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शनिवार, 23 मार्च 2013

हास्य कविता --हँसमुखजी बोले...



हँसमुखजी बोले मित्र से
कल तुम मेरे घर आये थे
मैं तुम्हारे घर गया था
तुम्हें मैं घर पर नहीं मिला
मुझे तुम घर पर नहीं मिले
मित्र बेचैन हो कर बोला
क्यों राई का पहाड़ बना रहे हो
आगे बोलो फिर क्या हुआ
हँसमुखजी बोले सब्र रखो
सुनो तो सही
मेरे घर भी ताला लगा था
तुम्हारे
घर पर भी ताला लगा था
मित्र बोला
क्यों हैरान कर रहे हो
आगे क्या हुआ वो बताओ
हँसमुखजी बोले
आगे क्या होना था
तुम अपने घर लौट गए
मैं अपने घर लौट गया
दोनों की इच्छा पूरी नहीं हुई
मिलना कल चाहते थे
मिलना आज हुआ
43-43-23-01-2013
हास्य,हास्य कविता,हँसमुखजी
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर  

गौहर जान: एक विलक्षण व्यक्तित्व


गौहर जान: एक विलक्षण व्यक्तित्व
जब भी भारत में संगीत को रिकोर्ड करने की बात होगी ,गौहर जान का नाम लिए बिना अधूरी रहेगी,वह सही मायने में भारत की पहली "रिकॉर्डिंग सुपरस्टार" थी
गौहर जान एक विलक्षण गायिका ही नहीं, धर्मनिरपेक्ष ,असाधारण प्रतिभा, सौंदर्य ,और दया से भरपूर एक आकर्षक व्यक्तित्व की मालकिन भी थी.उनके बारे में कई किस्से प्रचिलित हैं ,कुछ की सत्यता का पता लगाना अब संभव नहीं है.फिर भी संगीत के इतिहासकारों ने जो भी जानकारी अब तक एकत्र करी एवं समकालीन समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में छपे लेखों के आधार पर ही गौहर जान के जीवन के कुछ पहलुओं का चित्रण कर रहा हूँ,श्री विक्रम संपत ने उनकी जीवनी पर एक पुस्तक भी लिखी है" MY NAME IS GAUHAR JAAN!: The Life and Times of a Musician"श्री सुरेश चंदवनकर ने गौहर जान की जीवनी का गहराई से अध्ययन किया ,उन्होंने अपने लेखों में गौहर जान के जीवन के पहलुओं पर काफी कुछ लिखा है. अभी भी गौहर जान के १५० रिकार्ड संग्रहकर्ताओं के पास सुरक्षित हैं. ग्रामोफ़ोन कंपनी ऑफ़ इंडिया ने १९९४ में गौहर जान के गाये १८ गानों का ऑडियो टेप और सी डी निकाली जिसका नाम रखा "चेयर मैन्स चोइस "गौहर जान की गायी कुछ प्रसिद्द रचनाएँ निम्न हैं : "हमसे ना बोलो राजा,जिया में लागे अन बन ","मोरे दर्द-ऐ-जिगर","राधे कृष्ण बोल मुख से","तन मन दिन जा सावरियां ,रस के भरे तोरे नैन" ,"पीया कल तोरी बनावटी बात ना मानी री ","माइका पीया बिन कछु ना सुहावा"उसकी सबसे प्रसिद्द राग भैरवी में गायी ठुमरी "मोरा नाहक लागे गवनवा ,जबसे गए मोरी सुध ही ना लीनी "और “पिया जाओ सौतन के संग रहो ”थी,उनकी अधिकांश रचनाएँ कृष्ण भक्ति से परिपूर्ण हैं.जो उसकी धर्मनिरपेक्षता की और इंगित करती है
गौहर जान का असली नाम ऐंजेलीना योवर्ड था. उसका जन्म २६ जून १८७३ को हुआ था ,उनके पिता विलियम रॉबर्ट योवर्ड पटना ग्राम,जिला आज़मगढ़ ,संयुक्त प्रांत (उत्तर प्रदेश)की बर्फ के कारखाने में इंजीनियर थे. वे एक आर्मेनियन मूल के इसाई थे,उन्होंने भारत में जन्मी विक्टोरिया हैमिंग से विवाह किया. लेकिन यह शादी ज़्यादा दिन नहीं चल सकी १८७९ में उनका विवाह विच्छेद हो गया
विक्टोरिया हेम्मिंग्स को भारतीय संगीत और नृत्य में गहरी दिलचस्पी थी और उनके एक मुसलमान जागीरदार ख़ुर्शीद से संबंध भी थे. तलाक़ के बाद विक्टोरिया,ख़ुर्शीद और अपनी बेटी(गौहर) के साथ १८८१ में बनारस चली गईं और वहां उन्होंने इस्लाम क़ुबूल कर लिया. अपना नाम बदल कर मलका जान रख लिया , बनारस में वो एक निपुण गायिका और कत्थक नृत्यांगना बन गयी,वे बड़ी मलका जान (उस समय ३-४ और मलका जान हुआ करती थीं ),और उनकी बेटी गौहर जान के नाम से प्रसिद्द हुईं.
बनारस के सांस्कृतिक जीवंत माहौल में, संगीत, नृत्य और कविता में गौहर जान की जन्मजात प्रतिभा खिली, माँ और बेटी का भाग्य बदल गया .१८८३ में मलका जान कलकत्ता चली गयी और नवाब वाजिद अली शाह की के दरबार में में गाने लगी. कुछ ही समय में वे कलकत्ता के सबसे प्रसिद्ध “बाईजी” के रूप में गिनी जाने लगी, तीन वर्ष में ही मलका जान ने २४,चितपुर रोड (अब रबिन्द्र सारिणी ) पर स्थित एक हवेली ४०००० रु.में खरीदी ,जो उस समय में एक बहुत ही बड़ी रकम थी.दोनों माँ और बेटी ने कई महान कलाकारों से संगीत,गायकी और नृत्य का प्रशिक्षण जारी रखा. उनके पहले शिक्षक उस्ताद इमदाद खान थे जो सारंगी पर दोनों माँ बेटी का साथ देते थे
गौहर जान ने ,उस्ताद अली बख्श (पटियाला घराने के संस्थापक) पटियाला घराने के उस्ताद काले खां,उस्ताद वजीर खान (रामपुर घराना) से हिन्दुस्तानी शास्त्रीय गायकी और संगीत सीखा ,सृजन बाई से ध्रुपद ,ठुमरी, दादरा, चरण दास से बंगाली कीर्तन सीखा शीघ्र ही वह "हमदम "के नाम से ग़ज़ल लिखने भी लगी ,साथ ही वह रबिन्द्र संगीत में भी निपुण हो गयी, उन्होंने ने अपने समकालीन संगीतज्ञों -गायकों से भी शिक्षा ली उनमें प्रमुख हैं ,मोजुद्दीन खान ,भैय्या गनपत राव और प्यारे साहब .
गौहर जान ने दरभंगा राज दरबार में १८८७ में १४ वर्ष की उम्र में पहली बार अकेले अकेले प्रदर्शन किया, महाराजा उनके हूनर से इतने प्रभावित हुए उन्होंने, गौहर जान को बनारस में एक पेशेवर नृत्यांगना से नृत्य और संगीत के गहन प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद उसे दरभंगा राज दरबार में एक संगीतकार के रूप में नियुक्त किया.
गौहर जान ने जनवरी १८९६ में कोलकाता में अपने हूनर का प्रदर्शन करना प्रारम्भ कर दिया था देखने में वे मध्य कद काठी की गोरवर्ण की एक सुन्दर महिला थी
दरभंगा राजदरबार से वे रामपुर नवाब के दरबार में चली गयी,और बाद में मुंबई .
उस समय के प्रसिद्द लेखक अब्दुल हलीम शरार,(लखनऊ) ने लिखा है,"उसे १८९६ में गौहर जान के अद्भुत प्रदर्शन को देखने का अवसर मिला,उनके नृत्य ने सभी को चकाचौंध कर दिया था ,पूरे तीन घंटे तक,एक ही विषय "बताना" में अपने कौशल (नृत्य में शारीरिक गतिविधियों के माध्यम से चित्रण) से सभी दर्शकों को( जिसमें विशेषज्ञ नर्तकियां, और प्रतिष्ठित लोग उपस्थित थे )को मंत्रमुग्ध कर दिया था,वहाँ एक बच्चा भी ऐसा नहीं था जो उसके नृत्य प्रदर्शन से प्रभावित नहीं था ".
वे भारत की पहली कलाकार थीं, जिनका गाना ग्रामोफोन पर रिकॉर्ड किया गया, यह संगीत की दुनिया का ऐतिहासिक दिन था। इसके लिए उन्हें उस जमाने में ३००० रुपए की फीस अदा की गई थी। पहले ग्रामोफ़ोन रिकॉर्ड की कहानी भी बड़ी रोचक है. इंगलैंड की ग्रामोफ़ोन कम्पनी ने भारत के बाज़ार पर कब्ज़ा करने की नियत से पहली बार पूरब का रुख़ किया कम्पनी ने स्थानीय कलाकारों की खोज के लिए भारत में अपना एक प्रतिनिधि नियुक्त किया, साथ ही अपने अधिकारियों को भारत भेजा. बहुत से कलाकारों को सुनने के बाद, एक ऐंग्लो-इंडियन कलाकार गौहर जान का चयन हुआ. कोलकाता के एक होटल में एक अस्थाई स्टूडियो बनाया गया. २ नवंबर १९०२ को जब रिकार्डिंग के लिए गौहर जान सुबह ९ बजे होटल पहुँची तब उनके साथ उनके रिश्तेदार और साजिन्दे भी थे, उनका शरीर महंगे गहनों से लदा हुआ था ,उनसे तीन मिनट के लिए गाने को कहा गया और रिकॉर्डिंग के अंत में गौहर जान को बोलना था "माय नेम इज गौहर जान " पहले रिकार्ड के लिए गौहर जान ने राग जोगिया में एक खयाल गाया था, ग्रामोफोन रिकॉर्ड के जनक एमिल बर्लिनर के सहायक ,फ्रेड गैस्बर्ग ,द्वारा पहली रिकॉर्डिंग की गयी जो विशेष रूप से इंग्लैण्ड से आये थे
रिकॉर्डिंग के लिए कोलकाता के एक होटल के दो बड़े कमरोंमें एक अस्थायी रिकॉर्डिंग स्टूडियो बनाया गया था,. ,रिकार्डिंग होने बाद ७८ आर पी एम के अस्थायी मोम के रिकार्ड को जर्मनी में हनोवर भेजा गया था ,जहां वास्तविक (चपड़े का) रिकार्ड बना कर बाज़ार में उतारा गया १९०३ तक, उसके रिकॉर्ड भारतीय बाजारों में दिखाई देने लगे और उनकी भारी मांग होने लगी थी.अपने जीवनकाल में, वह बंगाली, हिंदुस्तानी, गुजराती, तमिल, मराठी, अरबी, फारसी, पश्तो, फ्रेंच, और अंग्रेजी सहित १० से अधिक भाषाओं में गाती थीं , १९०२ से १९२० तक उनके ६०० से अधिक रिकॉर्डबनाए गए , प्रारम्भिक रिकार्डों पर लिखा रहता था "फर्स्ट डांसिंग गर्ल ऑफ़ कैलकट्टा "
रागदारी,संगीत,ठुमरी,दादरा,कजरी,चैती,भजन तराना आदि विधाओं में उनके गायन के रिकार्ड बनाए गए ,उन्होंने रिकार्ड के ज़रिये "कच्चा गाना" को प्रसिद्द किया,जहाँ एक ओर उस समय के दूसरे बड़े गायक और गायिकाएं रिकार्डिंग से बचते रहे,वहीं गौहर जान ने इस विधा का भरपूर इस्तेमाल किया,और रिकार्डिंग में महारथ हांसिल करी,लोकप्रिय होने में उन्हें इसका भरपूर लाभ भी मिला.उनके रिकार्डों से भारतीय शास्त्रीय संगीत के अध्ययन में काफी मदद मिलती रहेगी,आज भी यू ट्यूब पर उसके कई गाने सुने जा सकते हैं .
गौहर जान ने विक्टोरिया पब्लिक हॉल में एक संगीत कार्यक्रम के लिए १९१० में मद्रास(चेन्नई ) का दौरा किया, और थोड़े दिन बाद ही उनके हिंदुस्तानी और उर्दू गाने तमिल संगीत पुस्तक में प्रकाशित किए गए थे. दिसम्बर, १९११ में, उन्हें किंग जॉर्ज पंचम के राज्याभिषेक के अवसर पर दिल्ली दरबार में निमंत्रित किया गया जहां उन्होंने महारानी विक्टोरिया और किंग जॉर्ज पंचम के सामने इलहाबाद की जानकी बाई के साथ एक युगल गीत प्रस्तुत किया (ये ताजपोशी का जलसा मुबारक हो,मुबारक हो ) उपहार के रूप में दोनों गायिकाओं को सोने की १०० गिन्नियां राजा की तरफ से भेंट की गयी, ।
१९१२ में बेंगलुरु में उनके प्रदर्शन पर 'भारतीय संगीत' जर्नल के संपादक एच.पी. कृष्णा राव, ने टिप्पणी की : "वह एक मीठी आवाज है जो लंबे समय बिना किसी तनाव और थकान के, समान रूप से भव्य लगती है
