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शनिवार, 3 अगस्त 2013

सच कहने के फितरत ने बहुत ज़ुल्म ढाए हम पर


सच कहने के फितरत ने
बहुत ज़ुल्म ढाए हम पर
हवाओं ने भी ढेरों
इलज़ाम लगाए हम पर
चाँद की ठंडक में भी
शोले बरसाए गए हम पर
दोस्त तो ने भी जी भर के
खंज़र चलाये हम पर
खुदा के रास्ते पर चलना
सितम ढा गया हम पर
सच कहना नहीं छोड़ेंगे
चाहे मौत भी आ जाए
दोस्त का भेष बदल कर
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
 07-146-3-08-2013

ज़िन्दगी,सच,फितरत,शायरी ,ज़ुल्म,selected,

आवाज़ थर्राने लगी,कंठ भर्राने लगे


आवाज़ थर्राने लगी
कंठ भर्राने लगे
इंसानियत को 
झुलसते देख
इंसानों के 
ह्रदय रोने लगे
लाचार हो कर
शर्म से 
मुंह छिपाने लगे
व्यथित मन से 
सोचने लगे 
यही होना था अगर
यही देखना था अगर
जन्म के साथ ही
जहाँ से आये थे वहीँ
क्यों ना लौट गए


© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
06-145-3-08-2013
इंसानियत, इंसान,जीवन


व्यथित क्यों होते हो


इच्छाएं 
पूरी नहीं हुई तो 
व्यथित क्यों होते हो
क्यों निराशा के
भंवर में फंसते हो
इच्छाएं तो
राम कृष्ण की भी
पूरी नहीं हुई
जीवन भर पूजा उन्हें
उनसे ही सीख लो
जो मिला
उसमें संतुष्ट रहो
अच्छे के लिए मन से
प्रयत्न करते रहो
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
05-144-3-08-2013
जीवन,व्यथित,राम ,कृष्ण,इच्छाएं,कर्म ,संतुष्टि,संतुष्ट 

शुक्रवार, 2 अगस्त 2013

मेरा वतन लुट रहा है,मेरा चमन लुट रहा है


मेरा वतन लुट रहा है
मेरा चमन लुट रहा है
हर दिन सियासत का
नया खेल हो रहा है
मोहब्बत के पौधों को
उखाड़ा जा रहा है
नफरत के काँटों को
रोज़ बोया जा रहा है
महकती थी फिजायें
जिसकी कभी
मोहब्बत के फूलों से
उन फिजाओं में अब
ज़हर घोला जा रहा है
इंसानियत को हर दिन
दफनाया जा रहा है
भाई को भाई से
लड़ाया जा रहा है
सियासत के खातिर
हैवान पूजा जा रहा है
मेरा वतन लुट रहा है
मेरा चमन लुट रहा है
04-143-2-08-2013
वतन,देश,नफरत,सियासत ,चमन

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

आज जब नानी की बात चली

आज जब 
नानी की बात चली 
मन के कोने में दबी 
नानी की एक एक 
बात याद आने लगी 
उनके अल्हड़पन की 
सुनहरी कहानी 
आँखों को नम कर गयी
तूँ इतना ही रहेगा 
या कभी बड़ा भी होगा 
नानी का इतना सा कहना 
बचपन में 
मुझे कभी नहीं भाया 
मुझे लगता जैसे नानी ने 
मेरे आत्म सामान को 
ललकारा 
उत्तर में जब नानी को 
मचल कर कहता था 
नानी हर साल बड़ा 
हो रहा हूँ
फिर भी तुम हर साल 
यही बात कहती हो
उत्तर में हँस कर नानी 
कहती थी 
तूँ बड़ा हो गया तो 
क्या हुआ 
मैं भी तो साल भर 
बड़ी हो गयी
मेरे लिए तो उतना ही रहा
मेरे बड़े होने को लेकर 
मेरा और नानी का 
मन मुटाव 
उनके जीवित रहने तक 
चलता रहा 
अब जब नानी संसार से 
विदा हो चुकी हैं 
उनकी बातें मुझे व्यथित 
करने के लिए रह गयी 
उनके नाती से उनकी बात 
उनका अल्हड़पन ही था
बूढ़ी उम्र में भी उनका 
बचपन जीवित था 
उसका सुहावना दर्शन 
मेरा सोभाग्य था
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
03-142-2-08-2013

बचपन,नानी,जीवन,यादें.अल्हड़पन

गुरुवार, 1 अगस्त 2013

आईने कितने भी बदलूँ


आईने कितने भी बदलूँ
अक्स उसका ही दिखता
चहरे कितने भी देखूं
हर चेहरे में अक्स
उसका ही दिखता
ख्व्वाब भी देखूं तो
अक्स उसका ही दिखता
सुबह-ओ-शाम फिजां में
अक्स उसका ही दिखता 
उसकी इबादत में
ज़िन्दगी बसर करता
खुदा में यकीन इतना
सिवाय खुदा के मुझे
कुछ और नहीं दिखता
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
02-141-1-08-2013
इबादत,खुदा,पूजा,पाठ,इश्वर,जीवन, अक्स,selected,
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

