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शुक्रवार, 6 सितंबर 2013

सपनों को पकड़ने की चाह में

आकाश की
हर दिशा में उड़ते हुए
छितराए हुए सपनों को
पकड़ने की चाह में
निरंतर
दिशा बदल बदल कर
जीवन भर उछलता रहा
कभी ऊँगलिया
सपनों को
छू कर रह जाती
कभी सपने हाथ में
आते आते फिसल जाते
कभी टुकडा भर
हाथ लग जाता
मेरी आशाओं को
मरने नहीं देता
सपनों को पकड़ने के
प्रयास में
बार बार गिरता रहा
चोट खाता रहा
अब सोचता हूँ
सपनों के
एक आध टुकड़े के
खातिर
क्यों इतनी बार
चोट खाई
क्यों कर्म पथ पर
चलने से जो मिला
उसमें संतुष्टि नहीं पाई

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
16-260-06-09-2013
सपने,आशाएं,इच्छाएं,जीवन,जीवन अमृत,

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

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