वह शानदार चेहरे की अभिव्यक्ति और विभिन्न भाव भंगिमाओं में निपुण थी इसके अलावा गाने की निर्दोष शैली और हाथ पैरों के लयबद्ध तालमेल के अद्भुत प्रदर्शन में उन्हें महारथ हांसिल थी.
उन्होंने उर्दू में बनारस के हाकिम बन्नो साहिब हिलाल,से ग़ज़ल लेखन सीखना शुरू किया, और ज़ल्द ही एक मशहूर शायरा बन गयी ,उनका ग़ज़ल संग्रह (दीवान)मख्जान-उल्फत-ऐ-मलिका प्रकाशित हुआ जिसमें १०६ गजलें और कुछ गाने थे .कहा जाता है कि उसके शुरुआती दिनों में बेगम अख्तर हिंदी फिल्मों में अपना कैरियर बनाना चाहती थी लेकिन गौहर और उनकी माँ के गायन सुनने के बाद,उन्होंने विचार त्याग दिया और पूरी तरह से खुद को हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत सीखने के लिए समर्पित कर दिया.
कुछ वर्षों में ही उनके गाये गानों के रिकार्ड के कारण वह भारत भर में लोकप्रिय हो गयी और उन्हें कई प्रतिष्ठित संगीत समारोहों में आमंत्रित किया जाने लगा १९११ में, उन्हें प्रयाग संगीत समिति, ने आमंत्रित किया जिसके लिए उन्हें १००० रुपए का भुगतान किया गया था . गौहर जान की उस जमाने में इतनी शोहरत थी कि उनके नाम पर भारी भीड़ जुट जाती थी।कहा जाता है ,अपने चरमोत्कर्ष पर वे नजराने के रूप में एक शाम के १०००-३००० रूपये लेती थीं और कुछ वर्षों में ही करोडपती हो गयी थीं..लेकिन उनकी असीम दौलत के बारे में कोई जानकारी नहीं है.१९२० में महात्मा गांधी की गौहर जान से मुलाकात हुई, तो उन्होंने उनसे अनुरोध किया कि वे कांग्रेस के लिए चंदा जुटाने का काम करें। गौहर जान इसके लिए तैयार हो गईं, पर उन्होंने गांधीजी के सामने एक शर्त रखी। कि गांधीजी उनके कार्यक्रम में उपस्थित रहेंगे .
गांधीजी ने उनकी बात मान ली, लेकिन जब कार्यक्रम शुरू हुआ तो गांधीजी अचानक राजनीतिक घटनाचक्र के कारण उस समारोह में शामिल नहीं सके। उन्होंने अपने प्रतिनिधि के रूप में मशहूर नेता और निजी सचिव शौकत अली को भेजा ,समारोह में टिकटों की बिक्री से २४००० हजार रुपए जमा हुए, शौकत अली जब चंदे की राशि लेने गए तो गौहर जान ने उन्हें केवल १२००० रुपए ही दिए। इस पर शौकत अली ने पूछा कि चंदे की आधी राशि ही क्यों ? तो गौहर जान ने कहा कि आप जाकर गांधीजी से कहिए कि वे इतने ईमानदार और सत्यवादी आदमी हैं तो उन्होंने अपना वचन क्यों नहीं निभाया? वे समारोह में क्यों नहीं आए? उन्होंने अपना वादा तोड़ा इसलिए मैं चंदे की आधी रकम दे रही हूं,उनकी लोकप्रियता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि माचिस की डिब्बी तथा पिक्चर पोस्टकार्ड पर उनकी तस्वीरें छपती थीं.
हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत के विद्वान पंडित विष्णु नारायण भातखंडे ने उन्हें भारत में सबसे बड़ी महिला ख्याल गायिका घोषित किया था,गौहर जान के बारे में प्रसिद्द है ,उन्हें एक बार दतिया राज्य के महाराजा ने अपने दरबार में गाने का आमंत्रण दिया,यात्रा के लिए उन्होंने पूरी ट्रेन आरक्षित करवाई ,और करीब १५० कारिंदों,साजिंदों के साथ गौहर जान रीवां गयी.
