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रविवार, 29 सितंबर 2013

अकेला नहीं हूँ


अकेला नहीं हूँ
तुम्हारी तरह
भीड़ में रहता हूँ
भीड़ के साथ चलता भी हूँ
पर वह नहीं कर पाता
जो भीड़ करती है
भीड़ में रहते हुए भी
अलग थलग चलता हूँ
भीड़ के विकृत चेहरे को
कार्यकलापों को
समीप से देखता हूँ
क्या क्या नहीं करना है
मन में बिठाता हूँ
लोग कटाक्ष करते हैं
जब भीड़ की बातें
पसंद नहीं हैं
भीड़ से अलग
क्यों नहीं हो जाता हूँ
भ्रम में डूबे लोगों को तो
कुछ नहीं कहता हूँ
सोचता अवश्य हूँ
भीड़ में नहीं रहूँगा तो
उसकी विकृतियों
और मानसिकता को
कैसे समझ पाऊंगा
सुलझा हुआ जीवन
जीने की चाह
मन में रखने वालों को
क्या समझा पाऊंगा ?

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
60-304-29-09-2013
समाज,मानसिकता,विकृतियाँ ,जीवन जीवन मन्त्र

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