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शनिवार, 6 अप्रैल 2013

सूरज के चढ़ने के साथ


सूरज के चढ़ने के साथ
आशाएं भी चढ़ने लगती
चेहरे की उदासी
लुप्त होने के डर से
व्यथाएं घबराने लगती
मन के दरवाज़े पर
हँसी की आहट 

सुनायी पड़ने लगती
शाम होते होते
उदासी फिर से 

चहकने लगती
सूर्य रश्मियाँ
क्षितिज की 

गोद में छुप जाती
एक बार फिर आशाएं
मुंह चुरा लेती

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
13-69-06-02-2013
उदासी, आशाएं
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

शुक्रवार, 5 अप्रैल 2013

उतने ही पैर पसारिये जितनी लम्बी सोर


कुछ लोगों की टोपी
उनके सिर से छोटी होती है
कुछ लोगों की टोपी
उनके सिर से बड़ी  होती हैं
दोनों ही स्थितियों में
भद्दी लगती है
कुछ लोग अपनी
औकात से
बड़ी बात करते हैं
कुछ लोग अपनी
औकात से कम करते हैं
वो लोग
ज्यादा सुन्दर दिखते हैं
जिनकी टोपी
सिर पर ठीक बैठती है
वो लोग ज्यादा खुश रहते हैं
जो औकात में रहते हैं
जितनी लम्बी सोर
उतने ही पैर पसारते हैं
डा.राजेंद्र तेला ,निरंतर
12-68-05-02-2013
औकात,दंभ,उतने ही पैर पसारिये जितनी लम्बी सोर

नाम की चाहत में



इंसान से बड़े
इंसान के साए हो गए हैं
नाम की चाहत में
अहम् के दास बन गए हैं
होड़ के संसार में
इंसानियत भूल गए हैं
अपनों से पराये हो गए हैं
इंसान कम
इंसान के पुतले रह गए हैं
भ्रम में जी रहे हैं
09-65-05-02-2013
इंसान ,इंसानियत,जीवन,चाहत
डा.राजेंद्र तेला ,निरंतर

गुरुवार, 4 अप्रैल 2013

नदी के दो किनारे


हमारे सम्बन्ध 
नदी के दो किनारों के 
मानिंद हो गए हैं 
संबंधों का बहता पानी 
दोनों किनारों को 
सामान रूप से छूता है 
पर किनारे मिल नहीं सकते 
अलग भी नहीं हो सकते 
अगर यही मनोस्थिति रही 
स्वार्थ और घ्रणा से पानी 
इतना दूषित हो जाएगा 
एक दिन दोनों किनारे टूट जायेंगे 
हमारे सम्बन्ध भी 
पानी की तरह बिखर जायेंगे 
सदा के लिए टूट जाएंगे 
ऐसा हो उससे पहले आओ 
एक कदम मैं बढाता हूँ
एक कदम तुम बढ़ाओ 
मन से अहम निकाल फैंको 
बहते पानी को 
रिश्तों का पुल समझ कर 
दोनों किनारों को मिला दो
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

08-64-04-02-2013
रिश्ते,सम्बन्ध,किनारे,नदी के किनारे ,जीवन

बुधवार, 3 अप्रैल 2013

हास्य कविता-हास्य कवी हँसमुखजी



हँसमुखजी अपने को
हास्य कवी समझते थे
घमंड में जीते थे
लोग कविताओं पर कम
उनकी शक्ल सूरत पर
अधिक हँसते थे
लोगों को हँसते देख
हँसमुखजी घमंड की
एक सीढ़ी और चढ़ जाते थे
लोगों भी ज्यादा
 ठहाके लगाने लगते थे
एक दिन उनके सर पर
घड़ों पानी पड़ गया
जब उनकी कविताओं से
पीडित
एक श्रोता से रहा नहीं गया
उनसे कह दिया
हँसमुखजी आपकी
कवितायें  बहुत मार्मिक होती हैं
अगर आपकी शक्ल सूरत
अजीब नहीं होती
तो किसी को बाल भर भी
हँसी नहीं आती
रोते रोते जान ही निकल जाती
कवितायें हकीकत बन जाती
07-63-03-02-2013
हास्य ,हास्य कविता,हँसी,हास्य व्यंग्य
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

मंगलवार, 2 अप्रैल 2013

सियासत की चाहत में



सियासत की चाहत में
जब ज़मीर ही बेच दिया
कैसे दीन-ओ-ईमान
की बात करूँ
गद्दी के नशे ने इस हद तक
खुदगर्ज़ बना दिया
इंसानियत ही भूल गया
कोई अपना भी रास्ते में
आ जाए
उसे भी मौत की नींद सुला दूं
इंसान के भेष में हैवान
बन गया हूँ
कैसे खुदा से दुआ करूँ
04-60-02-02-2013
सियासत,इंसानियत,खुदगर्ज़, दीन-ओ-ईमान
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

सोमवार, 1 अप्रैल 2013

दिल चीर कर भी रख दूं



दिल चीर कर भी रख दूं
तुझसे मोहब्बत
साबित हो नहीं सकती
कितनी भी गुहार लगाऊँ
सच्चाई बयाँ हो नहीं सकती
जब तक तुझे
यकीन नहीं मुझ पर
कुछ भी कहूं
मेरी हर बात तुझे
झूठी लगती रहेगी
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
02-58-01-02-2013
यकीन,विश्वास,मोहब्बत,ऐतबार   

आओ अब कुछ नया किया जाए



आओ अब कुछ नया किया जाए
===============
आओ अब कुछ
नया किया जाए
लीक से हट कर
चला जाए
रिश्तों को
निभाया जाए
अपनों को अपना
बना कर रखा जाए
परायों को
अपना बनाया जाए
जीवन को
सुखद बनाया जाए
आओ अब कुछ
नया किया जाए
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर   
01-57-01-02-2013
रिश्ते,जीवन,सम्बन्ध ,अपने.पराये

रविवार, 31 मार्च 2013

दिन ढल गया रात भी धोखा दे गयी



दिन ढल गया
रात भी धोखा दे गयी
सपनों में
मिलने की इच्छा भी
पूरी ना हुयी
ह्रदय को दर्द की 
आदत नहीं 
जीना है अगर
हर अनहोनी की
तैयारी करनी पड़ेगी
हार सहने की आदत 
डालनी होगी
दर्द सहते सहते भी 
आँखों की
नमी सुखानी होगी
बेमन से ही सही
चेहरे पर हँसी भी
रखनी होगी
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
56-56-30-01-2013
जीवन,आदत,सहना,