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शनिवार, 12 जनवरी 2013

मेरी कवितायें तुम्हारी छाया भर हैं



मेरी कवितायें
तुम्हारी छाया भर हैं
उसके शब्द तुम्हारी
भाव भंगिमाओं के विम्ब 
उसके वाक्य तुम्हारी सुन्दरता
उनका भावार्थ
मेरे तुम्हारे प्रेम का प्रतीक 
मेरी कवितायें कवितायें नहीं
तुम हो
ये तब तक समाप्त नहीं होंगी
जब तक
तुम्हारे शरीर में प्राण हैं
जब तक तुम्हारी सांस चलेगी
मेरी कविता में
नयी पंक्तियाँ जुडती रहेंगी
जिस दिन उसमें इश्वर
व्यवधान उत्पन्न करेगा
कविता समाप्त हो जायेगी
इसके आगे पीछे घूम रहा
मेरा जीवन भी समाप्त हो जाएगा
मेरी कविता मेरे तुम्हारे
संबंधों के बीच की कड़ी है
जिस दिन भी 
ये कड़ी टूट जायेगी
कविता
अमर प्रेम कहानी में
बदल जायेगी


© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
 
895-13-05-12-2012
प्रेम,प्यार, कविता

जब कोई मेरा अपना व्यथित हो तो




लोग पूछते हैं
आप व्यथित क्यों रहते हो
 गंभीर चेहरा लिए दिखते हो
जवाब में जब कहता हूँ
जब कोई अपना व्यथित हो तो
मैं कैसे खुश रह सकता हूँ
सुनने को मिलता है
आपके परिवार वाले तो
सब खुश दिखते हैं
फिर आप ऐसा क्यों कहते हैं
कैसे समझाऊँ 
केवल परिवार वाले
अपने नहीं होते
जो भी प्रेम रखते हैं
जिनसे भी मन मिलता है
वो भी तो अपने ही हैं
उनमें से एक भी अगर
व्यथित है
तो फिर मैं कैसे खुश
रह सकता हूँ
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 

892-11-03-12-2012
रिश्ता,अपनापन,व्यथित,व्यथा,अपने,पराये, खुशी

शुक्रवार, 11 जनवरी 2013

एकांत



फूलों की सुगंध
पक्षियों की चचहाहट
कल कल करते
झरनों की ध्वनि
गर्मी की दोपहर में
शीतल वायु का स्पर्श
किस को अच्छा नहीं
लगता
पर मन व्यथित हो
तो कुछ नहीं भाता 
केवल एकांत भाता
अकेलापन साथ निभाता


डा.राजेंद्र तेला,निरन्तर
891-10-03-12-2012
एकांत, अकेलापन,मन

गुरुवार, 10 जनवरी 2013

लोग सुंदरता की बात करते हैं



लोग सुंदरता की
बात करते हैं
सुन्दर चेहरों
मीठी बातों पर
आसक्त होते हैं
उनकी पसंद पर
ना कोई उलझन
ना ऐतराज़ मुझे
मैं सुन्दर चेहरे
मीठी बातों से अधिक
दयालु ह्रदय,
निश्छल मन का 
उपासक हूँ
उन्हें ही सुन्दरता का
पैमाना मानता हूँ
कोई कुछ भी कहे
मुझे आडम्बर रहित
परमात्मा की
बतायी हुई राह पर
चलने वाले लोग
पसंद आते रहे हैं
आते रहेंगे
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
890-09-03-12-2012
सुन्दरता

बुधवार, 9 जनवरी 2013

ज़िन्दगी के सफ़र में गिरते सभी हैं



ज़िन्दगी के सफ़र में
गिरते सभी हैं
ज़ख्म खाते भी सभी हैं
दर्द से करहाते भी सभी हैं
मुस्कराककर उठते वहीं हैं
जो मंजिल
तक पहुंचना चाहते
ज़ज्बा नहीं खोते
जो रोते रह जाते
वो रास्ते से भटक जाते हैं
मंजिल का पता ही
भूल जाते हैं
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
889-08-03-12-2012
ज़िन्दगी,सफ़र,मंजिल ,ज़ज्बा

मंगलवार, 8 जनवरी 2013

उदास मन को चाहिए



उदास
मन को चाहिए
एक प्यार भरा दिल
मुस्काराता चेहरा
जो कंधे पर
हाथ रख कर कह दे
मैं तुम्हारे साथ हूँ
हिम्मत और धीरज
से काम लो
खुद में विश्वास रखो
सब ठीक हो जाएगा
इश्वर के यहाँ देर है
मगर अंधेर नहीं
देर से ही सही
एक दिन तुम्हें चैन
अवश्य मिल जाएगा
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
888-07-02-12-2012
मन,उदास,स्नेह,विश्वास,जीवन, चैन,इश्वर

नया दोस्त बना कर क्या करूँ



खुद के वजूद का
पता नहीं
नया दोस्त बना कर
क्या करूँ
ये मुझे गवारा नहीं
दोस्त बनाते ही
दुनिया से उठ जाऊं
दोस्त का दिल तोड़ दूं
उसे आसूं बहाने पर
मजबूर कर दूं
वो मुझे दगाबाज़
समझेगा
नए दोस्त बनाने से
डरेगा
नहीं चाहता दोस्ती के
नाम से ही उसका
आइतबार उठा दूँ
खुद के वजूद का
पता नहीं
नया दोस्त बना कर
क्या करूँ
887-06-02-12-2012
ज़िन्दगी,दोस्त,शायरी, दोस्ती

रविवार, 6 जनवरी 2013

सन्नाटों का शोर



शोर ही शोर
हर तरफ शोर ही शोर
दिखावे का शोर
स्वार्थ का शोर
पर मन में सन्नाटा
ज़िन्दगी इस हद तक
उलझ गयी शोर में
रह गया केवल
सन्नाटों का शोर
बस गया दिलों में
बस गया रिश्तों में
प्यार
भटक गया अहम् में
रह गया बस
चेहरे पर चेहरा चढ़ाना
झूठी मुस्कान
चिपकाए घूमना 
ज़िन्दगी जीना नहीं
ज़िन्दगी काटना
बन गया सबब
जीने का
886-05-02-12-2012
जीवन,ज़िन्दगी,शोर,सन्नाटा

आइना देखते देखते



आइना देखते देखते
बचपन पीछे छूट गया
चेहरा झुर्रियों से भर गया
समय की थकान बताने लगा
आइना न बदला
 सदा मुस्काराता रहा
कहता रहा
लाख बन संवर लो
समय की मार से
कोई नहीं बच सका
तुम कितने दिन बचोगे
एक दिन तुम भी
आइना देखना छोड़ दोगे
डा.राजेंद्र तेला,निरन्तर
885-04-02-12-2012
जीवन.आइना,मृत्यु

जीवन, मृत्यु



रक्त की धमनियों सी
मेरे मन की धमनियां भी
काले सफ़ेद विचारों को
अविरल मस्तिष्क में
गतिमान रखती हैं
जिस दिन सांस रुक जायेगी
ह्रदय की धड़कन बंद हो जायेगी
मन की धमनियां भी
शिथिल पड़ जायेंगी
विचारों की गति थम जायेगी
विचार भी टूटे हुए तारे से
काल के गाल में गुम हो जायेंगे
बची रह जायेंगी तो बस
कुछ अस्थियाँ और राख का ढेर
जीवन मिथ्या
मृत्यु सत्य बन जायेगी


डा.राजेंद्र तेला,निरन्तर
884-03-01-12-2012
जीवन, मृत्यु

कुछ कहना चाहता हूँ तो जुबां चुप हो जाती है



विचारों के बाँध का
तटबंध तोड़ना चाहता हूँ
मन की कुंठा
निकालना चाहता हूँ
कुछ कहना  चाहता हूँ
तो जुबां चुप हो जाती है
लिखना चाहता हूँ
तो कलम रुक जाती है
क्या कहूं क्या ना कहूं के 
चक्रवात में फंस जाती है
कुंठा कुंडली मार कर
मन में बैठ जाती है
ज़िन्दगी उलझ कर
रह जाती है
883-01-02-12-2012
मन ,कुंठा, ज़िन्दगी