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बुधवार, 24 अप्रैल 2013

दिन हो या रात



दिन हो या रात
पूनम हो या अमावस
बसंत हो या सावन
मन व्यथित है
जीना कठिन है
तब तक 
सब इकसार मेरे लिए
31-87-16-02-2013
व्यथित,व्यथा,दुःख
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

मंगलवार, 23 अप्रैल 2013

सच कह देता हूँ



मैं जानता हूँ
तुम मुझसे सदा
नाराज़ रहोगे
मुझसे नफरत करोगे
मेरी हर बात को
नापसंद करोगे
मन में जानते हो
मगर अहम् से भरे हो
इसलिए कभी सच को
स्वीकार नहीं करोगे
मैं सच कह देता हूँ
इसलिए मुझे
कभी नहीं चाहोगे
30-86-16-02-2013
सच,अहम्.नफरत,रिश्ते
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

सोमवार, 22 अप्रैल 2013

इंसान हूँ



इंसान हूँ
समाज का हिस्सा हूँ
मजबूरी में
भीड़ के साथ रहता हूँ
पर भीड़ से
अलग चलता हूँ
विवेक से सोचता हूँ
त्रुटियों से सीखता हूँ
अपने मन की करता हूँ
ना विरोध करता हूँ
ना विरोध सहता हूँ
भीड़ में भी
अकेला चलता हूँ
खुश रहता हूँ
इंसान,समाज,भीड़,अकेला,जीवन,विवेक
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर   

रविवार, 21 अप्रैल 2013

अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गयी खेत



मित्र को बाहों में
सर छुपाये बैठा देखा
विषाद का कारण पूछा
रुआंसा होकर बोला  
पहले मैं हंसता था सब पर
आज सब मुझ पर हँस रहे हैं
ताने दे रहे हैं
हम नहीं कहते थे
उनकी हर बात मत मानो
इतना सर पर ना चढाओ
एक दिन पछताओगे
हमारी बातों को याद करोगे
तब समझ नहीं आया था
लाड प्यार देता रहा
हर इच्छा पूरी करता रहा
कमियाँ छुपाता रहा
काले को सफ़ेद कहता रहा
आज जब पानी सर से
ऊपर निकल गया
अब पछताए होत क्या
जब चिड़िया चुग गयी खेत
का अर्थ समझ आ गया
अब पछताए होत क्या
28-84-16-02-2013
जब चिड़िया चुग गयी खेत,विषाद,दुःख
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर