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शनिवार, 16 मार्च 2013

ये ख्वाब भी बड़े जिद्दी होते हैं


ये ख्वाब भी
बड़े जिद्दी होते हैं
बिन बुलाये ही आ जाते
अरमानों को
आसमान पर चढ़ा देते 
पूरा होने के इंतज़ार में
उम्र पूरी हो जाती
मगर ये कभी पूरे नहीं होते 
जिद पर अड़े रहते हैं
ख्व्वाब ही रह जाते हैं
30-30-16-01-2013    
ख्व्वाब, जिद, जिद्दी
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

मिलना चाहूंगा उनसे जिनसे अभी तक मिला नहीं



मिलना चाहूंगा उनसे
जिनसे अभी तक
मिला नहीं
जानना चाहूंगा उन्हें
जिन्हें अभी तक
जाना नहीं
नहीं जान पाऊंगा
नहीं मिल पाऊंगा
तो तमन्ना साथ ले
जाऊंगा
पर भूलना चाहूंगा
उन्हें जो मिले तो सही
पर उनके दिल साफ़
नहीं थे
शक्ल सूरत से
इंसान दिखते ज़रूर थे
मगर इंसान नहीं थे
मगर जाने से पहले उन्हें
धन्यवाद
ज़रूर देकर जाऊंगा
उन्होंने ही
तो सिखाया मुझको
किसी की यादें साथ
लेकर जाऊं
किसकी यादें यहीं
छोड़ जाऊं
29-29-15-01-2013    
जीवन ,मिलना जुलना ,इंसान,यादें,याद
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

शुक्रवार, 15 मार्च 2013

विचारों से द्वंद्व करते करते



विचारों से
द्वंद्व करते करते
नींद की गोद में 

समाया ही था
खिड़की पर आहट ने
आधी नींद से जगा दिया
खिड़की खोलते ही 
हवा का 
झोंका कमरे में आया
हवा से नींद भंग करने का 
 कारण पूछा 
हवा मुस्काराते हुए बोली
बर्फीले पहाड़ों से होते हुए
गर्म रेगिस्तान में झुलसते हुए
नदी के बहते पानी को छूते हुए
वृक्षों के हरे भरे पत्तों के
बीच से छनते  हुए
महकते फूलों को चूमते हुए
तुम्हें बंद दरवाजों के
अँधेरे कमरे से
छुटकारा दिलाने आयी हूँ
आओ उठ खड़े हो जाओ
मेरे साथ चलो
प्रकृति का आनंद लो
व्यथा को कम करो
मेरे जैसे ही 

निरंतर बहते रहो
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
28-28-15-01-2013    
 हवा,पवन,वायु ,बयार ,पर्यावरण,जीवन , व्यथा,प्रकृति

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

गुरुवार, 14 मार्च 2013

अब कोई राम कृष्ण अर्जुन पैदा क्यों नहीं होता



अब कोई
 राम कृष्ण अर्जुन
पैदा क्यों नहीं होता
क्यों कंस रावण,दुशासन
ही पैदा होते हैं
क्या समय इतना
बदल गया है
या इश्वर इतना
उलझ गया है
पहचान ही नहीं पाता
किस को धरती पर
भेज रहा है
क्या नीचे आने वाले भी
चेहरे पर चेहरा
चढ़ा कर रहते हैं
इश्वर को
राम कृष्ण दिखते हैं
नीचे आते हैं तो
रावण,कंस निकलते हैं
27-27-14-01-2013    
कृष्ण,राम, इश्वर, अर्जुन,
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

आदत से मजबूर हूँ



बार बार समझाता हूँ
बार बार पूछता हूँ
क्यों क्रोध करते हो
बात बात में चिढते हो
क्या धैर्य धीरज भूल गए
सहनशीलता से भी
रुष्ट हो गए
जब पहले कभी
क्रोध से समस्याओं का
समाधान नहीं हुआ
अब कैसे हो जाएगा
तुम्हारा खून अवश्य जलेगा
रिश्तों में खटास
मन में तनाव भी बढेगा
तुम कहोगे
बार बार एक ही बात
क्यों दोहराता हूँ
मैं भी जानता हूँ
क्रोध घातक होता है
पर क्या करूँ
आदत से मजबूर हूँ
मैं भी कह देता हूँ
अग्रज होने के कारण
तुम्हें समझाना
मेरा कर्तव्य है
जब तक कर्तव्य अधूरा है
हिम्मत नहीं हारना
मेरी आदत है
मैं भी आदत से 
मजबूर हूँ

© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
26-26-14-01-2013    
क्रोध, कर्तव्य, आदत
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

ऐ दोस्त .....



