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शनिवार, 2 फ़रवरी 2013

भोर जब चेहरा दिखाने लगी



भोर जब
चेहरा दिखाने लगी
रात मुंह छुपाने लगी
मन ही मन सोचने लगी
अब उसे जाना होगा
सूरज के ताप से
बचना होगा
फिर लौटना 
है तो
सूरज अस्त ना हो
तब तक
धीरज और धैर्य
रखना होगा
हिम्मत होंसले से
काम लेना होगा
तब तक अविचल
शांती से बैठना होगा

© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
942-60-15-12-2012
हिम्मत,होंसला,धीरज,धैर्य,जीवन,भोर,अविचल

शुक्रवार, 1 फ़रवरी 2013

दुश्मनी बोली मुझसे एक दिन



दुश्मनी बोली
मुझसे एक दिन
क्यों रोज़
नए दोस्त बनाते हो
इतने दोस्तों को
दुश्मन बनते देख लिया
फिर भी नहीं घबराते हो
मैं बोला
तुम बिगाड़ने में
यकीन रखती हो
मैं बनाने में यकीन
रखता हूँ
स्वभाव से जिद्दी हूँ
उसूलों पर जीता हूँ
तेरे जैसे रोज़ चेहरा नहीं
बदलता हूँ
तूँ थक जायेगी
मगर मैं नहीं थकूंगा
मरते दम तक
दोस्त बनाता रहूँगा
उनके कंधे पर ही
आख़िरी सफ़र पर
जाऊंगा 


© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
 
941-59-15-12-2012
दुश्मनी,दोस्ती,ज़िन्दगी,जीवन ,उसूल

गुरुवार, 31 जनवरी 2013

जो डरते रहे वो रोते रहे



जो डरते रहे
वो रोते रहे
जो हँसते रहे
वो चलते रहे
जो समझ गए
लुबे लुबाब ज़िन्दगी का
वो उम्र भर खुश रहे
जो नहीं समझे
वो वक़्त से
पहले ही चले गए
940-58-15-12-2012
शायरी,लुबे लुबाब ज़िन्दगी

ज़िन्दगी जीने की जगह काटनी पड़ रही है



रिश्तों में गर्माहट
ख़त्म हो चुकी है
अब मिलने पर
खोखली हँसी बची है
अपनत्व की बली
चढ़ाई जा चुकी है
अहम् और स्वार्थ की
बन आ पडी है
दिलों में बर्फ जम चुकी है
रंग बिरंगी ज़िन्दगी
अब फीकी पड़ गयी है
ज़िन्दगी जीने की जगह
काटनी पड़ रही है
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
939-57-15-12-2012
ज़िन्दगी,जीवन,रिश्ते ,अहम्,स्वार्थ,अपनत्व

ज़िन्दगी मोहब्बत तो है,मगर मोहब्बत ही नहीं है

ज़िन्दगी मोहब्बत है
मगर सिर्फ 
मोहब्बत ही नहीं
ज़िन्दगी 
जज़्बातों का समंदर 
अहसासों की दुनिया भी है
हँसना हँसाना भी है
भाईचारा दया भी है
सांस लेना,पेट भरना भी है
खुद को ज़िंदा रखना
दूसरों के लिए जीना भी है
मोहब्बत में 
नाकाम हो भी जाओ 
तो भी दूसरों को
मोहब्बत देते रहो
जो भी तय किया 
खुदा ने तुम्हारे लिए
उसे ही उसकी इबादत 
मान कर 
कबूल करते रहो
हँसते मुस्काराते 
जीते रहो
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
938-56-15-12-2012
ज़िन्दगी,मोहब्बत

