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शनिवार, 27 जुलाई 2013

किनारे के डर से

कोई किश्ती
किनारे नहीं लगी
अहम् से भरा 
किनारा फिर भी 
खुद में मस्त था
किसी से कोई
मतलब ना था
इस किनारे से
कोई किश्ती कभी
पानी में उतरी ही नहीं
उतरी तो भी
कभी लौटी ही नहीं
किनारे के डर से
मंझधार में डूब गयी
शायद इस किनारे की
फितरत भी
इंसान जैसी ही थी
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
41-133-27-07-2013
फितरत,इंसान,ज़िन्दगी ,किनारा


शुक्रवार, 26 जुलाई 2013

बरगद का पेड़


घर के बाहर लगा
बरगद का पेड़
आकाश से गिरने वाली
वर्षा की नन्ही बूंदों को
पत्तों की गोद में लेकर
 धीरे से धरती पर
लुड्का देता है
मानो चाहता है
ऊंचाई से
गिरने के बाद बूँदें
चोट ग्रस्त नहीं हो जाएँ
बरगद की
संवेदनशीलता देख कर
मन भाव विव्हल
हो जाता है
सोचने लगता है
काश मनुष्य भी
बरगद
जैसा सोच रखता
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
 40-132-26-07-2013

संवेदनशीलता, भाव विव्हल, जीवन, बरगद

कहीं बम फटे


कहीं बम फटे
मैं शक से देखा जाता हूँ
खाकी निकर पहन कर
निकलता हूँ
तो काफिर कहलाता हूँ
कहीं मस्जिद में
कुछ फेंका जाता है
मुझे पकड़ा जाता है
कोई मंदिर को
गंदा करता है
मुझे कसूरवार
ठहराया जाता है
जबकि सच तो यह है
मैं एक गरीब आदमी हूँ
अपने पेट के लिए
दिन भर मेहनत करता हूँ
मुश्किल से चंद रूपये
कमाता हूँ
मेरा भी दिल रोता है
जब भी किसी
मंदिर मस्जिद में
कुछ अनचाहा होता है
फिर भी कोई मुझे
मुसलमान कहता है
कोई मुझे
हिन्दू मानता है
ये सब नेताओं के
दिमाग की
धर्मान्धता की
संकुचित सोच की
गन्दी राजनीति की
उपज है
मैं तो खुद को
इस देश का साधारण
नागरिक समझता हूँ
समझता था
समझता रहूँगा
39-131-26-07-2013
राजनीति,धर्मान्धता,मंदिर मस्जिद,संकुचित सोच, मुसलमान ,हिन्दू

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

गुरुवार, 25 जुलाई 2013

तेरे प्रेम में इतना डूबा हूँ


तेरे प्रेम में
इतना डूबा हूँ
चाहे दिन में देखूं
रात में देखूं
खुली आँखों से देखूं
बंद आँखों से देखूं
सपने में देखूं
साक्षात देखूं
जब भी देखूं
तुझे ही देखूं
इश्वर से बस
इतनी ही प्रार्थना है
तूँ नहीं दिखे तो
कुछ ना देखूं
ह्रदय की बस
इतनी सी इच्छा है
हवाओं में देखूं
गगन में देखूं
पहाड़ों में देखूं
समुद्र में देखूं
हर जगह बस
तेरा प्रतिबिम्ब देखूं
मन की अब केवल
यही इच्छा है 
38-130-25-07-2013

प्रेम,प्यार,मोहब्बत,love
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

गुलमोहर

घर  के बाहर लगा
गुलमोहर का पेड
मेरे जीवन का 
मूक साथी ही नहीं 
रिश्तों का अटूट दर्पण भी है
दादाजी ने बचपन में
नित्य पानी से सींचने के
सार सम्हाल करते रहने के 
सख्त निर्देशों के साथ
इसे अपने सामने 
मेरे हाथों से 
धरती में लगवाया था  
तब से अब तक इसकी 
देखभाल करता रहा हूँ 
उम्र के इस पड़ाव तक
इसने भी मेरा 
भरपूर साथ निभाया 
जब भी व्यथित होता हूँ
गुलमोहर की छाया के
नीचे जा बैठता हूँ
कुछ समय में ही  
स्वयं को सहज पाता हूँ
प्रतीत होता है
गुलमोहर 
मेरी भावनाओं को 
समझता है
मुझे सांत्वना देता है
सुनहरी लाल पीले फूल
घर की शोभा 
उल्लास का वातावरण 
बढाते रहे हैं 
छोटी छोटी सुर्ख 
हरी पत्तियाँ
जीवन में हरियाली का 
आभास देती रहीं हैं 
शाखाओं पर बैठने वाले 
पक्षियों की चचाहट ने
मुझे कभी अकेलेपन का
अहसास नहीं होने दिया
अब जब उम्र की शाम है
आगे जीवन की अंधेरी 
रात है,
मेरी तरह गुलमोहर भी 
ढलने लगा है
पतियाँ डालियाँ भी 
कम हो गयीं
देख कर पता चलता है 
अब वह भी थकने लगा है 
जब भी इसे देखता हूँ
भगवान् से प्रार्थना करता हूँ
इसने जीवन भर मेरा 
साथ निभाया
अंतिम समय तक 
मेरा साथ निभाता रहे
मेरे संसार से जाने के 
साथ ही
यह भी प्राण छोड़ दे
पता नहीं 
बाद में कोई इसका 
ध्यान रख पायेगा या नहीं
मैं नहीं चाहता मेरे बाद
कोई इसकी उपेक्षा करे
इसे दुःख पहुंचाए
इसका दुःख केवल मात्र 
इसका ही नहीं
मेरा भी दुःख होगा 
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
34-126-25-07-2013
जीवन ,गुलमोहर,साथी,मित्र,बुढापा,भावनाएं,पेड

