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शनिवार, 2 मार्च 2013

बसा कर प्रियतम को ह्रदय में


बसा कर
प्रियतम को ह्रदय में
खोल दिए
प्रतीक्षा के द्वार मन में
पल पल
दिन महीनों और साल
बांधती रही आशाओं के बाँध
निद्रा खोयी चैन खोया
मिला नहीं फिर भी
प्रियतम का साथ
आँखों से अश्रूओं की धारा
अविरल बहती रही
मन रहा सदा उदास
चेहरे की
चमक विदा हो गयी
मन की आस पूरी ना हुयी
जीवन मरण हुआ सामान
निराशा ने जकड लिया
जीवन बन गया शमशान
04-05-02-01-2013
प्रेम,प्रियतम ,मोहब्बत,प्यार ,विरह
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

शुक्रवार, 1 मार्च 2013

किसी और से क्यों आशा करूँ



जब
भाग्य ने दिया इतना
जिसकी कभी
आशा भी ना थी
फिर भी आज खुश
क्यों नहीं हूँ
जो निर्णय
मैंने स्वयं किये थे
उन निर्णयों के लिए
किसी और को
क्यों जिम्मेदार कहूं
किसी से
सलाह मांगी होगी
उसकी सलाह भी
मानी होगी
ठीक नहीं निकली
तो उसकी गलती
कैसे मानूं
फिर जिस पथ पर
चल कर आज
यहाँ तक पहुंचा
उस पथ को कैसे दोष दूं
कुछ कमी
मुझ में ही रही होगी
जो आज खुश नहीं हूँ
अगर खुशी ढूंढनी है
तो मुझे ही बदलना होगा
किसी और से
क्यों आशा करूँ
04-04-02-01-2013
भाग्य,खुशी,संतुष्टि,संतुष्ट ,आशा,निराशा
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

आज कुछ लिखूं या ना लिखूं


सोच रहा हूँ
आज कुछ लिखूं
या ना लिखूं
कागज़ को रीता छोड़ दूं
कलम को विश्राम दे दूं
मन में प्रश्न कोंधने लगता है
क्या कागज़ को मेरा
व्यवहार अच्छा लगेगा
कलम को भाएगा
उन्हें तो मेरे मन से निकले
शब्दों को अँधेरे से निकाल कर
उजाला दिखाने की आदत
पड़ चुकी है
आज कुछ नहीं लिखूंगा तो
कागज़ कलम का मन
कैसे लगेगा
इतना स्वार्थी नहीं हूँ
जिन्होंने सदा साथ निभाया
उनकी भावनाओं का
ध्यान ही नहीं रखूँ
यही सोच कर आज फिर
लिखने बैठ गया हूँ
01-03-01-01-2013
भावनाएं ,स्वार्थी,स्वार्थ,
डा.राजेंद्र तेला ,निरंतर

गुरुवार, 28 फ़रवरी 2013

कठपुतली नहीं हूँ

 कठपुतली नहीं हूँ 
जैसे चाहो नचा लो मुझ को
मदारी भी नहीं हूँ 
जैसे चाहूँ नचा लूं किसी को 
साधारण इंसान हूँ 
नचाना चाहो तो प्यार से 
नचा लो मुझ को
गले मिल कर अपना 
बना लो मुझ को
मैं किसी को 
नचाना नहीं चाहूंगा
केवल अपना बना कर 
रखना चाहूंगा 
खुशी में साथ हंस लूंगा 
दुःख में साथ रो लूंगा
सच्चे दोस्त की तरह 
हर समय साथ निभाऊंगा
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
01-02-01-01-2013

प्यार .मोहब्बत ,कठपुतली


बुधवार, 27 फ़रवरी 2013

मैं कुंठित नहीं हूँ



मैं कुंठित नहीं हूँ
जो किसी से प्रशंसा की
आशा करूँ
किसी के आलोचना
करने पर क्रोध करूँ
किसी के पैमाने पर
खरा उतरने के लिए
सिद्धांतों से समझौता करूँ
मैं जैसा भी हूँ
वैसा ही हूँ
पर कुंठित हो कर
जीता नहीं हूँ
निरंतर लिखता रहता हूँ
खुश रहता हूँ
मन को संतुष्ट रखता हूँ
जो भी स्वीकार करे
उसे भी नमन
जो ना करे उसे भी
नमन करता हूँ
01-01-01-01-2013
कुंठित,संतुष्ट,संतुष्टि
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर  

कोई रात अंधेरी नहीं होती



कोई रात
अंधेरी नहीं होती
कोई दिन
उजला नहीं होता
केवल रोशनी की कमी
या अधिकता होती
मन संतुष्ट
ह्रदय प्रसन्न हो तो
काली रात उजली
उजले दिन में भी
अन्धेरा लगता
978-95-30-12-2012
मन,ह्रदय,संतुष्ट,संतुष्टि

मंगलवार, 26 फ़रवरी 2013

जब तक बदलेंगे नहीं पुरुष



 कुचली जायेंगी 
नौची जायेंगी 
जलाई जाती रहेंगी
नारियां 
मोमबत्तियां जलाई 
जायंगी
मोमबत्तियां बुझ 
भी जायेंगी
तस्वीर पर फूल
चढ़ाए जायेंगे 
फूल मुरझा भी जायेंगे
सैकड़ों सालों से
नहीं बदली है स्थिति 
सैकड़ों सालो तक
नहीं बदलेगी स्थिति 
जब तक बदलेंगे नहीं
पुरुष मानसिकता अपनी 
मानेंगे नहीं नारी को देवी
देखेंगे नहीं नारी में 
अपनी माँ,बहन,बेटी
977-94-30-12-2012
नारी,स्त्री,माँ,बहन बेटी ,औरत,

सोमवार, 25 फ़रवरी 2013

देश में अज़ब तमाशा हो गया है



देश में अज़ब तमाशा हो गया है
प्रजातंत्र का सत्यानाश हो गया है
देश नेताओं की भेंट चढ़ गया है
नेता का बेटा भी नेता हो गया है
रातों रात अमीरों को बाप हो गया
बिना पैंदे का नेता तो बना ही
बिना धंधे का धंधेबाज़ हो गया है
पढ़ा चाहे चार क्लास भी नहीं हो
पढने वालों से आगे निकल गया है
बेकार से अब काम का हो गया है
गरीब बेचारा गरीब ही रह गया है
पहले भी भूख से मरता रहा है
अब भी भूख से मर रहा है
देश में अज़ब तमाशा हो गया है
976-93-20-12-2012
देश,भ्रष्टाचार,नेता, प्रजातंत्र

निरंतर चलता रहा हूँ



निरंतर चलता रहा हूँ
जीवन से सीख कर
जीवन में उतारता रहा हूँ
कई मोड़ों पर ठिठका हूँ
कई मोड़ों पर झिझका हूँ
फिर भी रुका नहीं
पथ से भटका नहीं
रुकावटों से लड़ता रहा हूँ
विवेक को भूला नहीं
उसूलों को तोड़ा नहीं
लाभ हानि देखी नहीं
आँखें भीगी मगर
असफलता में कभी
रोया नहीं हूँ
अपनी शर्तों पर जीता
रहा हूँ
निरंतर चलता रहा हूँ
जब तक लिखा है
भाग्य में जीना
जब तक चलता रहूँगा
सच के लिए लड़ता रहूँगा
जो उमड़ता हैं मन में
निरंतर कहता रहूँगा
975-92-20-12-2012
निरंतर, जीवन

रविवार, 24 फ़रवरी 2013

तेरे बगैर



बोतल भरी शराब की
आँखों के सामने
मगर पीने का मन
नहीं करता
घर के बगीचे में
खूबसूरत फूल खिले
मगर देखने का मन
 नहीं करता
हमें हाँसिल हैं
हर तरह की खुशहालियाँ
मगर तेरे बगैर जीने का
मन नहीं करता
974-91-19-12-2012
शायरी ,तेरे बगैर, मोहब्बत

नित नए खेल दिखाती ज़िन्दगी



नित नए खेल
दिखाती ज़िन्दगी
कभी उठाती
कभी गिराती ज़िन्दगी
टुकड़ों टुकड़ों में
बांटती ज़िन्दगी
कभी रुलाती
कभी हंसाती ज़िन्दगी
किस की हुयी है
ज़िन्दगी
जो मेरी होगी
पता नहीं
कब साथ छोड़ देगी
ज़िन्दगी
973-90-19-12-2012
ज़िन्दगी