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शनिवार, 13 जुलाई 2013

क्यों हमसे घबराते हो ?


क्यों हमसे
घबराते हो ?
देख कर छुप जाते हो
अगर निष्कपट हो 
ह्रदय में पाप नहीं
मन में शक नहीं
तो सामने आओ
आँखों से आँखें मिलाओ
हँस कर बात करो
मन में भ्रम
अगर है कोई तो
निश्चिंत हो कर प्रश्न करो
खुद की दुविधा दूर करो
हमें व्यथा मुक्त करो   
संबंधों को बनाए रखो
14-106-13-07-2013

शक,भ्रम,जीवन,निष्कपट,रिश्ते सम्बन्ध,संवाद
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

"मैं भी गुणी हूँ”


क्यों हर बात में
हर कार्य में
 "मैं भी गुणी हूँ”
जताने का प्रयत्न
करते हो
तुम बहुत बुद्धिमान हो
लोगों को बताने का
प्रयत्न करते हो
ऐसा कर तुम स्वयं 
अपनी हानि करते हो
स्वयं दर्शा देते हो
अहम् अहंकार से
पीड़ित हो
विश्वास की कमी
हीन भावना से
ग्रसित हो
किसी के गुण अवगुण
छुपते नहीं हैं
स्वयं के कहने जताने से
बढ़ते नहीं
उलटे घट जाते हैं
13-105-13-07-2013
हीन भावना, गुण,अवगुण, विश्वास, अहम्,अहंकार, बुद्धिमान

 डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 

यही ज़िन्दगी है...


एक मैं हूँ
एक तुम हो
एक वो है
हम सब हैं
अगर नहीं है तो
केवल "निरंतर"
वो ही तो कहता था
कोई था तो सही
मगर आज नहीं है
सब कभी ना
कभी होते हैं
कोई दिल से दूर
कोई दिल के करीब
मगर हमेशा रहते नहीं हैं
कल तुम भी सब कहोगे
एक निरंतर होता था 
यही ज़िन्दगी है...

12-104-13-07-2013
ज़िन्दगी
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर   

शुक्रवार, 12 जुलाई 2013

आदमी से लड़ रहा है आदमी


खुद से लड़ रहा है आदमी
अपने परायों से लड़ रहा है आदमी
आदमी से लड़ रहा है आदमी
जीत किसी से नहीं रहा है आदमी
अहम् से हार रहा है आदमी
होड़ में उलझ गया है आदमी
भ्रम जाल में फंस गया है आदमी
पथ से भटक गया है आदमी
कितना कमज़ोर हो गया है आदमी
जान कर भी अनजान बन रहा है आदमी

11-103-10-07-2013डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
जीवन,अहम्,आदमी,इन्सान   

गुरुवार, 11 जुलाई 2013

ज़िन्दगी जब ग़मों के दरिया में डूबी हो


ज़िन्दगी जब
ग़मों के दरिया में
डूबी हो
ज़माना दुश्मन लगता है
लोगों की सरगोशियाँ भी
साज़िश महसूस होती हैं
किसी की मुस्काराहट
खुद का मज़ाक लगती है
मन में हर शख्श से
नफरत होने लगती है
सिर्फ तन्हाई अपनी
लगती है
सरगोशियाँ =फुसफुसाहट
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर  
10-102-09-07-2013
ज़िन्दगी ,ग़म,सरगोशियाँ

बुधवार, 10 जुलाई 2013

क्यों मिलूँ किसी से


क्यों मिलूँ किसी से
जब तक कोई स्वार्थ नहीं
क्यों समय गवाऊं
जब तक कोई लाभ नहीं
क्यों मन के रिश्ते बनाऊँ
जब इंसान को
इंसान की चाह नहीं
वैसे भी जिनसे मिलता हूँ
मन से कहाँ मिलता हूँ
चेहरे पर झूठी
मुस्कान चिपकाए
मजबूरी में मिलता हूँ
अपना काम निकालता हूँ
क्यों दुनिया से उलट चलूँ
लोगों की गालियाँ खाऊँ
क्यों मिलूँ किसी से
जब तक कोई स्वार्थ नहीं
क्यों समय गवाऊं
जब तक कोई लाभ नहीं
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
06-98-09-07-2013


