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शनिवार, 19 जनवरी 2013

ज़ज्ब हो चुका हूँ तुम्हारे ज़हन में



मुझे पता है
मेरे नाम तक से
तौबा करते हो
पर जब भी 
मेरा नाम आता है
चाहे नफरत से ही सही
बड़े ध्यान से सुनते हो
कितना भी दिल से निकालो
चाहे दुश्मन समझो मुझको
इतना ज़ज्ब हो चुका हूँ
तुम्हारे ज़हन में
तुम चाहकर भी मुझे
भुला नहीं पाओगी
तुम्हारी बेवफाई
तुम्हें हमेशा सताती रहेगी
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
912-30-08-12-2012
नफरत,बेवफाई,शायरी

जब चुपके से बुढापा आया


जब चुपके से बुढापा आया
बढ़ती उम्र से घबरा गया
मन की व्यथा छुपा ना सका
एक दिन उम्र से ही पूछ लिया
क्यों इतनी तेज़ी से बढ़ती हो
तारीख बदलती है
ज़िन्दगी एक दिन कम
हो जाती है
तुम एक दिन बढ़ जाती हो
थोड़ा सा धीरे नहीं चल
सकती हो
जितना एक दिन में बढ़ती हो
उतना पांच सात दिन में
नहीं बढ़ सकती हो ?
उम्र मुस्काराते हुए बोली
जीवन भर आवश्यकता से
अधिक तेज़ चलते रहे
धन कमाने की होड़ में
सेहत को भूलते रहे
अब जब संसार से
विदा होने की बेला
समीप आने लगी
तो डरने लगे हो
तुम तो मौक़ा खो चुके
फिर भी सेहत का जितना
ध्यान रख सकते हो रख लो
मगर अपने छोटों को तो
अच्छी सेहत के लाभ
समझा दो 
जो भूल तुमने करी
उन्हें तो उससे बचा लो
तुम्हारी उम्र बढे ना बढे
उनकी तो बढ़ा दो
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर  
933-52-12-12-2012
बुढापा,सेहत,स्वास्थ्य,उम्र,

अभी तुम्हें बहुत कुछ देखना बाकी है



हमें अपने दिल से
मत निकालो
अभी तुम्हें बहुत कुछ
देखना बाकी है
मिट्टी की दीवार
समझ कर
गिराने की कोशिश
ना करो
हम में सच की सुगंध
बसी है
चमकदार चेहरों पर
मत जाओ
अभी तुम्हें उनके पीछे
नफरत भरे दिलों को
देखना बाकी है
मीठी बातों के जाल में
मत फंसो
अभी तुम्हें लोगों की
हकीकत से
रूबरू होना बाकी है
आइना दिखाने वालों से
नफरत ना करो
अभी तुम्हें चेहरे पर चेहरा
चढ़ाए लोगों से
मिलना बाकी है
911-29-08-12-2012
मीठी बातें,नफरत,इर्ष्या,द्वेष,दिल ,दोगलापन, सच

शुक्रवार, 18 जनवरी 2013

जो देख रहे हैं



जो देख रहे हैं
वह सत्य है या असत्य
यह तो पता नहीं
देखने दिखाने वालों के
मंतव्य का भी पता नहीं
किस का कैसा सोच
अच्छा या बुरा
यह भी पता नहीं
किसका ईमान से
किस का
स्वार्थ से भरा हुआ
यह भी पता नहीं
क्यों मन को
व्यथित करते हो
दूसरे जैसे भी देखते
दिखाते हैं
उन्हें वैसे ही देखने
दिखाने दो
पर खुद तो
इमानदारी से देख लो
जो जैसा भी दिखता है
उसे वैसा मत समझ लो
विवेक और बुद्धि से
काम लो
भेड की खाल में छुपे
भेडियों को पहचान लो
905-23-07-12-2012
देखना,सत्य,असत्य,मंतव्य

उसके सोच से सोचना



वो निरंतर
कहती थी मुझसे
तुम भी वैसे ही सोचो
जैसे मैं सोचती हूँ
दुनिया की बुराइयों के
रंग ही मत देखा करो
प्यार स्नेह के रंगों को भी
देखा करो
बार बार की मनुहार से
थक हार कर
वैसे ही सोचने लगा
जैसा वो चाहती थी
सोच बदलने लगा
सुखद आभास होने लगा
मुझ पर भी प्यार का रंग
चढ़ने लगा
भावों में बह कर एक दिन
उसका हाथ मांग लिया
अपने प्यार का इज़हार
कर दिया
उसके सोच से सोचना
जीने का तरीका बन गया
904-22-07-12-2012
सोच,भाव,प्रेम,

गुरुवार, 17 जनवरी 2013

यादें मानती ही नहीं



मेरी पसंदीदा किताबें
अलमारी में बंद हैं
यादें दिल की
अलमारी में ज़ज्ब हैं
मन करता है
तब अलमारी खोल कर
पसंद की किताब के
कुछ प्रश्ठ पढ़ लेता हूँ
किताब को वापस
अलमारी में रख देता हूँ
मन की अलमारी से
यादें निकालने की
ज़रुरत ही नहीं पड़ती
हर दिन बिना निकाले भी
दिल से बाहर निकल
पड़ती हैं
मुझे हैरान नहीं करे
इसलिए उन्हें दिल की
अलमारी में बंद करने की
कोशिश में लगा रहता हूँ
पर यादें
मानती ही नहीं
बार बार लौट आती हैं
जितना उनसे
दूर होना चाहता हूँ
उतना ही वो
मुझे हैरान करती हैं
903-21-07-12-2012
यादें 

बुधवार, 16 जनवरी 2013

कभी जब लिखने बैठता हूँ



कभी जब लिखने
बैठता हूँ
शब्द खो जाते हैं
कलम रुक जाती है
कागज़ रीता रह जाता है
मन से पूछता हूँ
ऐसा क्यों होता है
बुझे चेहरे से मन
कहता है
जब मैं व्यथित होता हूँ
ऐसा होता है
पर स्वयं में विश्वास
रखोगे
तो कल ऐसा नहीं होगा
खोये शब्द मिल जायेंगे
कलम चलने लगेगी
कागज़ भी
रीता नहीं रहेगा
निश्चित ही
एक अच्छी रचना का
जन्म होगा
पढ़ कर तुम्हें भी आनंद
मिलेगा
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
902-20-05-12-2012
जीवन,व्यथित,व्यथा

जिसने भी स्नेह से गले लगाया



जिसने भी
स्नेह से गले लगाया
मुझे जीवन दर्शन
समझाया
विपत्ति में साथ निभाया
समय से लड़ना सिखाया
हर पल अपने साथ पाया
साथ रोया साथ हंसा
उसे ही
माँ का रूप समझा मैंने
उसे ही नमन किया मैंने
901-19-05-12-2012
माँ,स्नेह

मंगलवार, 15 जनवरी 2013

उम्मीद को क्यूं नाराज़ करूँ



ज़िन्दगी भर
वादों पर यकीन किया
कभी पूरे नहीं हुए 
तो भी वादों को 
क्यों बदनाम करूँ 
अब भी पूरे नहीं होंगे
पर उम्मीद को
क्यूं नाराज़ करूँ


© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

900-18-05-12-2012
शायरी ,वादे,उम्मीद

हँसते हँसते मारा था तीर मोहब्बत का



हँसते हँसते मारा था
तीर मोहब्बत का
सीधा निशाने पर लगा
हमारा तो दिल छिद गया
उनका शौक़ पूरा हुआ
जो खाता था
कसम साथ निभाने की
वही कातिल साबित हुआ
हमें भी क्या पता था
हँसते चेहरे के पीछे
शैतान छुपा हुआ था
899-17-05-12-2012
मोहब्बत ,प्यार,शौक़,दिल, शायरी

सोमवार, 14 जनवरी 2013

कहना तो बहुत कुछ चाहता हूँ



कहना तो
बहुत कुछ चाहता हूँ
मगर किस से कहूं
समझ नहीं पाता हूँ
कौन सही 
कौन गलत समझेगा
क्या अर्थ निकालेगा
तय नहीं कर पाता हूँ
कहते कहते रुक जाता हूँ
विश्वास के अकाल में
खो जाता हूँ
अपनों से भी कहूँ या न कहूँ
डरने लगता हूँ
प्रश्नों के घेरे में उलझ जाता हूँ
कोई सुनना ही नहीं चाहता 
कह कर दोष 
दूसरों के सिर मढ़ देता हूँ
बिना कहे ही
मुस्काराता रहता हूँ
चेहरे पर चेहरा लगा कर
कुंठित जीता हूँ
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
898-16-05-12-2012
जीवन,दोष मढना,विश्वास,अविश्वास,कहना, कुंठित

भूत भविष्य के सोच में



बचपन में
बचपन को कोसता था
स्कूल जाना
परीक्षा देना अच्छा नहीं
लगता था
केवल खाना खेलना
भाता था
जवानी में काम करना
जिम्मेदारियां निभाना
दुरूह लगता था
बचपन याद आता था
अब बुढापे में अलमस्त
जवानी याद आती है
बुढापा काटना को
दौड़ता है
क्यों ऐसा होता है
इंसान अपने वर्तमान से
खुश नहीं रहता
भूत भविष्य के सोच में
डूबा रहता है
898-16-05-12-2012
बचपन,जवानी,बुढापा,जीवन,वर्तमान,भूत,भविष्य

रविवार, 13 जनवरी 2013

हमने सर पर चढ़ाया तुमको



हमने सर पर चढ़ाया
तुमको
गिरते से उठाया तुमको
तुम समझने लगे
तुम काबिल
हम नाकाबिल हो गए
खुद को हम से भी ऊपर
समझने लगे
गरूर इतना छा गया
ज़हन में
खुद को खुदा समझने लगे
भूल गए
जब भी उतरोगे ज़मीन
पर कभी
सहारे के लिए कंधा तो दूर
कोई झांकेगा भी नही
897-15-05-12-2012
काबिल,नाकाबिल,घमंड,गरूर

हो सके तो मुझे माफ़ कर देना



हो सके तो
मुझे माफ़ कर देना
माफ़ ना कर सको तो
बद्दुआ  मत देना
बद्दुआ भी दो तो
मेरा नाम मत भूलना
नाम भी भूल जाओ तो
जो कहता हूँ
उसे याद रखना
दुश्मन को
दोस्त बना लाना
कभी दोस्त को
दुश्मन मत बनाना
मुझ से तो
नफरत कर ली तुमने
किसी और से
नफरत मत करना

© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
896-14-05-12-2012
दोस्त,दुश्मन,दोस्ती,माफी, नफरत