बिना किसी का सच जाने


किसी ने किसी को
बुरा इंसान बताया
बिना किसी का
सच जाने
कहने वाले का
मंतव्य जाने
तुमने उसे गीता का
पाठ समझ
मन में बिठा लिया
तुमने भी वही करना
प्रारम्भ कर दिया
जो दूसरे ने किया
उसे बुरा बताना
प्रारम्भ कर दिया
क्या उस व्याक्ति के
प्रति तुमने अन्याय
नहीं किया
अब तुम्ही बताओ
कौन अच्छा
कौन बुरा हुआ
अब तक तो कर लिया
अब आगे मत करना
बिना किसी का
सच जाने
उसे अच्छा
बुरा मत कहना
न्याय नहीं तो
अन्याय तो मत करना
33-125-25-07-2013
न्याय ,अन्याय,अच्छा,बुरा,मंतव्य,जीवन

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

बुधवार, 24 जुलाई 2013

यादें सावन के मौसम से कम नहीं होती


यादें सावन के
मौसम से कम नहीं होती
कभी तेज़ बारिश जैसे
मन के हर कौने को
सरोबार करती
कभी रिमझिम बरसती
मन को लुभाती
कभी बरसने की
उम्मीद दिला कर भी
नहीं बरसती
आधी अधूरी रहती
मन में बेचैनी पैदा करती
कभी काले बादलों की
गडगडाहट
कडाके की बिजली
बन कर डराती
यादें सावन के
मौसम से कम नहीं होती
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
32-124-24-07-2013

यादें,सावन,याद,मौसम

निश्चय अटल है


जगत में
अन्धकार घना है
मगर मन 
उजाले से भरा है
ऊर्जा से उफन रहा है
पथ कठिन है
मगर निश्चय अटल है
धमनियों में 
उबलता रक्त है
अवरोध पथ से डिगाएंगे
हर पल डराएंगे
मगर हम 
हार नहीं मानेंगे
ना ही घबराएंगे
लक्ष्य अवश्य पाएंगे
विजय पताका 
फहराएंगे
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
31-123-24-07-2013
निश्चय,लक्ष्य,जीवन,कर्म,अटल ,हार ,जीत,विजय

मंगलवार, 23 जुलाई 2013

पूर्वाग्रह से ग्रस्त


पूर्वाग्रह से ग्रस्त
==========================
मेरा लिखा 
अच्छा नहीं लगे
कोई बात नहीं
बिना पढ़े,
बिना सोचे समझे
मन में पूर्वाग्रह से
ग्रस्त हो कर
अगर आप ने कहा
मैंने
अच्छा नहीं लिखा
आपका कथन मुझे
अच्छा लिखने के लिए
प्रेरित करेगा
पर आपने 
स्वयं के लिए
अच्छा नहीं किया
वह दिन दूर नहीं
 जब आपके चेहरे से
पर्दा हट जाएगा
पूर्वाग्रह से ग्रस्त 

आपके संकुचित सोच
सब के सामने
उजागर हो जाएगा
आपकी 

किसी बात को कोई 
सम्मान नहीं देगा
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
30-122-23-07-2013

पूर्वाग्रह से ग्रस्त, संकुचित,सोच

पहली मुलाक़ात में ही

पहली
मुलाक़ात में ही
उन्हें नाराज़ कर बैठे
उन्हें तारीफ़ की
उम्मीद थी
हम हकीकत
बयान कर बैठे
बैठे ठाले एक
दुश्मन और बढ़ा बैठे
सच्चाई के हवन में
एक बार फिर
हाथ जला बैठे     
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
29-121-23-07-2013
तारीफ़,झूठ,सच,जीवन,नाराज़,दोस्त दुश्मन

सोमवार, 22 जुलाई 2013

जो मन कहता है

जो मन कहता है
अवश्य करो
पर करने से पहले
क्या मन चेतन है
जान लो
जीवन की
विषमताओं को
सूक्ष्म दृष्टि से
परख लो
स्थिति
परिस्थिति को
समझ लो
विवेक का
उपयोग करो
भावनाओं में
बहे बिना
जो भी करना है
अवश्य
करो
28-120-21-07-2013

मन,चेतन,विवेक,स्थिति,परिस्थिति,जीवन,निर्णय
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

रविवार, 21 जुलाई 2013

प्रश्न यह नहीं है


प्रश्न यह नहीं है
किसी से कुछ मिलेगा
या नहीं मिलेगा
प्रश्न यह भी नहीं
कोई कुछ देगा या ना देगा
जिससे भी मन मिलता है
जिसे भी ह्रदय चाहता है
वो कुछ दे या ना दे
उससे कुछ मिले या ना मिले
कोई तोल मोल नहीं होता
वो इंसान अच्छा लगता है
जो भी करे मन को भाता है
ह्रदय को लुभाता है
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
27-119-20-07-2013
तोल मोल,प्रेम,मोहब्बत,चाहत ,प्यार , 

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 

बात करने में क्या बिगड़ता है


जब लोगों को
कहते सुनता हूँ
बात करने में
क्या बिगड़ता है
बड़े बोल बोलने में
क्या जाता है
सोचने लगता हूँ
कितना अच्छा होता
अगर वास्तव में 
इन का कुछ चला जाता
सच्ची बात
कहना तो सीख जाते
जितना आवश्यक
उतना ही बोलते
लोगों की नज़रों में
तो नहीं खटकते
खुद भी
कुंठा रहित जीते
दूसरों को भी जीने देते
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर –अजमेर
26-118-20-07-2013
कुंठा,जीवन,बड़े बोल