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गुरुवार, 7 नवंबर 2013

ना जाने फूलों को क्या हो गया है


ना जाने फूलों को
क्या हो गया है
शाख से जुड़ा रहना भी
उन्हें बुरा लगने लगा है
जिनके इंतज़ार में
बिताए थे दिन बेचैनी में
अब वो अंदाज़ फूलों को
खारा लगने लगा है
कली से फूल बनने तक
समझा था
दिल का टुकड़ा जन्हें
सींचा था
जिनके ज़िस्म को
अपने खून से
वो प्यार फूलों को अब
खुदगर्जी लगने लगा है
ना जाने फूलों को
क्या हो गया है  
  डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
08-345-07-11-2013

औलाद,संतान ,जीवन,शायरी  

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