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बुधवार, 30 अक्तूबर 2013

अपनों को पराया बनते देखा है


अपनों को
पराया बनते देखा है
परायों को भी
अपना बनते देखा है
पर कभी 
समझ नहीं पाया
जितना शीघ्रता से 
अपने पराये हो जाते 
क्यों पराये 
अपने नहीं हो पाते
नए रिश्ते
 बनाने से पहले
डरते सहमते हैं
हो सकता है 
दूध के जले हों
छाछ को भी 
फूंक कर पीते हैं
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
31-338-30-10-2013
रिश्ता ,रिश्ते,सम्बन्ध,जीवन,जीवन मन्त्र

2 टिप्‍पणियां:

  1. कल 01/11/2013 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
    धन्यवाद!

    उत्तर देंहटाएं
  2. यूँ ही तो नहीं कहते हैं ....अपने तो अपने होते हैं

    उत्तर देंहटाएं