परेशां नहीं हूँ लोगों से

परेशां नहीं हूँ लोगों से 
परेशां हूँ लोगों के हाल से 
परेशानी नहीं हूँ 
बीमार को देख कर 
परेशां  हूँ 
नफरत की बीमारी से 
कौन करेगा इलाज़ 
कौन देगा गरूर 
ख़त्म करने की दवा
कोई चारागर नहीं दिखता 
जो कर दे इंसान की
फितरत का इलाज  
अब खुदा का ही सहारा 
वही करेगा इलाज 
इस लाइलाज बीमारी का 
खुद की औलाद को
इंसान बना कर रखेगा 
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
01-140-1-08-2013
इंसान,फितरत ,ज़िन्दगी,नफरत,खुदा ,बीमारी, गरूर
  

बुधवार, 31 जुलाई 2013

उनके दिल जलते रहे

हम अकेले थे 
वो बहुत थे 
नफरत से भरे थे
अहम् में चूर थे 
हमारे सुख 
उनसे देखे ना गए 
वो पत्थर मारते गए
हम चोट खा कर भी
मुस्काराते रहे  
हँसते हँसते 
आगे बढ़ते रहे 
उन के दिल जलते रहे 
समय व्यर्थ करते रहे 
अंत में थक गए
मुकाबले से हट गए 
हम चलते रहे
मंजिल पर पहुँच गए     
डा.राजेंद्र तेला ,निरंतर 
     
47-139-31-07-2013
नफरत,मंजिल,हार ,जीत,जीवन ,ज़िन्दगी

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर      

कौन बाँध सका है


कौन बाँध सका है
हवाओं को
कौन बाँध सका है
उजाले को
कोई बाँध नहीं सका
इच्छाओं को
जिसने भी बांधा
बांधा भावनाओं को
तड़पाया ह्रदय को
रुलाया मन को
हारा भी किसी से
तो हारा मन से
दे दिया ह्रदय 
किसी को 

© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
46-138-31-07-2013
हार,जीत,मन ,ह्रदय,जीवन


पहले धरती को जी भर के देख लूं


ना अम्बर की ऊंचाई
नापना चाहता हूँ
ना समुद्र की गहराई
जानना चाहता हूँ
पहले धरती को
जी भर के देख लूं
वृक्षों से जी भर के
बात कर लूं
बहते झरनों में
खुद को भिगो लूं
मचलती हवाओं के
संग मचल लूं
बहती नदी के साथ
अठखेलियाँ कर लूं
सुन्दर फूलों को 
निहार लूं
उसके बाद ही
अम्बर की ऊंचाई
समुद्र की गहराई के
बारे मैं सोचूंगा
तब तक धरती की
सुन्दरता का
आनंद लेता रहूँगा
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
45-137-31-07-2013
प्रकृति,पर्यावरण,अम्बर,धरती,वृक्ष,समुद्र,नदी

मंगलवार, 30 जुलाई 2013

मन व्यथा मुक्त हो तो


वह दिन अच्छा नहीं लगता
जिसमें सूरज तो चमकता है
मगर रात का आभास होता है
वह रात भी अच्छी लगती है
जिसके घनघोर अँधेरे में भी
उजाले का आभास होता है
दिन हो या रात व्यथा का
दर्पण निरंतर दिखता रहता है
ना उजाला भाता है
ना अन्धेरा अच्छा लगता है
मन व्यथा मुक्त हो तो
चाहे दिन का उजाला हो
या रात का अन्धेरा हो
हर पल अच्छा लगता है
44-136-30-07-2013
व्यथा,जीवन ,मन
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर


परम्पराओं का संसार

काल बदला
समय बदला 
पंचांग बदला
नहीं बदला तो
परम्पराओं का
संसार नहीं बदला
सदियों से
जंजीरों में जकड़ा
मान्यताओं का
ताला नहीं खुला
जीना कितना भी
दूभर लगे
मन पीड़ा से रोता रहे
दर्द से  
ह्रदय चीत्कार करे
मगर भीड़ से
पीछा नहीं छूटा
जो मन चाहता
कभी कर नहीं सका
स्वयं मनुष्य की 
बनायी
सीमाओं में बंधा
एक बार भीड़ का
अंश बना
फिर कभी निकल 
ना सका
जीवन पर्यन्त
छटपटाता रहा
पिंजरे में बंद पंछी सा
फडफडाता रहा
मगर परम्पराओं का
चक्रव्यूह 

तोड़ नहीं सका
स्वछन्द उड़ने की इच्छा
मन में दबाये संसार से
अतृप्त चला गया


© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
43-135-30-07-2013

भीड़,मान्यताएं ,परम्परा,जीवन,इच्छा,इच्छाएं

सोमवार, 29 जुलाई 2013

जीवन सत्य


मन की
भावनाएं हो
ह्रदय का प्रेम हो
पेट में रोटी नहीं तो
सिवाय भूख मिटाने के
कुछ याद नहीं आता
जीवन
भावनाओं और प्रेम से
अधिक आवश्यक होता
सत्य सिद्ध हो जाता
42-134-29-07-2013
मन,भावनाएं,ह्रदय,प्रेम, भूख, जीवन

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर