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शनिवार, 28 सितंबर 2013

जब भी आइने में सूरत देखता हूँ


जब भी आइने में
सूरत देखता हूँ
खुद को ज़माने से
एक कदम पीछे पाता हूँ
लाख कोशिशों के बाद भी
ज़माने के क़दमों से
कदम नहीं मिला पाता हूँ
इसे मेरी फितरत कहूं
या कमज़ोरी
कम में जीना मंज़ूर मुझे
होड़ में नहीं जी पाता हूँ

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
59-303-28-09-2013
जीवन,जीवन मन्त्र,होड़,

1 टिप्पणी:

  1. होड़ में कुछ हासिल होता भी नही ... सिवाय दुःख के ... सुन्दर सृजन

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