गौहर जान पूरे भारत में घूमती रही ,अपनी भारत यात्रा में विभिन्न राज्यों में एक अतिथि के रूप में रही वहां अपनी कला का सार्वजनिक प्रदर्शन किया, उसे बड़ी कार और बग्घियों का भी बहुत शौक़ था.वह घुड़दौड़ की भी शौकीन थी इसलिए घुड़दौड़ के मौसम के दौरान मुंबई की यात्रा करती वहां दिन घुड़दौड़ के मैदान पर और शाम और रातें संगीत कार्यक्रमों में गुजरती थी. संगीत की एक शाम में गाने के वह ३०० रुपए लेती थी,जो बहुत बड़ी रकम होती थी.उसके जीवन से कई किवदंतियां जुडी हैं, गौहर जान इतनी रईस थीं कि उस जमाने में बड़ी-बड़ी पार्टियां किया करती थीं और एक पार्टी में २०००० हजार रुपए खर्च कर देती थीं. कोलकाता में वे आठ घोड़ों की बग्गी में चलती थीं।कलकत्ता में,बड़ा बाज़ार में हिन्दुस्तानियों पर बग्घी चलाने पर प्रतिबन्ध था,कानून तोड़ने वालों पर उस समय १००० रूपये का जुर्माना लगता था,गौहर जान ने कई बार कानून तोड़ कर बघ्गी बाज़ार से निकाली और भारी जुर्माना भरा , जब उनकी पालतू बिल्ली ने बच्चे दिए ,उन्होंने खुशी में २०००० रूपये पार्टी में खर्च कर दिए अपनी पालतू बिल्ली की शादी में उन्होंने १२०० रूपये खर्च किये . किसी भी अन्य महान व्यक्तित्व के साथ कई किवदंतियां जुडी रहती हैं ये कितनी सच होती हैं कहना मुश्किल है,उनकी निजी जिंदगी में उन्हें अपने दोस्तों और रिश्तेदारों के द्वारा धोखा दिया गया था. जीवन में कई पुरुषों से उनका सम्बन्ध रहा,पर निजी जीवन में खुश नहीं रह सकी,उन्हें कई अदालती लडाइयां भी लडनी पडीं
उन्होंने अपने से दस वर्ष छोटे सैय्यद गुलाम अब्बास (जो की उनका निजी सचिव भी था और संगत में तबला भी बजाता था )से शादी कर ली. जब उन्हें पता चला उनके पति के अन्य महिलाओं से भी सम्बन्ध हैं ,उन्हें गहरा मानसिक आघात लगा,.कहा जाता है मुंबई में उनका सम्बन्ध गुजराती मंच के सुन्दर और मशहूर अभिनेता श्री अमृत वागल नायक से ३-४ वर्ष तक रहे, वहां उन्होंने श्री अमृत वागल नायक द्वारा लिखे गए कई गीत गाये और रिकार्ड किये ,श्री नायक के अचानक निधन ने उसे मानसिक रूप से परेशान कर दिया था. रिश्तेदारों ने उन्हें कोलकाता लौटने के लिए मना लिया . लेकिन गौहर  लंबे समय तक कोलकत्ता में नहीं रह पायी आखिरकार,अंतिम दिनों में,कृष्णा राजा वाडियार चतुर्थ मैसूर के निमंत्रण पर, वह मैसूर चली गयी और १ अगस्त, १९२८ को, उन्हें राज दरबार में संगीतकार' के रूप में नियुक्त किया गया है, वहीं ५७ वर्ष की उम्र में १७ जनवरी को उनकी मृत्यु हो गई, आज के समय में जब मीडिया और संचार के साधन जब चरम पर हैं अफ़सोस जनक बात है ,अधिकतर लोगों को संगीत की इस महान शख्शियत के बारे में पता ही नहीं है,अगर गौहर जान ने इस समय में जन्म लिया होता तो उसकी प्रसिद्धी का अंदाज़ ही नहीं लगाया जा सकता.कुछ भी कहो गौहर जान जैसी शख्शियत सदी में दो चार ही पैदा होती हैं ,संगीत के जानकार और इतिहासकारों की निगाह में उनसे बड़ा विलक्षण व्यक्तित्व वाला भारत के संगीत,नृत्य इतिहास में नहीं हुआ.
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
(गौहर जान के चित्र इंटर नैट के सौजन्य से ,और प्रकाशित सामग्री विभिन्न स्त्रोत्रों से ली गयी है )




