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शनिवार, 30 मार्च 2013

कभी सोचा भी ना था



बकरा खुशियों से
लबालब भरा था
उसे मिल रहा था
नित नया भोजन
ढेर सारा प्यार दुलार
कभी सोचा भी ना था
इंसान से मिलेगा
ऐसा सुन्दर व्यवहार
उसे आभास तक ना था
कल ईद पर
उसे कुर्बान होना है
जिबह होने से पहले
मोटा ताज़ा बनना है
ज़िंदा है जब तक
 इतना लाड प्यार
मिल रहा है
सब के सर पर
उसका ही भूत

 सवार है
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
55-55-30-01-2013
व्यवहार,इंसान ,

शुक्रवार, 29 मार्च 2013

अब वो नज़र नहीं आती



वही खिड़की
वही सड़क
वही 
चलते दौड़ते लोग
मगर अब
आँखों को चैन
हवा में महक नहीं
चिड़िया तक
चहकती नहीं
कितना भी ढूंढूं
नज़रें गडाए बैठूं
मगर अब वो
नज़र नहीं आती 
54-54-28-01-2013
इंतज़ार,प्यार,मोहब्बत
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 

गुरुवार, 28 मार्च 2013

तशद्दुद से अमन चाहते हो



तशद्दुद से
अमन चाहते हो
नफरत से
मोहब्बत चाहते हो
बन्दूक की गोली से
फूल चाहते हो
तुम रास्ता भटक चुके हो
पत्थर से पानी
निकालना चाहते हो
इंसान हो कर
इंसान को मारते हो
दहशतगर्दी को
मज़हब बचाना कहते हो
ज़न्नत की ख्वाहिश में
दोजख के सफ़र पर चलते हो
वक़्त रहते खुदा के
कहर से खुद को बचा लो
क़ज़ा मिले इससे पहले
नापाक ख्याल छोड़ दो
इंसान हो
इंसान बन कर जी लो
तशद्दुद=हिंसा,दहशतगर्दी=आतंकवाद ,मज़हब=धर्म
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
तशद्दुद=हिंसा
दहशतगर्दी=आतंकवाद   

मज़हब=धर्म 
53-53-28-01-2013
तशद्दुद=हिंसा,दहशतगर्दी=आतंकवाद ,मज़हब=धर्म
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
तशद्दुद=हिंसा
दहशतगर्दी=आतंकवाद   
मज़हब=धर्म 

बुधवार, 27 मार्च 2013

इस बार की होली



इस बार की होली
यादगार बन जाए
बिछड़ों को मिलाये
मन के रंज मिटाए  
दुसमन दोस्त बन जाए
इच्छाएं पूरी हो जाएँ
जीवन में रंग भर जाए
चेहरे खुशी से दमक जाएँ
इस बार की होली
जीवन भर याद आये
52-52-27-01-2013
होली, यादगार
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

हम भूल गए



हम भूल गए होली पर
गली मोहल्ले नाचना गाना,
चंग बजाना  हँसना हँसाना
प्रेम भाईचारे से मिलना जुलना,
रंग गुलाल से होली खेलना
गिले शिकवे दूर करना
याद रह गया केवल ई मेल.
एस एम एस भेजना
51-51-27-01-2013
होली ,ई मेल, एस एम एस,
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

मंगलवार, 26 मार्च 2013

अब समझ भी लेंगे तो क्या फर्क पडेगा



जब ज़िन्दगी भर
नहीं समझ सके मुझ को
अब समझ भी लेंगे
तो क्या फर्क पडेगा
ज़िन्दगी भर
रोने सहने के बाद
ना मन खुश होगा
ना चेहरे पर हँसी आयेगी
उनकी नाराजगी का डर
इस हद तक बैठ चुका है
मन में
मुझे खुश देख कर
कहीं नाराजगी नहीं
बढ़ जाए उनकी

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
48-48-26-01-2013
ज़िन्दगी,नाराजगी,समझ ,ना समझ,खुशी

अरसे बाद घर की छत पर एक परिंदा नज़र आया


अरसे बाद
घर की छत पर
एक परिंदा नज़र आया
उससे पूछ लिया
आज कल परिंदों का
शहर की ओर आना कम
क्यों हो गया ?
परिंदे ने आश्चर्य से देखा
फिर सहमते हुए बोला
तुम इंसान हो कर
ऐसा कह रहे हो
लगता है तुम में
अभी इंसानियत बची है
इसलिए
यह प्रश्न पूछ रहे हो
मैं मन से नहीं आया
मेरे दादा से
शहर के किस्से सुने
तो रहा नहीं गया
मैं भी शहर देखने
आ गया
अब डर रहा हूँ
इंसान की नज़रों में
आने के बाद
क्या लौट भी पाऊंगा
या मेरे हज़ारों
रिश्तेदारों जैसे
किसी इंसान का
शिकार हो कर
शहर में ही जान दे दूंगा
47-47-26-01-2013

प्रकृति,पक्षी,परिंदे,पर्यायवरण,जीव जंतु
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

सोमवार, 25 मार्च 2013

ये साज़िश भी कैसी बला है

ये साज़िश भी 
कैसी बला है 
कभी मन
हृदय से करता है 
कभी ह्रदय 
मन से करता है 
कभी दोस्त
दोस्त को नहीं छोड़ता है 
कभी अपना पराये से
कभी पराया अपने से
करता है 
कभी संतान माँ बाप से
माँ बाप संतान से
पत्नी पति से,
पति पत्नी से
बात मनवाने के लिए
साज़िश करता है 
कभी मौसम भी 
साज़िश करने से 
बाज़ नहीं आता
गर्मी में सर्दी  
सर्दी में गर्मी
का अहसास देता
काला बादल बरसे बिना 
गुम हो जाता है 
जिसने भी बनायी 
साज़िश
उससे प्रार्थना करता हूँ
साज़िशों से 
बचा ले मुझको 
46-46-25-01-2013
साज़िश
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

महाकाव्य लिखने के प्रयास में



महाकाव्य
लिखने के प्रयास में
चंद कवितायें तक
नहीं लिख सका
कलम तो थकी नहीं
हिम्मत का कागज़
जवाब दे गया
अपनों के
प्रतिकार से सहम कर
सदा की तरह चुप
हो गया
खुद के दुखों को
बाज़ार करने से
बच गया
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
45-45-24-01-2013
हिम्मत, प्रतिकार

रविवार, 24 मार्च 2013

अब मैंने डायरी लिखना बंद कर दिया है



अब मैंने डायरी 
लिखना बंद कर दिया है
पुरानी डायरी के पन्ने 
जब भी पढता हूँ 
उबकाई आने लगती है 
डायरी भरी हुई है 
रिश्तों के टूटने की यादों से
दोस्ती को दुश्मनी में 
बदलने की कहानियों से 
इर्ष्या और होड़ में फंसे 
लोगों के किस्सों से 
अपनों पर अपनों के 
हमले की घटनाओं से 
विश्वाश पर
विश्वासघात की जीत के 
रोमांच से भरी बातों से
सोचता हूँ अगर डायरी 
किसी बच्चे के हाथ पड़ गयी 
खेलने कूदने की उम्र में ही 
उसे ज़िन्दगी की हकीकत 
पता चल जायेगी
समय से पहले ही उसे 
ज़िन्दगी से घ्रणा होने लगेगी
जब तक दूर है 
ज़िन्दगी के काले सच से 
तब तक तो ज़िन्दगी को 
हँसते खेलते जी ले 
इसलिए अब मैंने डायरी 
लिखना ही बंद कर दिया है 
केवल ज़िंदगी के 
उजले पक्ष से भरे पन्नो को 
सम्हाल कर रखूंगा 
बाकी पन्नों को 
सदा के लिए नष्ट कर दूंगा
खुद भी भूल जाऊं 
प्रयासरत रहूँगा 
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

44-44-24-01-2013
विश्वाश, विश्वासघात,यादें ,ज़िन्दगी,जीवन,याद,इर्ष्य,रिश्ते ,डायरी
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर