Register To Recieve Latest Poems On Your Email or Mobile

Enter your email address:

Click Here To Subscribe On Mobile Bookmark and Share

शनिवार, 23 फ़रवरी 2013

तुम्हारी तरफ हाथ बढाता हूँ



तुम्हारी तरफ  हाथ
बढाता हूँ
तुम्हारा अभिवादन
करता हूँ
तुम मेरा हाथ पकडती भी हो
मुस्कराकर मेरा अभिवादन
स्वीकार भी करती हो
फिर अचानक
मुंह फिरा लेती हो
बार बार यही  बात
दोहराई जाती है
या तो तुम सोचती हो
मैं तुम पर आसक्त हूँ
तुमसे प्रेम का इज़हार
करता हूँ
या तुम समझती हो मैं
केवल औपचारिकता
निभाता हूँ
मैं तो केवल मित्र भाव
दर्शा रहा था
बिना मंतव्य जाने
ऐसा सोचना भी अपराध है
मित्र को शक और स्वार्थ से
ऊपर रहना होता है
मैं तो केवल एक सच्चे
मित्र को ढूंढ रहा था
तुम में शक और बहम  से दूर
एक मित्र नज़र आया
इसलिए सम्बन्ध बढ़ा रहा था
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
972-89-19-12-2012
शक,बहम  

जिसने जैसे भी देखा ज़िन्दगी को



जब इंसान चाहता
ठहराव ज़िन्दगी में
ठहरती नहीं ज़िन्दगी
जब चलना चाहता
चलती नहीं ज़िन्दगी
किसी मन की इच्छा
मानती नहीं ज़िन्दगी
सदा अपने तरीके से
चलती ज़िन्दगी
जिसने जैसे भी देखा
ज़िन्दगी को
उसे वैसी ही लगी
ज़िन्दगी
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
971-88-19-12-2012
ज़िन्दगी

गुरुवार, 21 फ़रवरी 2013

कशमकश में



ज़िन्दगी भर
मंजिल की तलाश में
निरंतर
रुके बिना चलता रहा
पर इच्छाएं मुझसे भी
आगे चलती रही
मंजिल भी हर दिन
बदलती रही
न इच्छाएं रुकी
न मंजिल मिली
दोनों की कशमकश में
ज़िन्दगी ज़रूर
उलझ कर रह गयी
970-87-19-12-2012
ज़िन्दगी,कशमकश

बुधवार, 20 फ़रवरी 2013

ह्रदय हँसता भी है,ह्रदय रोता भी है



मुझे बगीचे में जाना
अच्छा भी लगता है
अच्छा नहीं भी लगता है
ह्रदय हँसता भी है
ह्रदय रोता भी है
कुछ फूल खिले हुए
कुछ मुरझाये मिलते हैं
मेरे आस पास के
लोगों के जीवन का
आभास होता है
कुछ के पास
आवश्यकता से अधिक
कुछ के पास
आवश्यकता से भी कम
भाग्य के
इस विचित्र न्याय की
याद दिलाता है

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
969-86-19-12-2012
भाग्य, जीवन

मंगलवार, 19 फ़रवरी 2013

जिसे कमज़ोर समझा



दिए को
सदा कम आंका था
जब अन्धेरा हुआ
बिजली ने धोखा दिया
दिया ही काम आया
जिससे आशा थी
वो नाकाम रहा
जिसे कमज़ोर
समझा था
वही काम आया
ताकतवर ही
सक्षम होता है
मेरे इस सोच को
ही बदल दिया
968-85-19-12-2012
कमज़ोर,ताकतवर,

झूलती ज़िन्दगी



अलगनी पर टंगे
छोटे मोटे नए पुराने कपडे
जैसी टंग गयी है ज़िन्दगी
समय की तेज़ हवाओं में
झूल रही है ज़िन्दगी
नए पुराने लोगों के बीच
अटक गयी है ज़िन्दगी
जो मुझे भुला चुके
उन्हें भुला नहीं
 पा रही है ज़िन्दगी
न ही नयों को ह्रदय से
अपना बना पा रही है
नए पुराने के झंझावत में
उलझ गयी है ज़िन्दगी
यादों के चक्रवात में
फंस गयी है ज़िन्दगी
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर ,अजमेर
967-84-19-12-2012
यादें ,ज़िन्दगी,

रविवार, 17 फ़रवरी 2013

कभी कभी जीवन में




कभी कभी जीवन में
ऐसे क्षण भी आते हैं 
जब अपने भी पराये
लगते हैं
रिश्ते नाते अविश्वास के
घेरे में घिर जाते हैं
आशाओं के आकाश
निराशा के बादलों से
ढक जाते हैं
भावनाओं के बाँध
टूट जाते हैं
केवल आसूं ही मनुष्य
का साथ निभाते हैं
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर ,अजमेर 
966-84-19-12-2012
रिश्ते नाते,अविश्वास,विश्वास, जीवन, आशा ,निराशा

सब कुछ समझ कर भी नासमझ बनता रहा



सब कुछ समझ कर भी
नासमझ बनता रहा
सच को झूठ
झूठ को सच कहता रहा
रिश्तों को निभाने के खातिर
दुश्मनों को दोस्त कहता रहा
काले चेहरों को
पहचान कर भी सफेद
कहता रहा
खुद को ही धोखा देता रहा
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
965-83-15-12-2012
रिश्ते,ज़िन्दगी ,दुश्मन,दोस्त,समझ,नासमझ,