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शनिवार, 16 फ़रवरी 2013

तुम मेरी तरफ झांकती भी हो



तुम मेरी तरफ
झांकती भी हो
मुझसे मिलना भी
चाहती हो
पर तुम्हारे मन का
दरवाज़ा
बहम के ताले में बंद है
दिल के दरीचों पर
शक की सलाखें लगी हैं
चाहते हुए भी
मिल नहीं पाती हो
अगर मेरी चाहत तुम्हें
तडपाती है
तो शक की सलाखों को
तोड़ना होगा
बहम के ताले को
खोलना होगा
नहीं तो ज़िन्दगी भर
घुट घुट कर जीना होगा
दरीचे =खिड़कियाँ
964-82-15-12-2012
बहम,शक,शायरी ,

शुक्रवार, 15 फ़रवरी 2013

अब थक गया हूँ



अब थक गया हूँ
इमानदारी सच्चाई,
इंसानियत ढूंढते ढूंढते
ह्रदय अतृप्त
मन व्यथित होने लगा
क्यों नहीं समझ पाता हूँ
दे दी लोगों ने जान
जिसको पाने के लिए
जो मिला नहीं
सदियों से किसी को
मुझे कैसे मिल जाएगा
खुद से पूछता हूँ
क्या तलाश बंद कर दूं
खुद ही उत्तर देता हूँ
लोग सपने भी तो देखते हैं
कुछ पूरे होते
कुछ अधूरे रह जाते
जीना तो नहीं छोड़ते
क्यों ना सपना समझ
तलाश जारी रखूँ
मिल जायेगी तो खुश
हो लूंगा
नहीं मिलेगी तो अधूरा
सपना समझ भूल जाऊंगा
हँसते हुए जीना नहीं
छोडूंगा
963-81-15-12-2012
इंसानियत,अतृप्त,सपना,तलाश,

गुरुवार, 14 फ़रवरी 2013

ये कैसा वक़्त हैं दोस्तों



ये कैसा वक़्त हैं दोस्तों
कुछ दोस्त रह गए
कुछ चले गए दोस्तों
काफिले बनते रहे
काफिले 
बिगड़ते गए दोस्तों
खुल कर 
हँस भी नहीं सके
कि रोने लगे दोस्तों
हम भी कब तक रहेंगे
पता नहीं दोस्तों
हमारे जाने के बाद
रोना नहीं दोस्तों
हँसते हुए हमारे जैसे ही
दोस्तों के काफिले
बनाते रहना दोस्तों
962-80-15-12-2012
दोस्त,काफिले,वक़्त,शायरी,

प्रश्नों में उलझने की जगह



वही नभ वही धरती
वही समुद्र वही प्रकृति
फिर रात काली
दिन उजला क्यों होता है
क्यों सूर्य दिन को
चाँद रात को चमकता है
प्रश्न तो इतने हैं
सोचो जितने कम हैं
फिर क्यों इंसान
खोज में लगा रहता है
हर प्रश्न का उत्तर ढूंढता है
जिज्ञासा में निरंतर
विचलित रहता  है
कितना अच्छा हो अगर
खोज की जगह
जो भी मिला उसे जीवन में
उसका सम्मान करे
प्रश्नों में उलझने की जगह
सोच को स्वच्छ करे
केवल मानव कल्याण
के लिए कार्य करे

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
961-79-15-12-2012
प्रश्न,जीवन,सोच,स्वच्छ

बुधवार, 13 फ़रवरी 2013

सर उठा कर जिया हूँ अब सर झुका कर कैसे जियूं ?



बहुत प्रयत्न किया
 समझ नहीं पाया
कैसे लोगों को खुश करूँ?
क्या उनकी हर बात 
पर
हाँ में हाँ मिला लूँ
झूठ को सच कहूँ ?
ज़माने के साथ चलूँ
मुखोटा पहन लूँ
उनकी खुशामद करूँ
झूठी प्रशंसा करूँ
पर यह तो 
हो नहीं सकता 
खुद के लिए कभी झूठ नहीं बोला
उनके लिए 
झूठ कैसे बोलूँ ?
पहले भी कई नाराज़ हो गए
कई और नाराज़ हो जायेंगे
अब तक सर उठा कर जिया हूँ
अब सर झुका कर कैसे जियूं ?
जो ना कर सका
जीवन में अब तक
बचे हुए दिनों के लिए 

कैसे करूँ ?
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
960-78-15-12-2012
जीवन,मुखोटा,प्रशंसा,खुशामद,सच,झूठ

मंगलवार, 12 फ़रवरी 2013

जो भी हँस कर मिलता मुझसे



जो भी हँस कर 
मिलता मुझसे
उस से ही मिल लेता हूँ
कुछ पल हँस लेता हूँ
सोचता नहीं हूँ
कब तक साथ हंसेगा
कब तक साथ निभाएगा
जिनसे थी आशाएं
खाई थी 
अनगिनत कसमें
जीवन भर साथ 
निभाने की
जिन्हें माना था 
जीवन ज्योती
वो ही जब
बिना बताये चले गए
पीछे घनघोर
अन्धेरा छोड़ गए
किसी और से 
क्या आशा करूँ
जो भी
दो पल हँस कर मिलता
अब उसे ही अपना
समझता हूँ
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
959-77-15-12-2012
मित्र,मित्रता,जीवन,साथी,

कोई जाति पूछता है ,कोई धर्म पूछता है

कोई जाति पूछता है
कोई धर्म पूछता है
कोई उम्र तो
कोई धंधा पूछता है
कोई नहीं पूछता
  ह्रदय कैसा है
ज्ञान कितना है
इमानदार हूँ
बेईमान हूँ
जैसा दिखता हूँ वैसा हूँ
या बाहर कुछ
अन्दर से कुछ और हूँ
मन को अच्छा लगेगा
जब कोई प्रश्न करेगा
निरंतर तुम इंसान हो
या इंसान के रूप में
हैवान हो
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
958-76-15-12-2012
जाती,धर्म,जीवन,इंसान ,हैवान

सोमवार, 11 फ़रवरी 2013

वास्तविकता की उड़ान



वास्तविकता की उड़ान में
भाव मेरे भी बहते हैं
घाव मेरे भी रिसते हैं
अब जब तुम बन गए हो
हमराज मेरे
दर्द अवश्य कम हो जायेंगे
एक दूजे को तराशेंगे
हँसते हुए जियंगे
मिल कर हम दोनों
गीत खुशी के गायेंगे
957-75-15-12-2012
हमराज़,जीवन,खुशी,वास्तविकता

रविवार, 10 फ़रवरी 2013

मैं तुमसे कुछ कहना चाहता हूँ



मैं तुमसे
कुछ कहना चाहता हूँ
पर कहते कहते 
रुक जाता हूँ
कहते हुए डरता हूँ
मन की इच्छाओं को
अपने भीतर समेट लेता हूँ
कैसे कहूँ के चक्रव्यूह में
उलझ जाता हूँ
या तो मुझे तुम पर
या मुझे खुद पर 
विश्वास नहीं
मैं तुम्हें,
तुम मुझे ठीक से
समझ नहीं पाए
तुम भी प्रयत्न करो
मैं भी प्रयत्न करूंगा
पहले रिश्तों को 
सुद्रढ़ बनाएं
शक को रिश्तों से 
दूर हटायें
फिर तुम मुझे
मैं तुम्हें मन की बात
कह पाऊंगा
ना डरूंगा 
ना घबराऊंगा
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
956-74-15-12-2012
जीवन,विश्वास,अविश्वास ,उलझन,रिश्ते