मन के अँधेरे कोने में छुपी व्यथा



मन के अँधेरे
कोने में छुपी व्यथा
बार बार मन को कचोटती है
क्यों उसे एकांत के
अँधेरे में बाँध रखा है
खोखली हंसी के पीछे
छुपा रखा है
कितना भी हँस लो
चेहरे पर चेहरा चढ़ा लो
एक दिन सब्र का बाँध
टूट ही जाएगा
मैं बाहर आ जाऊंगी
तब भी तो तुम्हें
दुनिया को अपना असली
चेहरा दिखाना पडेगा
क्यों ना आज ही मुझे
मन के अँधेरे कोने से
बाहर निकाल कर
कुंठा मुक्त कर दो
तुम स्वयं भी कुंठा
मुक्त हो जाओ
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
42-42-23-01-2013
मन ,व्यथा,व्यथित कुंठा,जीवन
डा.राजेंद्र तेला ,निरंतर

शुक्रवार, 22 मार्च 2013

रात को चांदनी मुस्काराई होगी



रात को
चांदनी मुस्काराई होगी
सवेरे धूप भी खिली होगी
सड़कों पर
चहल पहल हुई होगी
चिड़ियाएं चचहाई होगी
मंदिर की
घंटियाँ भी बजी होगी
पर उसे क्या
उसकी ज़िंदगी काल के 
गाल में समानेवाली है 
थोड़ी देर में उसे
फांसी होने वाली है
सदा के लिए तन्हाई
विदा लेने वाली है
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
41-41-22-01-2013
जीवन, मृत्यु ,तन्हाई, फांसी

गोरिय्या पर कविता -आज तक मनुष्य को नहीं समझ पायी



शहर में गोरिय्या का
बुरा हाल हो गया है
किसी पेड़ पर कोई
बसेरा नहीं बनाने देता
किसी घर में खुशी से
कोई आने नहीं देता
भूले से पहुँच भी जाए
तो भगा दी जाती
गुलेल से
जान बच भी जाए
तो बहेलियों के जाल में
फंस जाती
जीने की इच्छा लिए
निरंतर
मौत का सामना करती
अंतिम क्षण तक हार
नहीं मानती
जीवन दुरूह होता है
यह तो समझ गयी
पर मनुष्य को
नहीं समझ पायी
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
40-40-22-01-2013
गोरिय्या, मनुष्य, प्रकृति,पर्यावरण,पक्षी,चिड़िया

गुरुवार, 21 मार्च 2013

तुमने समझा जीवन एक नर्म बिछोना है


तुमने समझा जीवन एक नर्म बिछोना है
=====================
जीवन के दुर्गम पथ पर
चलता रहा
ठोकर खा कर गिरता रहा
उठ कर 
खड़ा होता रहा 
सदा हँसता रहा
तुम थोड़ा सा चल कर थक गए
ठोकर खा कर बैठ गए
दुःख 
में रोते रहे
तुमने समझा
जीवन एक नर्म बिछोना है
मैंने समझा जीवन 
परीक्षा है 
निरंतर चलते रहना कर्तव्य है
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
39-39-21-01-2013
जीवन,लक्ष्य, कर्तव्य

बुधवार, 20 मार्च 2013

तुम्हारी तो खबर भी नहीं



तुम्हारी तो
खबर भी नहीं
कुछ अपना हाल ही
बता दूं 
तुम्हारे जैसे ही
रातों को जागता हूँ
ख्यालों में खोता हूँ
अकेले में रोता हूँ
फर्क सिर्फ इतना सा है
मैं बता कर
कुछ लम्हों के लिए 
सुकून पा लेता हूँ
तुम तो
इतना भी नहीं करती हो
घुट घुट कर जीती हो
गरूर में चुप रहती हो
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
39-39-20-01-2013
गरूर,खबर,मोहब्बत  
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर    

