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शनिवार, 9 मार्च 2013

सुबह जब आँख खुली


सुबह जब आँख खुली तो 
सुबह बदली बदली सी लगी
ना सूरज की रश्मियाँ दिखाई दी 
ना कोयल की कूंक 
चिड़ियों की चचहाट सुनायी दी
ना पत्तों पर ओस की बूँदें 
ना कलियों में 
पुष्प बन खिलने की 
आतुरता थी
सोचता समझता कारण 
जानने का प्रयत्न करता 
उसे पहले ही पता चल गया
आज भी अखबार के 
पहले पन्ने पर 
एक नाबालिग से
 ह्त्या बलात्कार की 
खबर छपी थी
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
18-18-08-01-2013
नारी,उत्पीडन,स्त्री ,अत्याचार,हत्या,बलात्कार 

शुक्रवार, 8 मार्च 2013

निश्चित ही मैं भी नश्वर हूँ



शरीर नश्वर
निश्चित ही मैं भी नश्वर हूँ
जब परमात्मा के इस अभेद्य
नियम का पालन होगा
क्या बचेगा
मुट्ठी भर राख और अस्थियाँ
उन्हें भी किसी नदी में
बहा दिया जाएगा
नाम भी कितनों को
कितने दिन याद रहेगा
धीरे धीरे याद रखने वालों के
साथ ही लुप्त हो जाएगा
उस गुलाब के फूल की तरह
जो बगीचे में खिलता है
सबकी आँखों का तारा होता है
महक से सबको लुभाता है
उसी बगीचे में एक दिन
सूख जाता है
पत्तियाँ बगीचे की मिट्टी में
लुप्त हो जाती हैं
बगीचा फिर भी कभी
वीरान नहीं होता
नए पेड़ पौधे,
फूल खिलते रहते हैं

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
17-17-07-01-2013
जीवन,शरीर,नश्वर,मृत्यु

ना ऊपर से नर्म अन्दर से सख्त हूँ


न ऊपर से नर्म
अन्दर से सख्त हूँ
न ऊपर से सख्त
अन्दर से नर्म हूँ
न भ्रम में रखता हूँ
न भ्रम देता हूँ
न चेहरे पर 
चेहरा चढ़ाता हूँ
जैसा बाहर से दिखता हूँ
वैसा ही भीतर से हूँ
दोस्तों में मुंहफट
कहलाता हूँ 
आज के ज़माने में
मिसफिट हूँ


© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
16-16-07-01-2013
चेहरे पर चेहरा चढ़ाना ,मुंहफट, भ्रम,
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

गुरुवार, 7 मार्च 2013

जब मन दुखी कलम थकी हो



जब मन दुखी
कलम थकी हो
कैसे उम्मीदों की 
बात लिखेगी
दिल में दर्द की 
टीस उठ रही हो
कैसे किसी को 
खुश करेगी
खुद के ग़मों का बोझ
दूसरों के 
कन्धों पर लाद देगी
उन्हें भी उनके 
ग़मों की याद दिला देगी
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
15-15-07-01-2013
गम,दर्द ,दुःख
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर  

अति उत्साह में


बड़े चाव से
धरती में बीज लगाया
मन में
सुन्दर सपना संजोया
बीज एक दिन सुन्दर
वृक्ष का रूप लेगा
सुगन्धित फूलों से लदेगा
मीठे फलों से सजेगा
ह्रदय में आशाओं का
संसार बसाया
अति उत्साह में बार बार
पानी पिलाता रहा
आतुरता से निहारता रहा
पूरा हो सपना सुहाना
इश्वर से प्रार्थना करता रहा
बीज पल्लवित नहीं हुआ
सपना अधूरा रहा
अधिक पानी ने बीज ही
गला दिया


© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
 
14-14-07-01-2013 
                                                     अति ,उत्साह,सपना,प्रेरक ,प्रेरणास्पद 
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

बुधवार, 6 मार्च 2013

प्रेम दिव्य ज्योति है



प्रेम तन मन 
भक्ति आसक्ति 
स्नेह ही नहीं 
दिव्य ज्योति है
परमानंद है
भावनाओं का
अथाह सागर है
जितना भी 

डूबना चाहो
डूब सकते हो
प्रकृति और जीवों को
जितना भी
समझना चाहो
समझ सकते हो
अपने अन्दर
समाहित करना चाहो
कर सकते हो
फिर भी उसकी
सीमाओं को
छू नहीं सकते
गहराई को
नाप नहीं सकते


© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
13-13-06-01-2013
प्रेम
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर


मकड़ जाल



आस्था विश्वास
अनिष्ट और भय के
मकड़ जाल में उलझा हूँ
एक का पल्ला पकड़ता हूँ
दूसरा अपनी ओर
खीचने लगता है
आस्था और विश्वास
मुझे मरने नहीं देते
अनिष्ट और भय
मुझे जीने नहीं देते
निरंतर असमंजस के
संसार में डुबकियां
लगाता रहता हूँ
ना खुल कर हँस पाता हूँ
ना खुल कर रो पाता हूँ
12-12-06-01-2013
आस्था,विश्वास,अनिष्ट,भय   
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

मंगलवार, 5 मार्च 2013

ज़िन्दगी का लुत्फ़ उठाना हो



ज़िन्दगी का
लुत्फ़ उठाना हो
मस्ती में जीना हो
तो रोना छोड़ना होगा
निरंतर हँसना होगा
छोटी छोटी बातों को
भूलना होगा
रिश्तों को निभाना होगा
ग़मों को सहना होगा
मोहब्बत को जीने का
मकसद बनाना होगा
जीओ और जीने दो का
नारा लगाना होगा

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
11-11-05-01-2013
ज़िन्दगी
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

कहीं ऐसा ना हो


तुम्हारा ख़त मिला
उसमें लिखा
तुम्हारा पैगाम मिला
घर वाले हमारी नियत पर
शक करते हैं
इसलिए अब हमसे
बात नहीं कर पाओगी
घर में फजीहत नहीं
करवाओगी
कभी ये भी सोचा तुमने
घर वाले तो तुम पर भी
यकीन नहीं करते
गर यकीन होता
तो हमारी नियत पर
सवाल ही नहीं उठाते
मिलो ना मिलो हमसे
हम नहीं चाहते
तुम्हारा घर बिगड़े
हम तुम्हें चाहते रहेंगे
पाक रिश्ते को
दिल में बनाए रखेंगे
बस घबराते हैं
आज मैं हूँ
कल कोई और होगा
कब तक वफ़ा का
इम्तहान देते रहोगे
शक से देखे जाते रहोगे
डरता हूँ
कहीं ऐसा ना हो
थक कर तुम ही कोई
नया साथ ना ढूंढ लो
घर टूटने का इलज़ाम
तुम्हारे चाहने वालों
पर लग जाए
क़त्ल करे बिना ही
उन्हें कातिल करार
दे दिया जाए
10-10-04-01-2013
शक,रिश्ता,विश्वास,
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

फूलों से ही सीख लो


थोड़ी सी
सफलता मिल गयी
तुम बेकाबू हो गए
ढोल नगाड़े बजाने लगे
खुशी में नाचने लगे
सारी दुनिया को
बढ़ा चढ़ा कर बताने लगे
अपने को सबसे
बेहतर समझने लगे
कभी फूल को
खिलते समय शोर
मचाते देखा
नाचते गाते देखा
कुछ तो फूलों से ही
सीख लो
सफलता को
घमंड की सीमा तक
न जताओ
आगे बढ़ने के रास्ते
बंद मत करो
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
09-09-03-01-2013
सफलता,अहम्,घमंड,अहंकार
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

सोमवार, 4 मार्च 2013

हर इच्छा किसकी पूरी होती है



रोज़ चमकते चमकते
सूरज बेचारा थक गया
थक हार कर अपनी व्यथा
चाँद को बताने लगा
तुम कितने खुश किस्मत हो
पूनम को पूरे खिलते हो
बाकी समय
कम में काम चलाते हो
ना थकते हो
ना व्यथित होते हो
चाँद ने उत्तर दिया
मित्र क्यों ऐसा सोचते हो
हर इच्छा
किसकी पूरी होती है
मैं भी चाहता हूँ
सातों दिन पूर्णिमा हो
जैसे तुम हर दिन
चमकते हो
वैसे ही मैं भी हर दिन
चमकूँ
नित्य धरती को
चांदनी से भर दूं
08-08-03-01-2013
चाँद,सूरज,इच्छाएं,आशाएं ,कामना,आशा,
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर