा,कुंठित,जीवन,चेहरे पर चेहरा चढ़ाना, भावनाएं

 डा.राजेंद्र तेला ,निरंतर 

तेरी बेवफाई को भूल तो जाऊं


तेरी बेवफाई भूल तो जाऊं
पर उन हसरतों का क्या करूँ
जिन में आग लगाई तूनें
उन ज़ज्बातों का क्या करूँ
जिनसे जी भर के खेला तूनें
उन लम्हों को कहाँ से लाऊँ
जो मेरे साथ गुजारे तूनें
उन ख्वाहिशों का क्या करूँ
जिन्हें आसमां पर चढ़ा कर
ज़मीन दिखाई तूनें
उन ख़्वाबों का क्या करूँ
जिन्हें दिखा कर तोड़ा तूनें
तेरी बेवफाई भूल तो जाऊं
पर उस वक़्त का
हिसाब किससे मांगू
जो तुझ पर लुटाया मैंने
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
शायरी,बेवफाई,मोहब्बत
32-171-9-08-2013

शायरी,मोहब्बत,प्यार,लव,बेवफाई,नज़्म
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

गुरुवार, 8 अगस्त 2013

कौन कब किस बात से खफा हो जाए


कौन
कब किस बात से
खफा हो जाए
कौन सी बात
किसी को कब चुभ जाए
कब किसी का सोच
बदल जाए
उचित अनुचित में
भेद भूल जाए
रिश्तों में दरार
पड़ जाए
पता कहाँ चलता है
जो वर्षों साथ निभाए
विपत्ति में हँसते
मुस्काराते साथ
खडा नज़र आये
खुद से
ज्यादा दोस्त को माने
उससे अच्छा दोस्त
कौन कहलाये
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

चाहे कलम बदल दूं


चाहे 
कलम बदल दूं
चाहे हर्फों में
हेर फेर कर दूं
सुबह लिखूं
शाम लिखूं
हर बार 
कागज़ पर
उसका नाम ही
लिखने में आता है
मन में ज़हन में
 दिल में
इस हद तक बसा है
इतना बेबस हूँ
उसके नाम के अलावा
कुछ और लिख ही
नहीं पाता हूँ
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर28-167-8-08-2013
शायरी,मोहब्बत,प्यार,हर्फ़,

किसका मन रखूँ


किसका मन रखूँ
किसका ना रखूँ
किसे खुश करूँ
किसे नाराज़ करूँ
प्रश्न निरंतर 
मुंह खोले सामने
खडा रहता है
मन में दुविधा को
जन्म देता है
गहराई से सोचा 
एक ही समाधान
नज़र आया
जीवन पर्यन्त
चैन पाना है तो
क्षण भर के 
चैन को 
खोना होगा
कौन बड़ा 
कौन छोटा
कौन अपना 
कौन पराया
भूलना होगा
निष्पक्ष 
सोचना होगा
केवल विवेक को
निर्णय का आधार
बनाना होगा
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
26-165-8-08-2013
विवेक,चैन,जीवन,निष्पक्ष,सोच, दुविधा

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 

अर्थ का अनर्थ


आज अर्थ का
अनर्थ हो गया
मित्र से वार्तालाप
वाकयुद्ध में बदल गया
असहनशीलता ने
जिव्ह्वा से नियंत्रण
समाप्त कर दिया
मुंह से
अपशब्द निकल गया
रिश्तों में नफरत का
बीज पड़ गया
वार्तालाप झगडे में
बदल गया 
मनमुटाव बढ़ता गया
मित्र दुश्मन बन गया
असहनशील होना
जिव्ह्वा से नियंत्रण खोना 
बहुत महँगा सिद्ध हुआ
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर   
25-164-8-08-2013
असहनशीलता,मित्र,मित्रता,दुश्मन,दोस्त,जीवन,

मनमुटाव ,अर्थ का अनर्थ,वाकयुद्ध,वार्तालाप
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर   

बुधवार, 7 अगस्त 2013

संसार एक रंगमंच


संसार एक
अनोखा रंग मंच
नाटक का नाम
जीवन
निर्देशक इश्वर
अलग अलग पात्र
निरंतर
अभिनय करते हैं
कभी हँसते गाते
कभी रोते बिलखते
कभी इर्ष्या द्वेष
दिखाते हैं
कभी प्रेम में डूबे
दिखते हैं 
कौन कब तक
अभिनय करेगा
नाटक
कब तक चलेगा
इश्वर तय करता है
हर पात्र एक दूजे के
अभिनय का दर्शक
विभिन्न रंगों से भरा
ये विचित्र रंग मंच
निरंतर चलता रहता है
एक पात्र जाता
दूसरा आता है
नाटक का पटाक्षेप
कभी नहीं होता
संसार एक
अनोखा रंग मंच
डा,राजेंद्र तेला,निरंतर
जीवन,रंगमंच,नाटक,अभिनय 
24-163-7-08-2013
संसार ,जीवन,ज़िन्दगी,रंगमंच,नाटक,इश्वर 

खो गयी हैं संवेदनाएं


खो गयी
संवेदनाएं
मर गयी
भावनाएं  
दरक रही 
निष्ठाएं  
भटक रही
आत्माएं
रह गया बस
खोखले
रिश्तों को ढोता
अहम् से भरा
इंसान के भेष में
हाड मांस का
पुतला 

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
23-162-6-08-2013
निष्ठाएं , भावनाएं ,संवेदनाएं, जीवन, खोखले
रिश्तों, इंसान, अहम्