रिश्ते,जीवन,ज़िन्दगी ,मिलना जुलना,स्वार्थ,मतलब 

अति सब पर भारी पड़ती है


नदी किनारे लगे
उस पेड़ का क्या कसूर
जो उफनती नदी के
बहाव में उखड जाता है
बदहवास
भागती भीड़ के रेले में
उस बालक का
क्या कसूर
जो परिवार से
बिछड़ जाता है
चाहे प्रेम हो या
मनुष्य का क्रोध
अति सब पर भारी
पड़ती है
कभी किसी को
कभी किसी को रोंदती है
98-101-09-07-2013
जीवन,अति,

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

मंगलवार, 9 जुलाई 2013

ना जाने क्या हो गया लोगों को


ना जाने 
क्या हो गया लोगों को
उन्हें खिजा मंज़ूर है
मगर बहारें 
किसी और की हों
तो देख कर रोते हैं
जो मंदिर को पूजते हैं
मस्जिद को नहीं चाहते
जिनकी मस्जिद है
वो मंदिर से दूर रहते हैं
कितने नादाँ हैं वो लोग
जिन्होंने
देखा नहीं कभी खुदा को
फिर भी खुदा को 
नाम देते हैं
सारे जहां के मालिक को
दायरों में बांधते हैं
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
05-97-09-07-2013
धर्म,हिन्दू,मुसलमान,मंदिर मस्जिद,साम्प्रदायिक

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

हमने कुछ खोया है तो कुछ कमाया भी है


ज़िन्दगी में
कुछ खोया है
तो कुछ कमाया भी है
प्यार खोया है
तो प्यार पाया भी है
गम देखा है तो 
सुकून मिला भी है 
धोखा खाया है
तो विश्वास पाया भी है 
कुछ सीखा है
तो कुछ सिखाया भी है 
निराशा में रोया हूँ
तो हँसा भी हूँ
गिरा हूँ तो 
सम्हला भी हूँ  
अपनों को खोया है
तो दोस्तों को पाया भी है
ज़िन्दगी में हमने
बहुत कुछ खोया है तो
बहुत कुछ पाया भी है
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
04-96-09-07-2013
ज़िन्दगी,जीवन,अनुभव

क्योंकि मैं


क्योंकि 
केवल पीठ
थपथपाने के लिए
किसी की पीठ नहीं
थपथपाता
मेरी पीठ भी
कोई नहीं थपथपाता
इसमें बुरा भी क्या है
उलटा मेरे लिए अच्छा है
चाटुकारिता के
दल दल में धंसे
बदसूरत चेहरों से तो
दूर रह पाता हूँ
सोने को सोना
कोयले को कोयला
कह पाता हूँ
मेरे जैसे लोगों की
निष्पक्ष प्रतिक्रया
पाता हूँ
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
03-95-09-07-2013
जीवन ,प्रशंसा,झूठी प्रशंसा ,चाटुकार.चाटुकारिता,

मार्ग दर्शन


तेल भी है
दिया भी है
बाती भी है
लौ प्रज्वलित वाला
कोई नहीं
हिम्मत भी है
होंसला भी है
इच्छा भी है
मगर पथ
बताने वाला 
कोई नहीं
02-94-09-07-2013
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
मार्ग दर्शन,हिम्मत,होंसला,जीवन

क्षितिज पर हुआ जब मिलन गगन का धरा से


क्षितिज पर हुआ 
जब मिलन
गगन का धरा से
नम आँखों को देख कर
गगन बोला धरा से
अनभिग्य नहीं हूँ
तुम्हारी व्यथा से
तुमने ही पाला पोसा
मनुष्य को
वही मिटाना चाहता है
अब तुम को
लालच में लूट रहा है
तुम्हारी संपदा को
निरंतर नष्ट कर रहा
प्राकृतिक संसाधनों को
मचा रहा है तांडव
जैसा शिव ने भी नहीं
मचाया होगा
मनुष्य के लालच ने
मुझे भी नहीं छोड़ा

भर दिया
विषैले धुएं से
ध्वस्त कर रहा
ओजोन परतों को
उडती मशीनों से
लील रहा पक्षियों को
वह दिन दूर नहीं
जब प्रकृति ही देगी
दंड मनुष्य को
लील लेगी समस्त
जीव जंतुओं को

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
01-93-09-07-2013
प्रकृति,आकाश,धरा,धरती,पर्यावरण ,ओजोन ,जल स्त्रोत्र , प्राकृतिक संसाधन