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शनिवार, 26 जनवरी 2013

कौन मरना चाहता है?



कौन मरना चाहता है?
मौत फिर भी आती है
कौन असफलता चाहता है ?
फिर भी हर बार
सफलता नहीं मिलती
 मर्म जीवन का
जिसने जान लिया
उसका जीवन सरल
हो जाता है
जो नहीं जान सका
वो जीवन भर बेचैन
रहता है
928-46-12-12-2012
जीवन ,जीवन मर्म,सफलता,असफलता

जब आस ख़त्म हो जाती



जब आस
ख़त्म हो जाती
दिल टूट जाता है
मन दुखी रहता है
आसूं सूख जाते हैं
ज़िन्दगी दोजख
लगती है
जीना मौत से भी
दुश्वार लगता है
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर  
927-45-12-12-2012
शायरी,आस,दुश्वार

शुक्रवार, 25 जनवरी 2013

हम तारीफ़ करते रहे,वो सर पर चढाते रहे

हम तारीफ़ करते रहे
वो सिर पर चढाते रहे
खुद को तारीफ़ का
हक़दार समझने लगे
जुबान में तल्खी
अंदाज में गरूर आ गया
जब समझाने के खातिर
आइना दिखाया
उन्हें रास नहीं आया
हमें दुश्मन करार दे दिया
क्यों नहीं समझते ?
हमने तो
बेहतर करने के लिए
सिर्फ उनका होंसला

बढाया था
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
926-44-12-12-2012
शायरी,गरूर,

क्यों किसी से मन की बात कहूँ?



क्यों  किसी से
मन की बात कहूँ?
क्या पता उसकी 
व्यथा मेरे ही हो
क्यों किसी की
दुखती रग छेड़ूँ
 व्यथा तो कम
होगी नहीं
किसी की व्यथा
क्यों बढाऊं?
दर्द को समझने वाले
चेहरे को देख कर ही
मनोस्थिति समझ जायेंगे
स्वयं आकर पूछ लेंगे
निदान तो नहीं 
कर पायेंगे
दिलासा से 
मन का बोझ अवश्य 
कम कर देंगे
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
925-43-12-12-2012
मनोस्थिति, दर्द, व्यथा, दुखती रग

व्यथा में



व्यथा में रोते रोते
अचानक ख्याल आया
रोने से किसी को नहीं मिला
तो मुझे कैसे मिलेगा
मन की व्यथा कम करनी है
तो क्यों ना
किसी अपने से बात कर लूं
जो मन को पसंद हो
वो काम कर लूं
अच्छा संगीत सुन लूं
अच्छी किताब पढ़ लूं
मन को हल्का कर लूं
अपने को व्यवस्थित कर लूं
फिर से काम में जुट जाऊं
फिर कभी व्यथित ना होऊँ
ऐसा सोच रख लूं
924-42-08-12-2012
व्यथा ,व्यथित,रोना ,जीवन

गुरुवार, 24 जनवरी 2013

मुझे हक नहीं



मुझे हक नहीं
तुम पर नाराज़ होने का
ना हक तुम्हारी बेरुखी पर
सवाल पूछने का
उम्मीदों पर जब नहीं
उतर सका खरा
नहीं दे सका जो 
मुझसे चाहा तुमने 
निभा ना सका उन वादों को
जो किये तुमसे
मुझे हक नहीं तन्हाई में भी
आसूं बहाने का
जब तुम्हारी हसरतों के
लायक ही ना था
मुझे हक नहीं तुम पर
इलज़ाम लगाने का
गुनाहगार भी मैं हूँ
सज़ा का हक़दार भी मैं  हूँ
जिसने दिल लगाया था
इक पत्थर दिल से
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
923-41-08-12-2012
दिल,हक, हसरत,हसरतें,मोहब्बत, शायरी,

पीढी अंतराल



जब मेरे दादाजी ने
कुछ कहा
मैं बोला दादाजी
ज़माना बदल गया है
आप जो कहते हो
अब वैसा नहीं होता है
जब मेरे बेटे ने मुझसे
यही कहा
मैं नाराज़ हो गया
तुम मुझसे
ज्यादा समझते हो ?
कह कर कमरे से
निकल गया
पीढी अंतराल को साफ़
नकार गया
922-40-08-12-2012
पीढी अंतराल

बुधवार, 23 जनवरी 2013

तुमने कहा मुझे नहीं भाया



तुमने कहा
मुझे नहीं भाया
मैं नासमझ
तुम समझदार हुए
मैंने कहा
तुम्हें नहीं भाया
मैं समझदार
तुम नासमझ हुए
अहम् टकराता रहा
रिश्ता बन नहीं सका 
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 

