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शनिवार, 13 अप्रैल 2013

फूलों की महक चिड़ियों की चहक



फूलों की महक
चिड़ियों की चहक
कल कल करते
पानी की ध्वनि
बेफिक्र बालक की हँसी
शहद की मिठास
साज़ की आवाज़
अगर चुरा कर रख लेता
तो अकेलापन
काटने को नहीं दौड़ता
19-75-12-02-2013
अकेलापन
 डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 

गुरुवार, 11 अप्रैल 2013

खुदा ने भेजा था



खुदा ने इंसान की 
शक्ल में भेजा था
फ़रिश्ता ज़मीन पर
सोचा था 
खुदा का नुमाइन्दा
बन कर जियेगा
ज़मीन पर ज़न्नत बसाएगा
उसे पता ना था
आब-ओ-हवा ज़मीन की
कुछ ऐसी निकलेगी
फ़रिश्ता भी
हैवान बन जाएगा
गर पता होता तो पहले
ज़मीन की
आब-ओ-हवा बदलता
फिर इंसान को
ज़मीन पर भेजता
18-74-11-02-2013
आब-ओ-हवा, खुदा,इंसान,फ़रिश्ता,हैवान
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

बुधवार, 10 अप्रैल 2013

हास्य कविता -हँसमुखजी -पीछा छूटने की ख़ुशी में



हँसमुखजी  खुद को
धुरंधर हास्य कवि समझते थे
अफ़सोस मगर उनकी रचनाओं पर
खुद अधिक लोग कम हँसते थे
एक बार कविता पाठ के अंत में
 उन्होंने थके पिटे मुंह लटकाए
श्रोताओं से भावुकता में कह दिया
कविता पाठ समाप्त होने के बाद
आपकी ज़ोरदार तालियों ने
मुझे भाव विव्हल कर दिया
अगली बार मैं आपको
अधिक कवितायें सुनाऊंगा
बाल नोचते हुए एक श्रोता
पूरी ताकत से चिल्लाया
कवि महोदय लोग आपको नहीं
दूसरे कवियों को सुनने आते हैं
आपसे पीछा छूटने की ख़ुशी में
ज़ोरदार तालियाँ बजाते हैं
आपकी दो चार कवितायें भी
बर्दाश्त नहीं कर पाते हैं
सुनते सुनते हँसने की जगह
रोने लगते हैं 
ज्यादा कवितायें सुनाओगे
तो दो चार लोग दुःख में
आत्म ह्त्या कर लेंगे
आप हास्य कवि के स्थान पर
मातमी कवि कहलाओगे
17-73-09-02-2013
हँसमुखजी , हास्य,व्यंग्य,हास्य कविता ,हँसी
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

सोमवार, 8 अप्रैल 2013

जब भी करता हूँ दोस्ती किसी से


जब भी करता हूँ
दोस्ती किसी से
शक्ल-ओ-सूरत नहीं देखता
जो भी दिल को भा गया
उसे ही दोस्त बना लेता
ना देखता उम्र 
ना देखता धन दौलत
ना देखता मर्द औरत
जो भी मन को भाता है 
उसे ही दोस्त बना लेता हूँ 
जो भी देता सुकून मुझे 
खुदा का अक्स समझ कर
उसे ही अपना लेता हूँ 
न सोचता कभी 
क्या देगा ,क्या देना पडेगा
जो करता नहीं हिसाब दोस्ती में
उसे ही दोस्त बना लेता हूँ 
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
16-72-08-02-2013
दोस्त,दोस्ती,उम्र,जीवन

मार्च की दोपहर



मार्च की दोपहर 
=========
मार्च की दोपहर 
पतझड़ का मौसम
पीले पत्ते टूट कर
हवा में उड़ रहे
धरती पर बिखर रहे
नए पत्ते
जन्म लेने को आतुर
टहनी की
कोख में पल रहे
वृक्ष निस्तेज खड़े
असमंजस में डूबे
बिछड़ों के दुःख में
आसूं बहाएँ
या आनेवालों का
स्वागत करें

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
15-71-08-02-2013
मार्च,मौसम,पतझड़ ,वृक्ष

रविवार, 7 अप्रैल 2013

उसकी बेवफाई का जवाब कैसे देता

उसकी 
बेवफाई का
जवाब कैसे देता
दिल से 
चाहा उसको 
पलट कर वार 
कैसे करता
वो ज़ुल्म पर ज़ुल्म 
ढाती रही 
हँस कर 
सहने के सिवाय
क्या करता 
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
शायरी.मोहब्बत,बेवफाई, चाहत,
14-70-07-02-2013