बुधवार, 30 जनवरी 2013

ठहराव की खोज में



ठहराव की खोज में
जीवन भर चलता रहा हूँ
ठहराव तो मिला नहीं
निरंतर उलझता रहा हूँ
जीवन की पहेलियों को
सुलझाते सुलझाते
थकने लगा हूँ
अब समझ आने लगा
जब मिला नहीं ठहराव
कभी किसी को
मुझे कैसे मिल जाएगा
लगता है जीवन भर
भ्रम में फंसता रहा हूँ
व्यर्थ में डरता रहा हूँ
मरीचिका की चाह में
पथ से भटकता रहा हूँ
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
937-55-15-12-2012
जीवन,मरीचिका ,स्थायित्व ,ठहराव

कभी कभी हैवान बन जाता हूँ



कभी कभी 
हैवान बन जाता हूँ
लोगों के तीरों का
जवाब
तीरों से दे देता हूँ
बेसब्री की गर्मी से
मन के गुलशन को
झुलसा देता हूँ
उनसे ज्यादा ज़ख्म
खुद को देता हूँ
जिन्हें नफरत से 
जीने कीआदत है
उनके जाल में फंस
जाता हूँ
कभी कभी 
हैवान बन जाता हूँ
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
936-54-15-12-2012
बेसब्री,नफरत,क्रोध,जीवन

मंगलवार, 29 जनवरी 2013

कली खिल जाए पौधे में तो फूल खिलना भी आवश्यक



कली खिल जाए पौधे में
तो फूल खिलना भी
आवश्यक
फूल खिल जाए पौधे में
तो महकना भी
आवश्यक
जन्म लिया इंसान ने
तो जीना भी आवश्यक
जी भी ले इंसान
तो इंसान बन कर
रहना भी आवश्यक
935-53-12-12-2012
इंसान,जीवन ,फूल,

सोमवार, 28 जनवरी 2013

बड़ा हूनर चाहिए



बड़ा हूनर चाहिए
दोस्त को दुश्मन
समझने में
हाथ में खंजर
चेहरे पर हँसी रखने में
मैं हूनर मंद नहीं हूँ
दोस्त को
दोस्त समझता हूँ
दोस्त के
रोने पर रोता हूँ
दोस्त के
हँसने पर हँसता हूँ
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर  
933-51-12-12-2012
शायरी,दोस्त,दुश्मन, हूनर

जब तुम्हारी याद सताती है



जब तुम्हारी
याद सताती है
ज़ज्बातों की नदी
उफन कर
बहने लगती है
मन के पहाड़ों की बर्फ
पिघलने लगती है
हसरतों के रेगिस्तान में
आंधी चलने लगती है
आँखें नम होने लगती हैं
ज़िन्दगी
बोझ लगने लगती है
932-50-12-12-2012
शायरी,याद,यादें,हसरत,ज़ज्बात

तरक्की ने नयी पीढी को बड़ी सीख दी है



तरक्की ने
नयी पीढी को
बड़ी सीख दी है
भौतिक सुख ही
जीवन की खुशी है
अहम् की तुष्टी
सर्वोपरी है
कोई बड़ा नहीं
कोई छोटा नहीं
मैं और मेरा ही
ज़रूरी है
जब मन आये
रिश्ते तोड़ लो
मतलब हो तो
रिश्ते बना लो
मगर निभाना
गैर ज़रूरी है
अधिक पाने की
इच्छा में
होड़ करना
तनाव में जीना भी
ज़रूरी है
मेरी बात समझ
आ जाए तो
अच्छी है
नहीं तो समय की
बर्बादी है
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
930-48-12-12-2012
तरक्की,नयी पीढी ,सीख , होड़ , तनाव

रविवार, 27 जनवरी 2013

कौन है जो नहीं जानता



कौन है
जो नहीं जानता
खुद कितना इमानदार
कितना बेईमान है
फिर भी
दूसरों पर ऊंगली उठाता है
भूल जाता है
कब तक सच छुपायेगा
चेहरे पर चेहरा लगाएगा
कोई तो होगा 
जो उसकी 
फितरत को जानता है
कभी उका भी सच
बाहर आ जाएगा
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
929-47-12-12-2012
सच,झूठ,इमानदार,दोगलापन