921-39-08-12-2012
नासमझ,समझदार,अहम्

मंगलवार, 22 जनवरी 2013

जब दिल टूट जाता हैं



जब दिल टूट जाता हैं
शहर अजनबी लगता
रास्ते अजनबी लगते
लोग अजनबी लगते
सिर्फ बेवफाई के
अफ़साने याद रहते
क्यूं मोहब्बत का
ज़हर पीया था
ख्याल तंग करते हैं
तन्हाई साथ निभाती
हर चेहरे पर उम्मीद की
रोशनी नज़र आती
कोई तो कह दे
वो भूले नहीं हैं
अब भी याद करते हैं
लौटने की
ख्वाहिश रखते हैं
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
920-38-08-12-2012
अफ़साने,तन्हाई,दिल,मोहब्बत, याद

जो रोज़ सताते रहे



जो रोज़ सताते रहे
इंतज़ार कराते रहे
वो तो रोज़ की तरह
आज भी नहीं आये
जो भी आये
अपना समझ कर
मिले मुझ से
जो गरूर में चूर थे
उन्होंने तो भुला दिया
अपनाचेहरा ही
बदल दिया
बस अब खुदा से दुआ
इतनी सी
भले ही रोज़ आयें नहीं
पर कम से कम
सताएं तो नहीं
नहीं आना हो तो
पहले से बता दें
919-37-08-12-2012
इंतज़ार, सताना


खाली हाथ आये थे खाली हाथ चले जायेंगे



जब तक चल सकते हैं
चलते रहेंगे
हँसते रहेंगे ,गाते रहेंगे
नए दोस्त बनाते रहेंगे
धोखा खाते रहेंगे
दर्द-ऐ-दिल सहते रहेंगे
ग़मों का
बोझ उठाते रहेंगे
कदम रुक जायेंगे
हम भी रुक जायेंगे
ज़मीं का ज़मीं पर 
छोड़ जायेंगे
खाली हाथ आये थे
खाली हाथ चले जायेंगे
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
918-36-08-12-2012
दर्द-ऐ-दिल, ज़िन्दगी ,दोस्त

जहन में बार बार सवाल उठता है



जहन में बार बार
सवाल उठता है
उनकी नाराजगी को
याद करता रहूँ
मन में दुखी होता रहूँ
निरंतर
ज़ख्म खाता रहूँ
या हादसा समझकर
भूल जाऊं ?
तय नहीं कर पाता हूँ
उन्हें दिल से चाहा है
वो नाराज़ रहे तो भी
भूल कैसे सकता हूँ
917-35-08-12-2012
याद ,मन में दुखी ,नाराजगी

सोमवार, 21 जनवरी 2013

खामोशी से कभी दोस्ती मत करना



खामोशी से कभी
दोस्ती मत करना
खामोशी से
बच कर रहना
आहिस्ता आहिस्ता
दिल-ओ-दिमाग पर
कब्जा करती है
खामोशी से
खामोश कर देती है
कुछ करना ना करना
मगर खामोशी से
दूर रहना
916-34-08-12-2012
खामोशी

मैं मुख्तलिफ हूँ



मैं मुख्तलिफ हूँ
मुख्तलिफ लिखता हूँ
सच को सच
झूठ को झूठ कहता हूँ
दोगले चेहरों को
कलम के ज़रिये
बेनकाब करता हूँ
रोज़ नए दुश्मन बनाता हूँ
गालियाँ खाता हूँ
ज़माने का कहर बर्दाश्त
करता हूँ
फिर भी फितरत नहीं
बदलता हूँ
क्यों की मैं मुख्तलिफ हूँ
मुख्तलिफ ही रहना
चाहता हूँ
मुख्तलिफ=प्रथक,भिन्न,अलग तरह का
915-33-08-12-2012
दोगले,सच,झूठ,चेहरे पर चेहरा,मुख्तलिफ

रविवार, 20 जनवरी 2013

कभी मन से भी तो पूछ लो



कभी मन से भी तो
पूछ लो
क्या इतनी तंगदिली
अच्छी
कभी दिल से भी पूछ लो
क्या हमसे
इतनी नफरत अच्छी
गर कह दे दिल तुम्हारा
यूँ ही
नफ़रत करते रहो हमसे
तो खामोश मत रहना
साफ़ साफ़ कह देना
हम समझ जायेंगे
गर दिल ना माना बात
तुम्हारी
तो दिल से वादा करना
मुस्काराते चेहरे से
हमें माफ़ कर दोगे
चेहरे की
हँसी फिर लौटा दोगे
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर  
914-32-08-12-2012
नफरत,तंगदिली,प्यार

उन्हें शक था



कुछ कहना चाहता था
कुछ सुनना चाहता था
मन से मन मिलाना
चाहता था
कुछ लम्हों के लिए
सुकून पाना चाहता था
नहीं थी किस्मत में
मेहरबानियाँ उनकी
बात करना तो दूर
हमारी तरफ
झांका तक नहीं
उन्हें शक था
उनसे दिल लगाना
चाहता
913-31-08-12-2012
शक