ऐ दोस्त
हमारी छोटी सी खता को
तुमने दिल में उतार लिया
हमें दिल से ही निकाल दिया
हम दिल में तुम्हारे जैसी
तल्खी तो नहीं रखते
मलाल सिर्फ इस बात का है
तुमने ये भी नहीं बताया
 हमारी खता क्या है
इक बार हमारे दिल में
झाँक कर देखो
कमजोरियों के
चंद छोटे काँटों के अलावा
मोहब्बत के फूलों से भरा है
इंसानियत की महक से
महक रहा है
फिर भी तुम अगर
हमें गुनाहगार मानते हो
खुदा की रज़ा समझ
मंज़ूर कर लेंगे
ना आसूं बहायेंगे
ना नाराज़ होंगे
हँसते हँसते जीते रहेंगे
तुम्हारे दिल में पल रहे
नफरत के शज़र सूख जाएँ
मोहब्बत के फूल महक जाएँ
इंसान बन कर जी सको
तुम्हारे लिए खुदा से
दुआ करते रहेंगे
25-25-14-01-2013    
तल्खी,खता,शायरी,नज़्म,इंसानियत,मोहब्बत,दोस्त 
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

बुधवार, 13 मार्च 2013

अहम् की गांठें



अहम् की गांठें
खुल जाती अगर
रिश्तों की रस्सी के
बल सुलझ जाते
रिश्तों में
पवित्रता आ जाती
अपने पराये ना बनते
सड़क पर चलने वाले
पराये कम
अपने अधिक होते
अपने अपने ही नहीं
ह्रदय के हिस्से होते

© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
24-24-13-01-2013  
अहम्,रिश्ते,
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर  

मंगलवार, 12 मार्च 2013

मेरी आस्था ने



ह्रदय के दुःख
मंदिर के घंटों जैसे
पल पल मन में
गूंजते रहते हैं
इश्वर को याद करते हैं 
पर ना कभी मंदिर में
इश्वर को घंटों की
आवाज़ पर आते देखा
ना ही दुखो को जाते देखा
पर उपरवाले पर
मेरी आस्था ने
मुझे टूटने नहीं दिया


© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
 
23-23-12-01-2013  
आस्था,विश्वास,इश्वर,दुःख,जीवन 
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

मेरी बात मान लो यारों



कोई मोहब्बत के रोने
रो रहा है
गम में आसूं बहा रहा है
कोई यादों में खोया हुआ है
भावनाओं के आगे भी
ज़िन्दगी बहुत है यारों
कभी कभी थोड़ा सा
हँस भी लिया करो यारों
नहीं तो समय से पहले
दुनिया से चले जाओगे
इसको भी जान लो यारों
सोचने समझने में
समय व्यर्थ मत करो
मेरी बात मान लो यारों
अभी से ही खुल कर हँसना
प्रारम्भ कर दो यारों
22-22-12-01-2013     
मोहब्बत,गम,हँसी,हँसना,ज़िन्दगी
डॉ.राजेंद्र तेला,निरंतर   

सोमवार, 11 मार्च 2013

कभी कभी पथ से भटक जाती है कलम



कभी कभी पथ से
भटक जाती है कलम
बालक की तरह
जिद पर अड़ जाती है
मुंह फुला लेती है कलम
कितना भी प्रलोभन दूं
मान मनुहार करूँ
मानती नहीं है कलम
मन की व्यथा निकालूँगा
प्यार की बातें लिखूंगा
ह्रदय को बहलाऊंगा 
हास्य कविताएँ लिखूंगा
खूब हँसूँगा हसाऊँगा
पर समझती नहीं कलम
इश्वर का नाम लिखूंगा
उसका गुणगान करूंगा
पसीजती नहीं कलम
कभी कभी पथ से
भटक जाती है कलम
बालक की तरह
जिद पर अड़ जाती है
मुंह फुला लेती है कलम
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
21-21-011-01-2013
कविता,कलम,पथ से भटकना ,
  डा.राजेंद्र तेला,निरंतर