एक त्रुटि एक घटना


तट बंध टूट जाए
नदी के बहाव की
दिशा बदल जाती है
पर्वत से टकरा कर
वायु की
दिशा बदल जाती है
पथ पर एक अवरोध से
दुर्घटना घट जाती है
एक त्रुटि
एक घटना जीवन की
दशा दिशा बदल देती है
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
22-161-6-08-2013
दशा,दिशा, घटना,जीवन, त्रुटि

सोच में एकरूपता चाहता


ना पर्वत श्रंखलाएं
एक ऊंचाई की होती
ना सारी नदियाँ
एक गति से बहती
ना पक्षी इकसार होते
ना पेड़ पौधे
एक आकार के होते
फिर क्यों मनुष्य
मनुष्य की भावनाओं
संवेदनाओं में
समानता चाहता
व्यवहार में
समरसता चाहता
हर मनुष्य के सोच में
एकरूपता चाहता
21-160-5-08-2013

एकरूपता,समरसता,समानता,जीवन,भावनाएं ,संवेदनाएं
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 

मंगलवार, 6 अगस्त 2013

छुपाना नहीं गर नफरत पल रही दिल में


छुपाना नहीं
गर नफरत पल रही दिल में
दबाना नहीं
गर चिंगारियां सुलग रही मन में
कह देना
साफ़ साफ़ जो चल रहा दिल में
कहीं ऐसा न हो
चिंगारियां बेकाबू हो नफरत की
आग भड़का दे
पनपने से पहले रिश्तों को तोड़ दे
हसरतों के
परवान चढ़ने से पहले हमें जुदा कर दे
छुपाना नहीं
गर नफरत पल रही दिल में
दबा कर
रखना नहीं चिंगारियां मन में
20-159-5-08-2013
प्यार,मोहब्बत,नफरत,जिंदगी,रिश्ते,जीवन

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

ऐसा ज़हाँ मयस्सर हो

खुदा से दुआ मेरी
ऐसा ज़हाँ मयस्सर हो
जहां ना दर्द से
रोता हो कोई
ना किसी के रोने पर
हंसता हो कोई
ना भूखा रहता हो कोई
ना किसी को भूखा
देखता हो कोई
नफरत का नाम भी
जानता ना हो कोई
हर इंसान
इंसान को इंसान
समझता हो
उसके रोने पर रोता हो
उसके साथ जीता हो
उस के साथ मरता हो
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
18-157-5-08-2013
जिंदगी,जीवन,खुदा,इच्छा,इंसान,


सोमवार, 5 अगस्त 2013

शर्म बोली हया से


सिसकियाँ लेते हुए
शर्म हया से 
बोली
बहन समय ने
कैसी पलटी खाई है
हमारी कितनी दुर्गति
हो रही है
दिन पर दिन इज्ज़त
धूल में मिल रही है
पहले हमसे लोग
कितना डरते थे
हमारे ख्याल भर से
घबराते थे
अब दिलों से
दूध में मक्खी की तरह
निकाली जा रहीं हैं
नैतिकता की
बलि चढ़ाई जा रही है
यही हाल रहा तो
वह दिन दूर नहीं
जब डरना तो दूर
धरती पर हमारा
नाम तक लेने वाला भी
नहीं बचेगा कोई



© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

15-154-5-08-2013

शर्म ,हया, इज्ज़त, जीवन, नैतिकता 

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

छोटी छोटी बात में रूठना हो तो


छोटी छोटी
बात में रूठना हो 
ह्रदय अहम् से 
भरा हो तो
मित्रता मत करना
एक क्षण के लिए भी 
दुःख का कारण 
मत बनना 
कहीं ऐसा ना हो 
मित्रता के नाम से ही 
घबराने लगूं 
तुमसे सीख कर 
पुराने मित्रों को भी 
खोने लगूं 
मित्रता विश्वास का 
शिखर 
धैर्य का कठिन पथ है 
एक दूजे की भावनाओं के 
सम्मान का समुद्र 
रिश्तों का अटूट सेतु है 
सेतु पर चल नहीं सको तो
उसे कभी तोड़ना मत 
छोटी छोटीबात में रूठना हो 
ह्रदय अहम् से भरा हो तो
मुझसे मित्रता मत करना 
डा.राजेंद्र तेला ,निरंतर
14-153-5-08-2013
मित्र मित्रता,जीवन

रविवार, 4 अगस्त 2013

अब कातिल ही मुंसिफ हो गया है


मुल्क का हाल
इतना
बेहाल हो गया है
अब कातिल ही
मुंसिफ हो गया है
इन्साफ
क्या ख़ाक मिलेगा
हर लम्हा डर कर
जीना पडेगा
खून का घूँट पी कर
रहना होगा
ख़्वाबों में भी मौत का
अहसास होगा
मुंसिफ,कातिल, इन्साफ
मुंसिफ= जज ,न्याय करने वाला
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
13-152-4-08-2013

कहने की ललक में

केवल 
कहने की ललक में 
तुमने जिव्हा पर
नियंत्रण खो दिया 

व्यक्ति विशेष की
स्थिति परिस्थिति पर
बिना सोचे समझे
कुछ कह दिया
यह तुमने न्याय
संगत नहीं किया
अपने संकुचित सोच का
परिचय तो दिया ही
हँसी और कटुता के
पात्र भी बने
रिश्तों में अवरोध भी
खड़े कर दिए
अब परिणाम भी
तुम्हें ही भुगतना पडेगा
जो भी कहा करा
उससे सीखना भी होगा


© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
08-147-4-08-2013

कहने की ललक ,रिश्ते,कटुता,प्रेरक,जीवन