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सोमवार, 2 सितंबर 2013

वृद्धावस्था पर कविता -जीवन पश्चिम की ओर अग्रसर हो चला है

बचपन की निश्चिंतता
जवानी की उदिग्नता
यादों को समर्पित कर
जीवन पश्चिम की ओर
अग्रसर हो चला
दिन छोटा
रात लम्बी होने लगी
चेहरे का तेज़ स्वप्नों का
भ्रमण धीमा पड़ गया
जीवन का क्षितिज
स्पष्ट दिखने लगा
आत्म चिंतन
कर्मों के प्रायश्चित 
करने का साधन बन गया
एकाकीपन भाने लगा
अस्त होने की प्रतीक्षा में
समय प्रभु स्मरण
मानव सेवा में
बीतने लगा 


© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
 
4-248-02-09-2013
जीवन,बुढापा ,वृद्धावस्था, बुढापे पर कविता

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर   

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