कुछ पल के लिए ही सही



ह्रदय की हलचल
मन की खुशी
जीवन की व्यथा
सांझा करी तुमसे
मैं नहीं कहता
ह्रदय की हलचल
मन की खुशी
तुम भी सांझा करो
पर जीवन की व्यथा तो
सांझा कर लो 
सुलझा तो नहीं पाऊंगा
दिलासा तो दे पाऊंगा
कुछ पल के लिए ही सही
तुम्हारे मन को
चैन तो दे पाऊंगा
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
38-38-19-01-2013
चैन,हलचल,दिलासा,सांझा करना,व्यथा ,जीवन   
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

मंगलवार, 19 मार्च 2013

कोई सुहाए ना सुहाए


चाहो तो
ह्रदय से पूछ लो
चाहो तो मन से पूछ लो
कौन सुहाता 
कौन नहीं सुहाता
कोई सुहाए ना सुहाए
चाहे मजबूरी कह दो
चाहे लाज शर्म से कह दो
रिश्ता तो फिर भी
निभाना पड़ता
जब निभाना ही है
क्यों ना हँस कर निभाओ
तनाव मुक्त रहो
स्वयं भी खुश रहो
दूसरों को भी खुश रखो
37-37-18-01-2013
रिश्ते,सम्बन्ध ,तनाव,जीवन
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

हार कर भी जीत जाऊंगा



इतना बलशाली नहीं हूँ 
तुमसे लोहा ले सकूँ
पर इतना 
निर्बल भी नहीं हूँ 
तुम्हारे
निरंकुश दुर्व्यवहार का
प्रतिरोध ना कर सकूँ
हार भले ही जाऊं
पर हार मानूंगा नहीं
सिद्ध कर दूंगा
निर्बल भी बलवान से 
लड़ सकता है
दुर्व्यवहार का प्रतिरोध
कर सकता है
मैं हार कर भी जीत
जाऊंगा
हर निर्बल को
हिम्मत से भर दूंगा
उसके मन से
बल के आगे झुकने का
भय हटा दूंगा
आत्मविश्वास का
मन्त्र दे पाऊंगा
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
36-36-18-01-2013
बलवान,निर्बल,हिम्मत,दुर्व्यवहार,आत्मविश्वास,,हार,जीत

सोमवार, 18 मार्च 2013

अगर तुम्हें समझना चाहूँ



अगर 
तुम्हें समझना चाहूँ
मुझे भी तुम्हारे जैसे 

सोचना होगा
तुम मुझे समझना चाहो
तुम्हें भी
मेरे जैसे ही सोचना होगा
  यह आसान नहीं होगा
हमें
अहम् को छोड़ना होगा
एक दूसरे की स्थिति,
परिस्थिति का ध्यान
रखना होगा
स्वयं को दूसरे के

 स्थान पर रख कर 
सोचना होगा
तभी हम एक दूसरे को
समझ पायेंगे
नहीं तो स्वयं को सही
दूसरे को गलत कहते रहेंगे



© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
 
35-35-18-01-2013
सम्बन्ध,रिश्ते,समझना ,अहम्
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

ज़माने की हवा कुछ ऐसी चली



ज़माने की हवा
कुछ ऐसी चली
धूप भी डर कर
छाया में रहने लगी
कोई दिन दहाड़े उसका
उजाला ही नहीं लूट ले
उसकी इज्ज़त से
नहीं खेल ले
घबरा कर
मुंह छिपाने लगी
कहीं और जा कर खिलूँ
परमात्मा से
प्रार्थना करने लगी
34-34-17-01-2013
इज्ज़त, इज्ज़त लूटना,बलात्कार,धूप,उजाला 
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

रविवार, 17 मार्च 2013

हाथों की लकीरों को देखता हूँ



हाथों की
लकीरों को देखता हूँ
सोचने लगता हूँ
भाग्य की प्रतीक्षा करूँ
या
हाथों की ताकत 
काम में लूं 

 कर्म से भाग्य बनाऊँ
जानता हूँ
बिना कर्म भाग्य भी
साथ नहीं देता
हिम्मत और विवेक हो तो
भाग्य स्वयं बन जाता
सफलता को
कदम चूमने के लिए
बाध्य कर देता
भाग्य पर अत्यधिक
विश्वास रखने के लिए
स्वयं से क्षमा माँगता हूँ
कर्म में जुट जाता हूँ



© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
 
30-30-15-01-2013
भाग्य,किस्मत,कर्म,विवेक
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर