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बुधवार, 30 अक्तूबर 2013

कल तक मिलते थे


कल तक मिलते थे
साथ हँसते थे
साथ रोते थे
हर लम्हे का
हिसाब लेते देते थे
आज पहचानते भी नहीं
समझ नहीं पाता
समझना भी नहीं चाहता
क्यों और कैसे
ऐसा करते हैं लोग
मैं ऐसा ही रहना चाहता
रिश्तों को खेल नहीं
समझा कभी
ना ही समझूंगा कभी
उनके जैसा मज़बूत
दिल नहीं है मेरा
रिश्तों को
आसानी से तोड़ दूं
और दिल रोये भी नहीं
मैं कमज़ोर ही रहना
चाहता
रिश्तों को भरपूर जिया है
आगे भी जीना चाहता हूँ   
30-337-30-10-2013
रिश्ता ,रिश्ते,सम्बन्ध,जीवन,जीवन मन्त्र

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

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